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Bareilly News: साहित्य व कला के विभिन्न रंगों की यादें सहेज गया पुस्तक उत्सव

Wed, 28 Oct 2026 03:09 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 28 Oct 2026 03:09 AM IST
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The book festival preserved memories of the diverse hues of literature and art.
बरेली। विंडरमेयर थिएटर में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पांच दिवसीय किताब उत्सव का लफ्ज-ओ-लहजे, रंगमंच और अदबी संवाद के साथ मंगलवार को समापन हो गया। उत्सव साहित्य व कला जगत की हस्तियों से मुलाकात और साहित्य के विभिन्न रंगों की यादें बरेली के लोगों को सहेज गया।
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मंगलवार को कार्यक्रम की शुरुआत रेडियो प्रेजेंटर, लेखक व अनुवादक यूनुस खान की कार्यशाला ‘लफ्ज, लहजा और आवाज’ से हुई। उन्होंने शब्दों के सही उच्चारण, बोलने की शैली और आवाज की अभिव्यक्ति से जुड़े व्यावहारिक सूत्र साझा किए। यूनुस खान ने कहा कि आवाज से अधिक महत्व बोलने की शैली का है।
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कार्यशाला में प्रतिभागियों से आवाज, लय, गति और भाव-अभिव्यक्ति से जुड़ी अनेक गतिविधियां करवाई गईं। प्रतिभागियों के साथ-साथ राजकमल प्रकाशन टीम के सदस्यों से कुछ रोचक टंग-ट्विस्टर्स भी करवाए। शहर के कॉलेजों के विद्यार्थियों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
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शाम के सत्र में ‘अदब, अदीब और बरेली’ विषय पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें शिक्षक-लेखक अवनीश यादव, प्रो. वंदना शर्मा, राफिया शबनम, डाॅ. निशा शर्मा और प्रोफेसर प्रीति पाठक ने बरेली के सांस्कृतिक, सामाजिक व साहित्यिक वातावरण पर विचार साझा किए। सभी ने तमाम खासियत का अपने-अपने अंदाज से उल्लेख करते हुए बरेली की एक खूबसूरत तस्वीर को पेश किया।
अगले सत्र के विषय ‘मिथक, इतिहास और रंगमंच’ पर चर्चा में नाटककार व निर्देशक अभिषेक मजूमदार से उनकी पुस्तक ‘कौमुदी और अन्य नाटक’ को आधार बनाकर ‘मिथक, इतिहास और रंगमंच’ विषय पर अमितेश कुमार ने बातचीत की।
‘दिल्ली की गलियां और मैं’: जवानी की स्मृतियां और सांस्कृतिक चिंता पुस्तक पर इतिहासकार पुष्पेश पंत से एक प्रकाशन के सह-संस्थापक रवि सिंह ने संवाद किया। इसके बाद पुष्पेश पंत की पुस्तक ‘जवानी के दिन’ का लोकार्पण भी हुआ।
कार्यक्रम के अंत में राज कमल प्रकाशन के सीईओ आमोद माहेश्वरी, संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम, रंगकर्मी व चिकित्सक डाॅ. ब्रिजेश्वर सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह ने दर्शकों का संयुक्त रूप से आभार व्यक्त किया।
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‘देस’ के मंचन में उभरी आजादी की पूर्व संध्या की जटिलताएं

बरेली। पुस्तक उत्सव में नाटककार व निर्देशक अभिषेक मजूमदार के निर्देशन में उनके ही व्यंग्यात्मक नाटक ‘देस’ का मंचन किया गया। यह नाटक आजादी की पूर्व संध्या पर उभरी जटिलताओं को व्यंग्य भरे अंदाज से रोचक ढंग में प्रस्तुत करता है। मंझे हुए रंगकर्मियों की प्रस्तुति ने श्रोताओं को स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या की उस ऐतिहासिक रात से जोड़ दिया, जिसकी चमक के पीछे अनेक जटिल सच छिपे थे।

इस नाटक में दिल्ली में रहने वाले एक युवा जोड़े- रुक्मणि और उसके पति परसुराम की कहानी केंद्र में है, जो आजादी के जश्न में शामिल होने जा रहे हैं। नाटक ने स्वतंत्रता के दौर की वास्तविकताओं, फैलाई जाने वाली झूठी खबरों, खोखले राष्ट्रवाद और उस समय के आम आदमी के अनुभवों पर तीखा व्यंग्य किया।


कलाकारों के संवाद अदायगी, मंच सज्जा और अभिषेक मजूमदार के निर्देशन ने नाटक को प्रभावी बनाया। इसी प्रस्तुति के साथ राजकमल प्रकाशन किताब उत्सव को विराम दिया गया।
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