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संकल्प पूरा करने का संदेश देता है नाटक री-यूनियन
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Sun, 25 Sep 2016 01:34 AM IST
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नाटक का दृश्य
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आम तौर पर मुश्किल के समय इंसान तमाम संकल्प लेता है। ईश्वर को भी याद करता है कि वह किसी तरह उसे परेशानी ने निकाल दे। वह अच्छे काम करेगा, मगर जब वह परेशानी से बाहर निकल जाता है तब वह सामान्य स्थिति में आ जाता है। जब कि ऐसा नहीं होना चाहिए। उसे अपने संकल्प को समय के अनुसार पूरा करना चाहिए। तभी स्वयं के साथ समाज का भी भला हो सकता है।
कुछ ऐसा ही संदेश री-यूनियन नाटक देता है। जो शनिवार को विंडरमेयर में मंचित किय गया। जान टेलर ने इस बात को कहने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के कुछ सैनिकों पर नाटक की रचना की है। जो विश्व युद्ध के दस साल बाद सैनिकों द्वारा री-यूनियन सेलिब्रेट करने की कहानी से शुरू होती है। इसमें चार ब्रिटिश सैनिक मंच पर होते हैं। इसमें कोई व्यवसायी कोई पादरी तो कोई उद्योगपति होता। इस बीच एक पात्र आकर उन्हें यह आत्मबोध कराता है कि उन्होंने जीवन में क्या किया और दस साल के बाद री-यूनियन की बात कर रहे हैं। जब कि एक मर चुका है एक गायब है और एक कारोबार में बरबाद हो चुका है। पात्रों के संवादों के अनुसार कहानी के सार की बात करें तो विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश और जर्मन लड़ रहे थे। इसमें ब्रिटिश के सात सैनिक फंस जाते हैं। वह किसी तरह अपने कैंप तक संदेश भिजवाना चाहते हैं। तय होता है कि कोई किसी तरह यहां से निकल जाए तो वह संदेश पहुंचा सकता है। इसके लिए यह भी तय होता है कि जिसका सबसे छोटा पत्ता आएगा वहीं जाएगा। इसमें स्मित निकलता है जो बचते बचाते भी बहुत घायल अवस्था में कैंप पहुंचता है। वह अस्पताल में मर जाता है। इसी दौरान यह सैनिक तमाम संकल्प लेते हैं कि वह किसी तरह यहां से निकल जाएं तो समाज के लिए यह भला काम करेंगे और किसी को इस तरह मदद करेंगे, मगर जब वह निकल जाते हैं और रिटायर्ड भी हो जाते हैं तो वह अपने संकल्प को भूल जाते हैं। दस साल बाद उन्हें री-यूनियन की याद आती है। रंगविनायक रंगमंडल की यह प्रस्तुति में भले ही कुछ खामी रही हो, मगर लाईट, सेट और कहानी के माध्यम से नाटक प्रभावशाली रहा और संदेश देने में भी सफल होता है। इस नाटक का निर्देशन रईस खान ने दिया। पात्रों में राजू चौहान, दानिश खान, सुदेश सैनिक, लव तोमर, अचल सिसोदिया, पंकज मौर्य रहे। पीएफ कमिश्नर ने कलाकारों को सम्मनित किया। डा. ब्रिजेश्वर ने आभार व्यक्त किया।
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कुछ ऐसा ही संदेश री-यूनियन नाटक देता है। जो शनिवार को विंडरमेयर में मंचित किय गया। जान टेलर ने इस बात को कहने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के कुछ सैनिकों पर नाटक की रचना की है। जो विश्व युद्ध के दस साल बाद सैनिकों द्वारा री-यूनियन सेलिब्रेट करने की कहानी से शुरू होती है। इसमें चार ब्रिटिश सैनिक मंच पर होते हैं। इसमें कोई व्यवसायी कोई पादरी तो कोई उद्योगपति होता। इस बीच एक पात्र आकर उन्हें यह आत्मबोध कराता है कि उन्होंने जीवन में क्या किया और दस साल के बाद री-यूनियन की बात कर रहे हैं। जब कि एक मर चुका है एक गायब है और एक कारोबार में बरबाद हो चुका है। पात्रों के संवादों के अनुसार कहानी के सार की बात करें तो विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश और जर्मन लड़ रहे थे। इसमें ब्रिटिश के सात सैनिक फंस जाते हैं। वह किसी तरह अपने कैंप तक संदेश भिजवाना चाहते हैं। तय होता है कि कोई किसी तरह यहां से निकल जाए तो वह संदेश पहुंचा सकता है। इसके लिए यह भी तय होता है कि जिसका सबसे छोटा पत्ता आएगा वहीं जाएगा। इसमें स्मित निकलता है जो बचते बचाते भी बहुत घायल अवस्था में कैंप पहुंचता है। वह अस्पताल में मर जाता है। इसी दौरान यह सैनिक तमाम संकल्प लेते हैं कि वह किसी तरह यहां से निकल जाएं तो समाज के लिए यह भला काम करेंगे और किसी को इस तरह मदद करेंगे, मगर जब वह निकल जाते हैं और रिटायर्ड भी हो जाते हैं तो वह अपने संकल्प को भूल जाते हैं। दस साल बाद उन्हें री-यूनियन की याद आती है। रंगविनायक रंगमंडल की यह प्रस्तुति में भले ही कुछ खामी रही हो, मगर लाईट, सेट और कहानी के माध्यम से नाटक प्रभावशाली रहा और संदेश देने में भी सफल होता है। इस नाटक का निर्देशन रईस खान ने दिया। पात्रों में राजू चौहान, दानिश खान, सुदेश सैनिक, लव तोमर, अचल सिसोदिया, पंकज मौर्य रहे। पीएफ कमिश्नर ने कलाकारों को सम्मनित किया। डा. ब्रिजेश्वर ने आभार व्यक्त किया।
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