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Bareilly News: परीक्षण की तकलीफ से पशुओं को निजात दिलाने में जुटे हैं वैज्ञानिक

Sat, 25 Apr 2026 06:09 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 25 Apr 2026 06:09 AM IST
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Scientists are trying to relieve animals from the pain of testing.
वैक्सीन, डायग्नोस्टिक किट, दवा आदि के परीक्षण से गुजरने वाले पशुओं को तकलीफ से निजात दिलाने के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिक जुटे हैं। किसी ने वैकल्पिक मॉडल बनाया है तो कोई विशेष प्रजाति विकसित कर रहा है।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक, किसी वैक्सीन की जांच के लिए उन्हें पशुओं में चैलेंज करना पड़ता है या फिर विभाग में मौजूद वैकल्पिक मॉडल पर परीक्षण करते हैं। जिनके मॉडल नहीं हैं, उसमें सीधे पशु पर ही जांच चल रही है। जैसे कि गंबोरो डिजीज, रैबीज आदि। अब वैकल्पिक मॉडल खोजे जा रहे हैं ताकि सीधे तौर पर पशु-पक्षी को दर्द देने के बजाय मॉडल पर वैक्सीन की प्रभावी जांच हो सके। जैविक मानकीकरण विभाग ने अब तक सीएसएफ वैक्सीन परीक्षण का वैकल्पिक मॉडल, पशु आनुवांशिकी विभाग ने चूहों की विशेष प्रजाति विकसित की है।
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ताकि बार-बार नए चूहे पर न हो वैक्सीन का परीक्षण
पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पुष्पेंद्र कुमार की टीम ने चूहों की विशेष स्वदेशी नस्ल इंडीमस विकसित की है। विदेशी चूहों पर प्रयोग के दौरान वातावरण में बदलाव के साथ आनुवांशिक गुणों में अंतर समेत प्रकृति और व्यवहार भी बदलता है। इसलिए बड़ी तादाद में परीक्षण के लिए चूहों की जरूरत होती है। भारतीय वातावरण के अनुकूल इंडीमस नस्ल पर शोध से बड़ी तादाद में चूहों की जरूरत नहीं होती और परिणाम सटीक रहते हैं। चूहों की आनुवंशिक, जैविक संरचना मनुष्यों व पशुओं से मिलती है। छोटे आकार से रखरखाव आसान होता है। जीवन चक्र छोटा होने से शोध परिणाम तेजी से मिलते हैं। भविष्य में ये चूहे संस्थान की आय भी बढ़ाएंगे।
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सीएसएफ वैक्सीन परीक्षण का वैकल्पिक मॉडल तैयार
जैविक मानकीकरण विभाग के विभागाध्यक्ष प्रधान वैज्ञानिक डॉ. प्रणव धर के नेतृत्व में टीम ने क्लासिकल स्वाइन फीवर वैक्सीन परीक्षण के लिए वैकल्पिक मॉडल बनाया है। लिहाजा, अब सूकर में चैलेंज की जरूरत नहीं। सीधे सेल कल्चर में परीक्षण होता है। इसके अलावा बोवाइन किडनी सेल वाली क्लासिकल स्वाइन फीवर (सीएसएफ) विदेशी वैक्सीन की गुणवत्ता परखने के लिए भी मॉडल बनाया है। एक बार वैक्सीन लगने के 28 दिन बाद उसकी गुणवत्ता फ्लूरोसेंट एंटीबॉडी न्यूट्रलाइजेशन (एफएबीएन) तकनीक से परखी जा सकती है। बताया कि इन वैक्सीन का परीक्षण सीधे सूकरों पर होने से उनको बेतहाशा दर्द से गुजरना पड़ता था। हालांकि, वैकल्पिक मॉडल से अब राहत रहेगी।
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