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Bareilly News: इन इमारतों की इंजीनियरिंग कमाल, नक्काशी भी बेमिसाल

Sat, 16 Sep 2023 02:16 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 16 Sep 2023 02:16 AM IST
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The engineering of these buildings is amazing, the carvings are also unmatched.
इंजीनियर्स डे पर विशेष
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बरेली। शहर में 100से लेकर 200 साल तक पुराने भवन हैं। उनकी नक्काशी और वास्तुकला बेमिसाल है। इतने साल तक बारिश, तूफान झेलने के बाद भी अपनी जगह अडिग ये भवन बेजोड़ इंजीनियरिंग का नमूना पेश कर रहे हैं। यह लोगों को आश्चर्यचकित भी करता है। लेखक राजेश शर्मा शहर की ऐसी इमारतों के इतिहास और वर्तमान को सहेज रहे हैं। वह इसे सोशल मीडिया पर साझा भी करते रहते हैं। ब्यूरो

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चुन्ना मियां का लक्ष्मी नारायण मंदिर : कटरा के मानराय परिवार के पास ककोड़ा, अलापुर बदायूं से लेकर पीलीभीत और फरीदपुर तक 484 गांव की जमींदारी थी। आज कटरा मानराय में जहां चुन्ना मियां का लक्ष्मी नारायण मंदिर है, उसके सामने ही इनकी हवेली हुआ करती थी। हवेली के सामने का इलाका पल्ली बगिया कहलाता था। बाद में यहीं चुन्ना मियां ने लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनवाया।
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कोठी इफ्तिखार मंजिल : किला इलाके के बाजार संदल खां में एक कोठी इफ्तिखार मंजिल के नाम से मशहूर है। कुछ लोग इसे दुलारे मियां के नाम से भी जानते हैं। इसे डिप्टी साहब की कोठी भी कहा जाता है। 1937 में बनी इस कोठी की कारीगरी बेजोड़ है। कोठी के ऊपर साहबजादा हमीदुजफर के खानदान का मोनोग्राम भी लगा है। कोठी के अंदर बड़ा सा हाता है, जिसमें गोल फव्वारा और उसके पीछे यह इमारत है।
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कोतवाली : बाग ब्रिगटान के एक हिस्से में 1927 में नई कोतवाली बना दी गई जो आज भी बरेली की मुख्य कोतवाली है। इसके पीछे सिपाहियों के लिए मकान भी बना दिए गए। इसी तरह रोडवेज भी बाग ब्रिगटान के दूसरे हिस्से में बनाया गया।



लाल कोठी : चक महमूद मोहल्ले में स्थित इस कोठी का निर्माण 18वीं शताब्दी में कराया गया था। नवाब मलिक अहमद वली खान इसके संस्थापक थे। लाल कोठी का निर्माण तब हुआ था जब सईद खान 1 वीं शताब्दी की शुरुआत में अकोरा मिस्री बांदा (उत्तर-पश्चिम सीमांत पेशावर) से बरेली आए थे। उनके बेटे शाह वली खान ने अपने बेटे उमराव खान के साथ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था।



बियावानी कोठी : वर्ष 1870 के आसपास मुरादाबाद से बरेली आए गोपीनाथ ने नमक का कारोबार शुरू किया। इससे उनको इतना फायदा हुआ कि वह साहू गोपीनाथ कहलाने लगे। शहर से दूर उन्होंने बियावानी कोठी का निर्माण कराया। कोठी बेहद खूबसूरत कंगूरों से सजी है। मेहराब, बड़े-बड़े बरामदे और लाइन से बने बड़े-बड़े कमरे, विशाल दालान आदि इसकी शान बयां कर रहे हैं।




फ्रीविल बैप्टिस्ट चर्च : ईस्ट इंडिया कंपनी ने चंदा जुटाकर वर्ष 1838 में इसका निर्माण कराया था। कोलकाता से यहां आए ब्रिटिश बिशप डैनियल विल्सन डीडी ने इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब 1857 की क्रांति शुरू हुई तो उसकी चिंगारी रुहेलखंड में भी भड़की। क्रांति का गवाह बना कैंट स्थित फ्रीविल बैप्टिस्ट चर्च। इस पर हमला कर क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था।
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