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188 करोड़ के प्रोजेक्ट की ऐसी शर्तें.. यानी बजट खाओ-खपाओ और चुपचाप निकल जाओ
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स्मार्ट सिटी
- फोटो : डेमो फोटो
बरेली। बरेली स्मार्ट सिटी लिमिटेड के 188 करोड़ के प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आई ट्रिपल सी के प्रोेजेक्ट की डीपीआर में टेंडर की नियम-शर्तों को इस कदर बदल दिया गया जो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोजेक्ट की गहन तकनीकी और वित्तीय जांच के बाद बनाई गई डीपीआर से बिलकुल उलट था। इसके बाद नियम और शर्तें इतनी कमजोर पड़ गईं कि अयोग्य कंपनियों के लिए भी टेंडर हासिल करने का रास्ता खुल गया। टेंडर लेने वाली कंपनी पर लंबे समय तक काम की जिम्मेदारी के साथ काम को पूरा करने की भी बाध्यता खत्म हो गई। एएमयू से चिट्ठी आने से एक महीना पहले ही स्मार्ट सिटी की कंसल्टिंग कंपनी श्रेय की सहयोगी कंपनी सीनेट ने एक पत्र लिखकर स्मार्ट सिटी के अफसरों की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए थे।
स्मार्ट सिटी के सीईओ यानी नगर आयुक्त को सीनेट की ओर से भेजे गए इस पत्र में साफ-साफ कहा गया था टेंडर के नए नियम और शर्तें पूरी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गाइड लाइन की अवहेलना करती हैं। कंपनी ने यह भी कहा था कि आई ट्रिपल सी के लिए टेंडर के दौरान कामर्शियल बिड के लिए योग्यता का मानदंड कड़े तकनीकी स्तर पर आधारित होना चाहिए लेकिन टेंडर के लिए अपलोड किए गए नियम और शर्तों यानीआरएफपी) में इस मानदंड को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। बिडर के वित्तीय मूल्यांकन में भी मूल्य आधारित गुणवत्ता चयन के नियमों की अनदेखी की गई है। यानी कंपनी किसी काम को कम पैसे में गुणवत्ता युक्त तरीके से कर पाती है या नहीं, ये बंदिशें इस बदलाव के बाद उस पर लागू नहीं रह गई हैं। इस चिट्ठी में यह भी कहा गया था कि बदले गए नियम शर्तों के अनुरूप यदि टेंडर का आवंटन मूल्य आधारित गुणवत्ता चयन के आधार पर किया जाना है तो तकनीकी स्कोरिंग टेबल का प्रावधान प्रासंगिक ही नहीं रह जाता है।
एक ही कंपनी को कई काम सौंपने की थी तैयारी
टेंडर आवंटन की नियम शर्तों के मुताबिक एक ही कंपनी को कई काम देने की भी योजना थी जिस पर सीनेट की ओर से सवाल उठाए गए है। पत्र में उसकी ओर से कहा गया है कि यदि कई काम एक ही कंपनी को दे दिए जाएंगे तो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की ुस कंपनी पर निर्भरता बढ़ जाएगी। उस बिंदु पर भी सवाल उठाया गया है जिसमें नई तकनीकों की जगह पुराने तकनीक वाली कंपनियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। आई ट्रिपल सी, वायरलेस सर्विस और डेटा ट्रांसफर संबंधी विभिन्न सेवाओें को एक ही कंपनी से कराने को पूरी तरह गलत बताया गया है।
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एएमयू की गाइड लाइन की अनदेखी शहर को तबाही में झोंकने जैसा
सीनेट के पत्र में यह भी साफ तौर पर कहा गया है कि टेंडर के लिए अपलोड नियम व शर्तें किसी भी तरह से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गाइड लाइन का अनुसरण नहीं कर रही हैं। यहां तक कि कंपनियों द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा के लिए ‘की फारफार्मेंस इंडीकेटर’ की नियम और शर्तें या तो स्पष्ट नहीं हैं या फिर मिसिंग हैं जो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लंबे समय तक संचालन के लिए काफी विकट स्थिति पैदा करता है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत नेटवर्क एक्विपमेंट की भारी खरीद पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि अगले पांच साल तक भी इनकी उपयोगिता पर विचार किया जाए तो यह आवश्यकता से काफी अधिक हैं।
भारत सरकार के अनुमति बगैर नहीं बदले जा सकते नियम
स्मार्ट सिटी के किसी भी प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार की ओर से नामित विश्वविद्यालय की तकनीकी और फाइनेंशियल कमेटी से क्लियरेंस लेना होता है। इसकी एक कॉपी प्रदेश सरकार और भारत सरकार को भी जाती हैै। इसके बाद इसे टेंडर पर आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फार प्रपोजल के रूप में अपलोड किया जाता है। यह आरएफपी दरअसल नियम और शर्तें ही होती हैं जिनमें वित्तीय और तकनीकी मानदंड शामिल होते हैं। इस काम के लिए स्मार्ट सिटी ने बाकायदा 15 लाख की फीस भी एमएमयू को दी गई है। मगर क्लियरेंस मिलने के बाद गुपचुप ढंग से इस डीपीआर को बदल दिया गया और इसे ही आरएफपी के रूप में अपलोड कर दिया गया।
.. तो नए साहब इसलिए बुलाए गए हैं
पिछले दिनों स्मार्ट सिटी की आईटी सेल में एक नए अधिकारी आए हैं। बताया जाता है कि उन्हें मोटी तनख्वाह पर लाया गया है। डीपीआर में परिवर्तन को भी आईटी सेल की कारस्तानी के रूप में देखा जा रहा है। बताया जाता है कि नए साहब की इसमें बड़ी भूमिका हो सकती है। सूत्रों की मानें तो डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट में संशोधन की खबर के बाद स्मार्ट सिटी के आला अधिकारियों ने एक आंतरिक जांच भी शुरू कर दी है। साहब को इस तरह स्मार्ट सिटी में कौन लाया और किस लिए लाया, यह सवाल भी उठ रहा है।
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स्मार्ट सिटी के सीईओ यानी नगर आयुक्त को सीनेट की ओर से भेजे गए इस पत्र में साफ-साफ कहा गया था टेंडर के नए नियम और शर्तें पूरी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गाइड लाइन की अवहेलना करती हैं। कंपनी ने यह भी कहा था कि आई ट्रिपल सी के लिए टेंडर के दौरान कामर्शियल बिड के लिए योग्यता का मानदंड कड़े तकनीकी स्तर पर आधारित होना चाहिए लेकिन टेंडर के लिए अपलोड किए गए नियम और शर्तों यानीआरएफपी) में इस मानदंड को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। बिडर के वित्तीय मूल्यांकन में भी मूल्य आधारित गुणवत्ता चयन के नियमों की अनदेखी की गई है। यानी कंपनी किसी काम को कम पैसे में गुणवत्ता युक्त तरीके से कर पाती है या नहीं, ये बंदिशें इस बदलाव के बाद उस पर लागू नहीं रह गई हैं। इस चिट्ठी में यह भी कहा गया था कि बदले गए नियम शर्तों के अनुरूप यदि टेंडर का आवंटन मूल्य आधारित गुणवत्ता चयन के आधार पर किया जाना है तो तकनीकी स्कोरिंग टेबल का प्रावधान प्रासंगिक ही नहीं रह जाता है।
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एक ही कंपनी को कई काम सौंपने की थी तैयारी
टेंडर आवंटन की नियम शर्तों के मुताबिक एक ही कंपनी को कई काम देने की भी योजना थी जिस पर सीनेट की ओर से सवाल उठाए गए है। पत्र में उसकी ओर से कहा गया है कि यदि कई काम एक ही कंपनी को दे दिए जाएंगे तो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की ुस कंपनी पर निर्भरता बढ़ जाएगी। उस बिंदु पर भी सवाल उठाया गया है जिसमें नई तकनीकों की जगह पुराने तकनीक वाली कंपनियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। आई ट्रिपल सी, वायरलेस सर्विस और डेटा ट्रांसफर संबंधी विभिन्न सेवाओें को एक ही कंपनी से कराने को पूरी तरह गलत बताया गया है।
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एएमयू की गाइड लाइन की अनदेखी शहर को तबाही में झोंकने जैसा
सीनेट के पत्र में यह भी साफ तौर पर कहा गया है कि टेंडर के लिए अपलोड नियम व शर्तें किसी भी तरह से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गाइड लाइन का अनुसरण नहीं कर रही हैं। यहां तक कि कंपनियों द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा के लिए ‘की फारफार्मेंस इंडीकेटर’ की नियम और शर्तें या तो स्पष्ट नहीं हैं या फिर मिसिंग हैं जो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लंबे समय तक संचालन के लिए काफी विकट स्थिति पैदा करता है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत नेटवर्क एक्विपमेंट की भारी खरीद पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि अगले पांच साल तक भी इनकी उपयोगिता पर विचार किया जाए तो यह आवश्यकता से काफी अधिक हैं।
भारत सरकार के अनुमति बगैर नहीं बदले जा सकते नियम
स्मार्ट सिटी के किसी भी प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार की ओर से नामित विश्वविद्यालय की तकनीकी और फाइनेंशियल कमेटी से क्लियरेंस लेना होता है। इसकी एक कॉपी प्रदेश सरकार और भारत सरकार को भी जाती हैै। इसके बाद इसे टेंडर पर आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फार प्रपोजल के रूप में अपलोड किया जाता है। यह आरएफपी दरअसल नियम और शर्तें ही होती हैं जिनमें वित्तीय और तकनीकी मानदंड शामिल होते हैं। इस काम के लिए स्मार्ट सिटी ने बाकायदा 15 लाख की फीस भी एमएमयू को दी गई है। मगर क्लियरेंस मिलने के बाद गुपचुप ढंग से इस डीपीआर को बदल दिया गया और इसे ही आरएफपी के रूप में अपलोड कर दिया गया।
.. तो नए साहब इसलिए बुलाए गए हैं
पिछले दिनों स्मार्ट सिटी की आईटी सेल में एक नए अधिकारी आए हैं। बताया जाता है कि उन्हें मोटी तनख्वाह पर लाया गया है। डीपीआर में परिवर्तन को भी आईटी सेल की कारस्तानी के रूप में देखा जा रहा है। बताया जाता है कि नए साहब की इसमें बड़ी भूमिका हो सकती है। सूत्रों की मानें तो डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट में संशोधन की खबर के बाद स्मार्ट सिटी के आला अधिकारियों ने एक आंतरिक जांच भी शुरू कर दी है। साहब को इस तरह स्मार्ट सिटी में कौन लाया और किस लिए लाया, यह सवाल भी उठ रहा है।