{"_id":"582232c54f1c1b6729b38e68","slug":"the-smog-is-more-dangerous-for-wildlife","type":"story","status":"publish","title_hn":"वन्य जीवों के लिए ज्यादा खतरनाक है ये स्मॉग ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वन्य जीवों के लिए ज्यादा खतरनाक है ये स्मॉग
बरेली, ब्यूरो
Updated Wed, 09 Nov 2016 01:47 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली से लेकर लखनऊ तक छाए स्मॉग का दुष्प्रभाव मनुष्यों से ज्यादा वन्य जीवों पर पड़ रहा है। इसको लेकर वाइल्ड लाइफ के वैज्ञानिक चिंतित हैं। दिल्ली जू के पूर्व निदेशक और आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बीएम अरोरा का कहना है कि इस स्मॉग से वन्य जीव असामान्य व्यवहार कर सकते हैं, उनमें बेचैनी बढ़ सकती है। उन्होंने चिड़ियाघरों में रहने वाले जीवों को लेकर अलर्ट होने का सुझाव दिया है।
डॉ. अरोरा ने बताया कि वन्य जीव मनुष्यों से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। खुले पर्यावरण में रहते हैं इसलिए प्रदूषण को सहने की उनमें क्षमता काफी कम होती है। उनकी शारीरिक संरचना भी प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल होती है। स्मॉग के अंदर फैक्ट्रियों के धुएं से निकलने वाले खतरनाक कार्बन पॉर्टिकल हवा में घुलकर सांस के जरिए व्यक्ति और वन्य जीवों में असर करते हैं। मनुष्यों में तो इसकी पहचान आसानी से हो जाती है और समय से समुचित इलाज भी हो जाता है लेकिन वन्य जीवों में असर तुरंत नहीं नजर आता। उनके फेफड़ों में कार्बन पॉर्टिकल जम जाते हैं और उनका असर 12 से 25 दिन के अंदर दिखने लगता है। सांस लेने में दिक्कत होती है और तेज फीवर भी आता है। नतीजतन, सही समय पर इलाज न मिल पाने से वन्य जीवों की असमय मौत होने की संभावना बढ़ जाती है।
ऐसे बदलेगा व्यवहार
डॉ. अरोरा ने बताया कि स्मॉग में वन्य जीव मूवमेंट भी नहीं कर पाते हैं। जंगल में रहने वाले जीव जब अंधेरे में दौड़ते-भागते हैं तो पेड़ों और खंभों से टकराकर जख्मी हो जाते हैं और खून अधिक बहने पर उनकी मौत भी हो जाती है। चिड़ियाघरों में हिरन और बहुत से जीवों को खुलेबाड़ों में रखा जाता है। उनके स्मॉग से प्रभावित होने का खतरा ज्यादा है।
विज्ञापन
प्रवासी पक्षियों पर खतरा
इन दिनों प्रवासी पक्षी निर्धारित स्थानों पर पहुंचते हैं। उनके लिए यह स्मॉग उनके सहने की क्षमता से कहीं ज्यादा है। प्रवासी पक्षी तालाब और नदियों के किनारे ठहरते हैं, स्मॉग से नदियों का पानी भी दूषित होगा, जिसे पीना उनके लिए हानिकारक होगा। प्रवास के दौरान ये पक्षी बच्चों को भी जन्म देते हैं, उनके बच्चे भी इससे प्रभावित होंगे।
दिल्ली जू में 1992 में बीमार पड़े थे जीव
डॉ. अरोरा ने बताया कि दिल्ली जू में 1992 में बड़ी संख्या में वन्य जीव कार्बन पॉटिकल से बीमार पड़ गए थे। बाद में पता लगा तो समय पर इलाज कराकर कई जीवों को बचा पाना संभव हो सका था। उसके बाद से जू के आसपास की कई फैक्ट्रियों से कार्बन उत्सर्जन का प्रतिबंधित किया गया था।
विज्ञापन
डॉ. अरोरा ने बताया कि वन्य जीव मनुष्यों से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। खुले पर्यावरण में रहते हैं इसलिए प्रदूषण को सहने की उनमें क्षमता काफी कम होती है। उनकी शारीरिक संरचना भी प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल होती है। स्मॉग के अंदर फैक्ट्रियों के धुएं से निकलने वाले खतरनाक कार्बन पॉर्टिकल हवा में घुलकर सांस के जरिए व्यक्ति और वन्य जीवों में असर करते हैं। मनुष्यों में तो इसकी पहचान आसानी से हो जाती है और समय से समुचित इलाज भी हो जाता है लेकिन वन्य जीवों में असर तुरंत नहीं नजर आता। उनके फेफड़ों में कार्बन पॉर्टिकल जम जाते हैं और उनका असर 12 से 25 दिन के अंदर दिखने लगता है। सांस लेने में दिक्कत होती है और तेज फीवर भी आता है। नतीजतन, सही समय पर इलाज न मिल पाने से वन्य जीवों की असमय मौत होने की संभावना बढ़ जाती है।
विज्ञापन
ऐसे बदलेगा व्यवहार
डॉ. अरोरा ने बताया कि स्मॉग में वन्य जीव मूवमेंट भी नहीं कर पाते हैं। जंगल में रहने वाले जीव जब अंधेरे में दौड़ते-भागते हैं तो पेड़ों और खंभों से टकराकर जख्मी हो जाते हैं और खून अधिक बहने पर उनकी मौत भी हो जाती है। चिड़ियाघरों में हिरन और बहुत से जीवों को खुलेबाड़ों में रखा जाता है। उनके स्मॉग से प्रभावित होने का खतरा ज्यादा है।
विज्ञापन
प्रवासी पक्षियों पर खतरा
इन दिनों प्रवासी पक्षी निर्धारित स्थानों पर पहुंचते हैं। उनके लिए यह स्मॉग उनके सहने की क्षमता से कहीं ज्यादा है। प्रवासी पक्षी तालाब और नदियों के किनारे ठहरते हैं, स्मॉग से नदियों का पानी भी दूषित होगा, जिसे पीना उनके लिए हानिकारक होगा। प्रवास के दौरान ये पक्षी बच्चों को भी जन्म देते हैं, उनके बच्चे भी इससे प्रभावित होंगे।
दिल्ली जू में 1992 में बीमार पड़े थे जीव
डॉ. अरोरा ने बताया कि दिल्ली जू में 1992 में बड़ी संख्या में वन्य जीव कार्बन पॉटिकल से बीमार पड़ गए थे। बाद में पता लगा तो समय पर इलाज कराकर कई जीवों को बचा पाना संभव हो सका था। उसके बाद से जू के आसपास की कई फैक्ट्रियों से कार्बन उत्सर्जन का प्रतिबंधित किया गया था।