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बाबा साहब की आड़ में चेयरमैन बनने का मंसूबा पाले बैठे लोगों ने कराया बवाल
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गुलड़िया। सिरौली में बाबा साहब आंबेडकर की प्रतिमा लगाने को लेकर हुए बवाल के पीछे नगर पंचायत का नया चेयरमैन बनने के दावेदारों का हाथ माना जा रहा है। आंबेडकर प्रतिमा लगाने के लिए काफी समय से चंदा इकट्ठा कराने के साथ अनुसूचित जाति के लोगों को भी उकसाया जा रहा था लेकिन पुलिस को इसकी भनक नहीं लगी।
चेयरमैन का पद फिललाह सपा के कब्जे में हैं। निकाय चुनाव नजदीक आने के साथ अब इस पद पर सत्ताधारी पार्टी के ही तीन प्रमुख नेताओं ने भी दावेदारी शुरू कर दी है। सपा और बसपा के भी कई प्रमुख नेता चुनाव की तैयारी में जुटे हुए है। जिस जमीन पर आंबेडकर प्रतिमा लगाने के बाद विवाद हुआ, वह जमीन पूर्व चेयरमैन स्वर्गीय मुन्ने प्रधान ने अपने कार्यकाल में अनुसूचित जाति के लोगों को घूरा डालने और जानवर बांधने के लिए दी थी। तभी से ही अनुसूचित जाति के लोग इस जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
कस्बे में अनुसूचित जाति के करीब दो हजार वोट हैं। नया चेयरमैन बनने का ख्वाहिश पाले बैठे दावेदारों की इन्हीं वोटों पर निगाह जमी हुई है। हालांकि चूंकि यह जमीन पूर्व चेयरमैन मुन्ने प्रधान ने दी थी, इस वजह से अनुसूचित जाति के वोटर भी उन्हीं के माने जाते है। इन्हीं वोटरों को अपने पाले में खींचने के लिए दावेदार रणनीति बनाने में जुटे थे। आंबेडकर प्रतिमा लगाने की योजना इसी रणनीति की उपज थी। सोमवार को कुछ हद तक वे इस योजना में कामयाब भी हुए लेकिन प्रशासन की सख्ती से उनका मकसद पूरा नहीं हो पाया।
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पुलिस ने न माना सियासी दबाव तो उल्टा पड़ सकता है दांव
आंबेडकर प्रतिमा हटाने पहुंची पुलिस के सामने महिलाओं को मोर्चा संभालने के लिए आगे करना भी चुनावी रणनीति का हिस्सा था। हालांकि पर्दे के पीछे यह दांव चलने वाले बाद में खुद भूमिगत हो गए। अब माना जा रहा है कि पुलिस ने सियासी दबाव में आए बगैर अगर कार्रवाई की तो इस बवाल की पटकथा लिखने वालों का दांव पड़ सकता है। पुलिस भी सारे पहलू देखकर ही कार्रवाई करने के मूड में है। आला अधिकारी भी इस मामले पर नजर जमाए हुए हैं।
महीने भर से जुटाया जा रहा था चंदा
कस्बे में हुए बवाल की चिंगारी महीने भर से सुलग रही थी। योजनाबद्ध ढंग से इस काम में भीम आर्मी के लोगों को लगाया गया था और उन्हें आश्वासन दिया गया था कि आंबेडकर प्रतिमा लगाने में हर संभव मदद की जाएगी। पैसों के साथ सियासी ताकत से भी सहयोग करने का वादा किया गया था। इसी के बाद प्रतिमा स्थापित करने का काम शुरू हुआ था। इसके लिए चंदा भी एक महीने से जुटाया जा रहा था।
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चेयरमैन का पद फिललाह सपा के कब्जे में हैं। निकाय चुनाव नजदीक आने के साथ अब इस पद पर सत्ताधारी पार्टी के ही तीन प्रमुख नेताओं ने भी दावेदारी शुरू कर दी है। सपा और बसपा के भी कई प्रमुख नेता चुनाव की तैयारी में जुटे हुए है। जिस जमीन पर आंबेडकर प्रतिमा लगाने के बाद विवाद हुआ, वह जमीन पूर्व चेयरमैन स्वर्गीय मुन्ने प्रधान ने अपने कार्यकाल में अनुसूचित जाति के लोगों को घूरा डालने और जानवर बांधने के लिए दी थी। तभी से ही अनुसूचित जाति के लोग इस जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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कस्बे में अनुसूचित जाति के करीब दो हजार वोट हैं। नया चेयरमैन बनने का ख्वाहिश पाले बैठे दावेदारों की इन्हीं वोटों पर निगाह जमी हुई है। हालांकि चूंकि यह जमीन पूर्व चेयरमैन मुन्ने प्रधान ने दी थी, इस वजह से अनुसूचित जाति के वोटर भी उन्हीं के माने जाते है। इन्हीं वोटरों को अपने पाले में खींचने के लिए दावेदार रणनीति बनाने में जुटे थे। आंबेडकर प्रतिमा लगाने की योजना इसी रणनीति की उपज थी। सोमवार को कुछ हद तक वे इस योजना में कामयाब भी हुए लेकिन प्रशासन की सख्ती से उनका मकसद पूरा नहीं हो पाया।
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पुलिस ने न माना सियासी दबाव तो उल्टा पड़ सकता है दांव
आंबेडकर प्रतिमा हटाने पहुंची पुलिस के सामने महिलाओं को मोर्चा संभालने के लिए आगे करना भी चुनावी रणनीति का हिस्सा था। हालांकि पर्दे के पीछे यह दांव चलने वाले बाद में खुद भूमिगत हो गए। अब माना जा रहा है कि पुलिस ने सियासी दबाव में आए बगैर अगर कार्रवाई की तो इस बवाल की पटकथा लिखने वालों का दांव पड़ सकता है। पुलिस भी सारे पहलू देखकर ही कार्रवाई करने के मूड में है। आला अधिकारी भी इस मामले पर नजर जमाए हुए हैं।
महीने भर से जुटाया जा रहा था चंदा
कस्बे में हुए बवाल की चिंगारी महीने भर से सुलग रही थी। योजनाबद्ध ढंग से इस काम में भीम आर्मी के लोगों को लगाया गया था और उन्हें आश्वासन दिया गया था कि आंबेडकर प्रतिमा लगाने में हर संभव मदद की जाएगी। पैसों के साथ सियासी ताकत से भी सहयोग करने का वादा किया गया था। इसी के बाद प्रतिमा स्थापित करने का काम शुरू हुआ था। इसके लिए चंदा भी एक महीने से जुटाया जा रहा था।