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रियल एस्टेट पर रेरा की मार से
बरेली
Updated Sat, 23 Dec 2017 02:15 AM IST
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केस-1
हरूनगला स्थित एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में 70 से ज्यादा फ्लैट बने हैं। लंबे समय से यह बिक नहीं रहे। पूरा प्रोजेक्ट डंप पड़ा है। फ्लैट मालिक को मजबूरी में 10 फ्लैट रेट कम करके बेचने पड़े।
केस-2
सिविल लाइंस स्थित एक अपार्टमेंट में 80 से ज्यादा फ्लैट बने खड़े हैं। प्रत्येक फ्लैट की कीमत एक करोड़ रुपये है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा लागू होेने के बाद एक यह बिक नहीं पा रहे।
केस-3
नैनीताल रोड पर दो मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में बने सैकड़ों फ्लैट ऑन द रोड होने के बाद भी एक साल से डंप हैं। पहले से निर्धारित दो से चार लाख रुपये कम में भी इनके खरीदार नहीं हैं।
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केस-4
पीलीभीत बाईपास रोड पर बीसलपुर रोड से पहले निर्मित एक टॉवर में 76 फ्लैट बने थे। इनमें से 20 बमुश्किल बिके। बाकी पूरा प्रोजेक्ट डंप है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा के बाद इनके खरीदार नहीं मिल रहे।
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। पीएम आवास योजना में सरकार और प्रशासन के सामने 46 हजार लाभार्थियों को मकान उपलब्ध कराने की चुनौती है, वहीं रियल एस्टेट में नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) की मार से 60 फीसदी प्रोजेक्ट डंप हैं। बिल्डरों ने नोटबंदी से पहले मल्टीस्टोरी भवनों में अरबों की लागत से सैकड़ों फ्लैट बनाकर खड़े कर दिए, लेकिन अब इनके खरीददार नहीं मिल रहे। इसका असर डेवलपमेंट अथॉरिटी की आमदनी पर पड़ा है। नई कॉलोनियों के ले-आऊट पास कराने की संख्या में भारी कमी आई है। इससे बीडीए को अपने स्टाफ के वेतन-भत्ते देना भारी पड़ रहा है।
सिविल लाइंस, पीलीभीत रोड, बीसलपुर रोड, संजय नगर, बदायूं रोड, नैनीताल रोड, स्टेडियम रोड के अलावा, डेलापीर, डोहरा रोड पर, अलखनाथ मंदिर से आगे मल्टीस्टोरी भवनों के 12 से 15 पुराने प्रोजेक्ट सवा साल से डंप हैं। नोटबंदी, जीएसटी के बाद अब रेरा की मार से इनमें बने करीब 60 फीसदी फ्लैट्स की बिक्री नहीं हो पा रही। रेरा की सख्ती के बाद आवंटी बिल्डरों पर प्रोजेक्ट पूरा कर आवंटन का दबाव बना रहे हैं, लेकिन बुकिंग रुकने और ग्राहकों के न आने से बिल्डर न तो नई कॉलोनी डेवलप कर पा रहे हैं, न ही पुराने प्रोजेक्ट पूरे कर आवंटियों को समय से हैंडओवर कर पा रहे हैं। नई कॉलोनियों के ले-आउट पास न होने से बीडीए की आमदनी 80 फीसदी तक घट गई है। बीडीए को अपने स्टाफ का वेतन-भत्ते का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। बीडीए भी रामगंगा नगर को छोड़कर कोई नया प्रोजेक्ट लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। आवास विकास ने तो 10 साल से कोई नई कॉलोनी डेवलप नहीं की है। सरकारी एजेंसियों की सुस्ती और प्राइवेट सेक्टर के हाथ खड़े करने से शहर के विकास की रफ्तार एकदम से मंद हो चुकी है। इससे केंद्र सरकार का वर्ष 2022 तक ‘सबको घर देने का सपना’ पूरा होता नजर नहीं आ रहा।
फोटो-- रमनदीप सिंह
कोट---
पीएम आवास योजना में हम छोटे मकान बनाने को तैयार हैं, लेकिन सरकार ने नियम इतने कड़े कर दिए हैं कि कोई भी बिल्डर आगे नहीं आ रहा। सरकार के नए नियमों पर हमने आपत्तियां और सुझाव भेजे हैं। जैसा निर्णय होगा, उसी तरह हम लोग काम करेंगे। - रमनदीप सिंह, अध्यक्ष क्रेडाई
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हरूनगला स्थित एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में 70 से ज्यादा फ्लैट बने हैं। लंबे समय से यह बिक नहीं रहे। पूरा प्रोजेक्ट डंप पड़ा है। फ्लैट मालिक को मजबूरी में 10 फ्लैट रेट कम करके बेचने पड़े।
केस-2
सिविल लाइंस स्थित एक अपार्टमेंट में 80 से ज्यादा फ्लैट बने खड़े हैं। प्रत्येक फ्लैट की कीमत एक करोड़ रुपये है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा लागू होेने के बाद एक यह बिक नहीं पा रहे।
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केस-3
नैनीताल रोड पर दो मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में बने सैकड़ों फ्लैट ऑन द रोड होने के बाद भी एक साल से डंप हैं। पहले से निर्धारित दो से चार लाख रुपये कम में भी इनके खरीदार नहीं हैं।
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केस-4
पीलीभीत बाईपास रोड पर बीसलपुर रोड से पहले निर्मित एक टॉवर में 76 फ्लैट बने थे। इनमें से 20 बमुश्किल बिके। बाकी पूरा प्रोजेक्ट डंप है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा के बाद इनके खरीदार नहीं मिल रहे।
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। पीएम आवास योजना में सरकार और प्रशासन के सामने 46 हजार लाभार्थियों को मकान उपलब्ध कराने की चुनौती है, वहीं रियल एस्टेट में नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) की मार से 60 फीसदी प्रोजेक्ट डंप हैं। बिल्डरों ने नोटबंदी से पहले मल्टीस्टोरी भवनों में अरबों की लागत से सैकड़ों फ्लैट बनाकर खड़े कर दिए, लेकिन अब इनके खरीददार नहीं मिल रहे। इसका असर डेवलपमेंट अथॉरिटी की आमदनी पर पड़ा है। नई कॉलोनियों के ले-आऊट पास कराने की संख्या में भारी कमी आई है। इससे बीडीए को अपने स्टाफ के वेतन-भत्ते देना भारी पड़ रहा है।
सिविल लाइंस, पीलीभीत रोड, बीसलपुर रोड, संजय नगर, बदायूं रोड, नैनीताल रोड, स्टेडियम रोड के अलावा, डेलापीर, डोहरा रोड पर, अलखनाथ मंदिर से आगे मल्टीस्टोरी भवनों के 12 से 15 पुराने प्रोजेक्ट सवा साल से डंप हैं। नोटबंदी, जीएसटी के बाद अब रेरा की मार से इनमें बने करीब 60 फीसदी फ्लैट्स की बिक्री नहीं हो पा रही। रेरा की सख्ती के बाद आवंटी बिल्डरों पर प्रोजेक्ट पूरा कर आवंटन का दबाव बना रहे हैं, लेकिन बुकिंग रुकने और ग्राहकों के न आने से बिल्डर न तो नई कॉलोनी डेवलप कर पा रहे हैं, न ही पुराने प्रोजेक्ट पूरे कर आवंटियों को समय से हैंडओवर कर पा रहे हैं। नई कॉलोनियों के ले-आउट पास न होने से बीडीए की आमदनी 80 फीसदी तक घट गई है। बीडीए को अपने स्टाफ का वेतन-भत्ते का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। बीडीए भी रामगंगा नगर को छोड़कर कोई नया प्रोजेक्ट लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। आवास विकास ने तो 10 साल से कोई नई कॉलोनी डेवलप नहीं की है। सरकारी एजेंसियों की सुस्ती और प्राइवेट सेक्टर के हाथ खड़े करने से शहर के विकास की रफ्तार एकदम से मंद हो चुकी है। इससे केंद्र सरकार का वर्ष 2022 तक ‘सबको घर देने का सपना’ पूरा होता नजर नहीं आ रहा।
फोटो-- रमनदीप सिंह
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पीएम आवास योजना में हम छोटे मकान बनाने को तैयार हैं, लेकिन सरकार ने नियम इतने कड़े कर दिए हैं कि कोई भी बिल्डर आगे नहीं आ रहा। सरकार के नए नियमों पर हमने आपत्तियां और सुझाव भेजे हैं। जैसा निर्णय होगा, उसी तरह हम लोग काम करेंगे। - रमनदीप सिंह, अध्यक्ष क्रेडाई