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आने वाली नस्लों को मिलेगी डर के आगे जीत
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बरेली। मेरा हक फाउंडेशन की अध्यक्ष फरहत नकवी ने कहा कि तीन तलाक बिल के राज्यसभा में पास होने की उन्हें बेपनाह खुशी है और वह इसे लफ्जों में बयान नहीं कर सकती। इसके लिए वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की बेहद शुक्रगुजार हैं जिन्होंने मुस्लिम औरतों का दर्द समझा और उससे उन्हें निजात दिलाने की लगातार कोशिश की। ये कोशिशें आखिरकार रंग लाईं। इसके लिए वह अपनी अपनी टीम की ओर से प्रधानमंत्री, कानून मंत्री रविशंकर और केंद्र सरकार को दिल से मुबारकबाद देती हैं। फरहत ने कहा कि लोकसभा में यह तीन तलाक बिल तीन बार पास हुआ, पिछली दो बार राज्यसभा में यह बिल अटक गया था। इस बार मुस्लिम महिलाओं ने काफी उम्मीद लगा रखी थी कि यह बिल राज्यसभा में भी पास होगा। आखिरकार यह उम्मीद पूरी हो गई। उन्होंने कहा कि तीन तलाक के खिलाफ यह लड़ाई कामयाब होने के पीछे उन तमाम औरतों का संघर्ष है जिन्होंने अपनी जान हथेली पर रखकर जिद्दी और जुल्मी लोगों का सामना किया। इसी हौसले ने औरतों को यह एतिहासिक जीत हासिल कराई है। फरहत ने कहा कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बनने से हमारी आने वाली नस्लों को एक बड़े डर से मुक्ति मिलेगी और वे खुलकर जिंदगी जी पाएंगी। तीन तलाक खत्म होने से पूरे मुस्लिम समाज को फायदा मिलेगा।
मुस्लिम औरतें शरीयत पर ही अमल करेंगी: मौलाना इंतजार
तीन तलाक कानून इस्लामी शरीयत पर खुला हमला है और एक समझीबूझी प्लानिंग के तहत तीन तलाक के जरिये इस्लामी शरीयत में हस्तक्षेप किया जा रहा है। मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी की आड़ में तीन तलाक पर बिल पास कराना भारतीय संविधान के खिलाफ है। तीस लाख से भी ज्यादा गैर मुस्लिम महिलाएं बगैर तलाक के अपने पतियों के दूर रहने को मजबूर हैं, क्या उनकी हिमायत में कभी कोई बिल लाया गया। ऐसी महिलाओं से बेखबर लोग मुस्लिम महिलाओं से इतनी हमदर्दी क्यों जता रहे हैं। अगर हुकूमत की नीयत साफ है तो मुस्लिम महिलाओं की तालीम और रोजगार पर तवज्जो क्यों नहीं दी जाती। मॉब लिंचिंग की घटनाएं मुस्लिम पुरुषों से महिलाओं तक पहुंच गईं हैं, क्या उसके खिलाफ भी कोई कदम उठाया गया। तीन तलाक पर बेशक बिल पास हो गया, मगर अधिकांश महिलाएं शरीयत पर ही अमल करती हैं और हमेशा करेंगी। - मौलाना इंतजार अहमद कादरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय सुन्नी उलमा कौंसिल।
सियासी फैसला मगर कुछ फायदा भी होगा: मौलाना शहाबुद्दीन
तीन तलाक पर बिल पास होना ही था क्योंकि केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के साथ हमदर्दी जताकर मुस्लिम समाज के दरमियान ही कुछ वोट हासिल करना चाहती है जिसमें उसे कामयाबी मिल गई। इस बिल से बेशक नुकसान होंगे, मगर कुछ फायदे भी हो सकते हैं क्योंकि हर बुराई में भी कुछ अच्छाई का पहलू छिपा ही होता है। तीन तलाक एक साथ देना समाज के अंदर की बुराई थी। उलमा और मस्जिदों के इमाम बराबर आगाह करते रहे मगर समाज का एक बहुत बड़ा तबका इस पर अमल करता नजर नहीं आया। इसी की सजा पूरी कौम को मिली है। इस तरह अब देश में दो तरह के कानून का लोग पालन करेंगे। एक वो जो कुरान और हदीस के मुताबिक है और दूसरा वो कानून जो संसद में पास किया गया। ऐसी सूरत में मुस्लिम समाज में बड़े पैमाने पर टकराव की सूरत पैदा होगी। बहरहाल हम संसद में पारित कानून का स्वागत करते हैं। - मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, राष्ट्रीय महासिचव तंजीम उलमा इस्लाम।
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मुस्लिम औरतें शरीयत पर ही अमल करेंगी: मौलाना इंतजार
तीन तलाक कानून इस्लामी शरीयत पर खुला हमला है और एक समझीबूझी प्लानिंग के तहत तीन तलाक के जरिये इस्लामी शरीयत में हस्तक्षेप किया जा रहा है। मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी की आड़ में तीन तलाक पर बिल पास कराना भारतीय संविधान के खिलाफ है। तीस लाख से भी ज्यादा गैर मुस्लिम महिलाएं बगैर तलाक के अपने पतियों के दूर रहने को मजबूर हैं, क्या उनकी हिमायत में कभी कोई बिल लाया गया। ऐसी महिलाओं से बेखबर लोग मुस्लिम महिलाओं से इतनी हमदर्दी क्यों जता रहे हैं। अगर हुकूमत की नीयत साफ है तो मुस्लिम महिलाओं की तालीम और रोजगार पर तवज्जो क्यों नहीं दी जाती। मॉब लिंचिंग की घटनाएं मुस्लिम पुरुषों से महिलाओं तक पहुंच गईं हैं, क्या उसके खिलाफ भी कोई कदम उठाया गया। तीन तलाक पर बेशक बिल पास हो गया, मगर अधिकांश महिलाएं शरीयत पर ही अमल करती हैं और हमेशा करेंगी। - मौलाना इंतजार अहमद कादरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय सुन्नी उलमा कौंसिल।
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सियासी फैसला मगर कुछ फायदा भी होगा: मौलाना शहाबुद्दीन
तीन तलाक पर बिल पास होना ही था क्योंकि केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के साथ हमदर्दी जताकर मुस्लिम समाज के दरमियान ही कुछ वोट हासिल करना चाहती है जिसमें उसे कामयाबी मिल गई। इस बिल से बेशक नुकसान होंगे, मगर कुछ फायदे भी हो सकते हैं क्योंकि हर बुराई में भी कुछ अच्छाई का पहलू छिपा ही होता है। तीन तलाक एक साथ देना समाज के अंदर की बुराई थी। उलमा और मस्जिदों के इमाम बराबर आगाह करते रहे मगर समाज का एक बहुत बड़ा तबका इस पर अमल करता नजर नहीं आया। इसी की सजा पूरी कौम को मिली है। इस तरह अब देश में दो तरह के कानून का लोग पालन करेंगे। एक वो जो कुरान और हदीस के मुताबिक है और दूसरा वो कानून जो संसद में पास किया गया। ऐसी सूरत में मुस्लिम समाज में बड़े पैमाने पर टकराव की सूरत पैदा होगी। बहरहाल हम संसद में पारित कानून का स्वागत करते हैं। - मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, राष्ट्रीय महासिचव तंजीम उलमा इस्लाम।
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