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Bareilly News: महेश नवमी पर शुभ योगों में बरसेगी शिव कृपा
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बरेली। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवमी ‘महेश नवमी’ के नाम से जानी जाती है। यह भगवान शिव को समर्पित पर्व है। माहेश्वरी समाज इसे विशेष तौर पर मनाता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 14 जून, शुक्रवार की रात 12 बजकर चार मिनट से शुरू होगी, जो 15 जून, शनिवार की रात दो बजकर 22 मिनट तक रहेगी। चूंकि 15 जून, शनिवार को दिन भर ज्येष्ठ शुक्ल नवमी तिथि रहेगी, इसलिए महेश नवमी का व्रत इसी दिन किया जाएगा। महेश नवमी पर बुधादित्य शुक्र आदित्य जैसे कई शुभ योग भी बनेंगे, जिसके चलते इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है।
पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार माहेश्वरी समाज के राजा से कोई गलती हो गई। जिसके कारण ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया। श्राप से मुक्ति के लिए माहेश्वरी समाज के लोगों ने शिवजी की तपस्या की। शिवजी ने उन्हें श्राप मुक्त कर दिया और अपना नाम भी दिया। भगवान शिव के महेश नाम पर ही इस समाज के लोगों का नाम माहेश्वर प्रसिद्ध हो गया, जो आज तक चला आ रहा है।
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पूजा विधि
महेश नवमी के दिन शिवलिंग और शिव परिवार का चंदन, भस्म, पुष्प, गंगा जल, मौसमी फल और बिल्वपत्र चढ़ाकर पूजन किया जाता है। पीतल का त्रिशूल चढ़ाया जाता है और कथा का श्रवण भी किया जाता है।
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ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 14 जून, शुक्रवार की रात 12 बजकर चार मिनट से शुरू होगी, जो 15 जून, शनिवार की रात दो बजकर 22 मिनट तक रहेगी। चूंकि 15 जून, शनिवार को दिन भर ज्येष्ठ शुक्ल नवमी तिथि रहेगी, इसलिए महेश नवमी का व्रत इसी दिन किया जाएगा। महेश नवमी पर बुधादित्य शुक्र आदित्य जैसे कई शुभ योग भी बनेंगे, जिसके चलते इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है।
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पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार माहेश्वरी समाज के राजा से कोई गलती हो गई। जिसके कारण ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया। श्राप से मुक्ति के लिए माहेश्वरी समाज के लोगों ने शिवजी की तपस्या की। शिवजी ने उन्हें श्राप मुक्त कर दिया और अपना नाम भी दिया। भगवान शिव के महेश नाम पर ही इस समाज के लोगों का नाम माहेश्वर प्रसिद्ध हो गया, जो आज तक चला आ रहा है।
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पूजा विधि
महेश नवमी के दिन शिवलिंग और शिव परिवार का चंदन, भस्म, पुष्प, गंगा जल, मौसमी फल और बिल्वपत्र चढ़ाकर पूजन किया जाता है। पीतल का त्रिशूल चढ़ाया जाता है और कथा का श्रवण भी किया जाता है।