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Bareilly News: एलईडी से बनीं आत्मनिर्भर, अब लुटा रहीं रोजगार की रोशनी
Mon, 02 Oct 2023 01:52 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Mon, 02 Oct 2023 01:52 AM IST
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बरेली। गांव के माहौल में गरीबी को मात देना आसान नहीं पर दृढ़ इच्छाशक्ति से तमाम महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं। फरीदपुर के किशुर्रा गांव की दयावती भी उनमें से एक हैं। वह अपने घर में ही एईडी बल्ब और चार्जर बनाती हैं। उनके यहां बने बल्ब व चार्जर की बाजार में खूब मांग है। इस कारोबार के बूते वह स्वयं आत्मनिर्भर बनीं, अब बेटे सहित गांव की अन्य महिलाओं को भी इस काम से जोड़ लिया है। अब वह भी आत्मनिर्भरता की राह पर हैं।
ऐसे आया विचार
दयावती ने बताया कि उनका बेटा नोएडा में एक कंपनी में काम करता था। बेटे से उसके काम-काज के बारे में अक्सर बात करती थीं। इस दौरान उन्होंने एलईडी बल्ब और चार्जर बनाने का तरीका सीखा। बेटे से कुछ सामान मंगाकर पहले घर के लिए बल्ब तैयार किए, फिर इसे कारोबार का रूप देने की ठानी। बेटे ने भी साथ दिया तो मेहनत रंग लाई। दयावती अकेले इस काम को बड़े स्तर पर नहीं कर सकती थीं इसलिए उन्होंने आस-पास की महिलाओं की मदद ली। उनको सामान तैयार करने और पैकिंग का तरीका सिखाया। बेटे को नोएडा से घर बुला लिया। अपने काम में मार्केटिंग की जिम्मेदारी दी। मां-बेटे के प्रयास से उनकी रोजगार की गाड़ी सरपट दौड़ने लगी। वह एक माह में 10 हजार से अधिक बल्ब तैयार करती हैं।
चुनौतियां भी कम नहींदयावती ने बताया कि शुरुआत में लोग मजाक उड़ाते थे। खुद भी झिझक महसूस होती थी। बल्ब व चार्जर तैयार हुए तो उसे बाजार में ले जाने की चुनौती थी, हालांकि बेटे की मदद से इस पर भी जीत पाई। अन्य महिलाओं ने भी काम को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। अब वह लखीमपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, बदायूं, पूरनपुर समेत अन्य जगहों पर भी वह तैयार बल्ब भेजती हैं। त्योहार के समय मांग अधिक होने से मुनाफा भी ज्यादा होता है। यह उनकी और अन्य महिलाओं की आय का बेहतर साधन है।
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ऐसे आया विचार
दयावती ने बताया कि उनका बेटा नोएडा में एक कंपनी में काम करता था। बेटे से उसके काम-काज के बारे में अक्सर बात करती थीं। इस दौरान उन्होंने एलईडी बल्ब और चार्जर बनाने का तरीका सीखा। बेटे से कुछ सामान मंगाकर पहले घर के लिए बल्ब तैयार किए, फिर इसे कारोबार का रूप देने की ठानी। बेटे ने भी साथ दिया तो मेहनत रंग लाई। दयावती अकेले इस काम को बड़े स्तर पर नहीं कर सकती थीं इसलिए उन्होंने आस-पास की महिलाओं की मदद ली। उनको सामान तैयार करने और पैकिंग का तरीका सिखाया। बेटे को नोएडा से घर बुला लिया। अपने काम में मार्केटिंग की जिम्मेदारी दी। मां-बेटे के प्रयास से उनकी रोजगार की गाड़ी सरपट दौड़ने लगी। वह एक माह में 10 हजार से अधिक बल्ब तैयार करती हैं।
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चुनौतियां भी कम नहींदयावती ने बताया कि शुरुआत में लोग मजाक उड़ाते थे। खुद भी झिझक महसूस होती थी। बल्ब व चार्जर तैयार हुए तो उसे बाजार में ले जाने की चुनौती थी, हालांकि बेटे की मदद से इस पर भी जीत पाई। अन्य महिलाओं ने भी काम को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। अब वह लखीमपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, बदायूं, पूरनपुर समेत अन्य जगहों पर भी वह तैयार बल्ब भेजती हैं। त्योहार के समय मांग अधिक होने से मुनाफा भी ज्यादा होता है। यह उनकी और अन्य महिलाओं की आय का बेहतर साधन है।
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