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नहर के खनन करके निकाली रेत बेचने पर डीएम ने लगाई रोक
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पीलीभीत। अमरिया में डीबी फीडर नहर की सिल्ट सफाई के लिए श्रमदान के नाम पर खनन करके निकाली गई रेत के बेचने पर डीएम ने जांच पूरी न होने तक रोक लगा दी है। डीएम ने सिंचाई विभाग के एक्सईएन से सिल्ट सफाई से लेकर रेत निकासी का पूरा ब्योरा तलब किया है।
अमर उजाला ने 14 दिसंबर के अंक में अमरिया में डीबी फीडर को 21 किलोमीटर खोदकर रेत के ढेर जमा करने का मामला प्रकाशित किया था। रेत के ढेर की कीमत 10 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। सिंचाई विभाग के एक्सईएन ने यह कहा था कि नहर की सिल्ट सफाई के लिए शासन ने बजट नहीं दिया। इसलिए उन्होंने श्रमदान कराकर नहर की सिल्ट सफाई कराई। हालांकि एक्सईएन ये नहीं बता सके कि श्रमदान में आम नागरिकों के बजाय ठेकेदारों को ही क्यों लगाया गया। फिर श्रमदान से ही जब नहर की सिल्ट सफाई करानी थी तो उसके टेंडर कराने की क्या जरूरत थी। वहीं ठेकेदारों ने 21 किलोमीटर तक नहर खोदकर खनन निकासी करके रेत के ढेर तो लगा दिए, लेकिन नहर की दोनों की पटरियों पर घास साफ नहीं की। सिल्ट अब भी नहर के ज्यादातर हिस्सों में जमा है। इससे सिंचाई विभाग के श्रमदान से कराए गए नहर सफाई पर सवाल उठने लगे हैं।
इधर मामला प्रकाशित होने के बाद डीएम के भी खेल समझ आ गया। दरअसल खनन विभाग की रेत निकासी की रॉयल्टी 375 रुपये प्रति घन मीटर है जबकि सिंचाई विभाग की सिल्ट की रॉयल्टी 55 रुपये प्रति घन मीटर रखी गई। यानी प्रति घन मीटर खनन पर श्रमदान करने वालों को 320 रुपये का सीधा फायदा। बाकी खनन करके निकाला गया रेत करोड़ों रुपये और देकर जाएगा। सूत्रों के अनुसार खनन विभाग ने इसे संज्ञान लेते हुए अपनी रिपोर्ट प्रशासन और शासन को भेजी है। डीएम वैभव श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि श्रमदान से रेत निकासी की प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई। उन्होंने एडीएम वित्त से इस मामले में जानकारी करने के बाद रेत की बिक्री पर रोक लगा दी।
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अमर उजाला ने 14 दिसंबर के अंक में अमरिया में डीबी फीडर को 21 किलोमीटर खोदकर रेत के ढेर जमा करने का मामला प्रकाशित किया था। रेत के ढेर की कीमत 10 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। सिंचाई विभाग के एक्सईएन ने यह कहा था कि नहर की सिल्ट सफाई के लिए शासन ने बजट नहीं दिया। इसलिए उन्होंने श्रमदान कराकर नहर की सिल्ट सफाई कराई। हालांकि एक्सईएन ये नहीं बता सके कि श्रमदान में आम नागरिकों के बजाय ठेकेदारों को ही क्यों लगाया गया। फिर श्रमदान से ही जब नहर की सिल्ट सफाई करानी थी तो उसके टेंडर कराने की क्या जरूरत थी। वहीं ठेकेदारों ने 21 किलोमीटर तक नहर खोदकर खनन निकासी करके रेत के ढेर तो लगा दिए, लेकिन नहर की दोनों की पटरियों पर घास साफ नहीं की। सिल्ट अब भी नहर के ज्यादातर हिस्सों में जमा है। इससे सिंचाई विभाग के श्रमदान से कराए गए नहर सफाई पर सवाल उठने लगे हैं।
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इधर मामला प्रकाशित होने के बाद डीएम के भी खेल समझ आ गया। दरअसल खनन विभाग की रेत निकासी की रॉयल्टी 375 रुपये प्रति घन मीटर है जबकि सिंचाई विभाग की सिल्ट की रॉयल्टी 55 रुपये प्रति घन मीटर रखी गई। यानी प्रति घन मीटर खनन पर श्रमदान करने वालों को 320 रुपये का सीधा फायदा। बाकी खनन करके निकाला गया रेत करोड़ों रुपये और देकर जाएगा। सूत्रों के अनुसार खनन विभाग ने इसे संज्ञान लेते हुए अपनी रिपोर्ट प्रशासन और शासन को भेजी है। डीएम वैभव श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि श्रमदान से रेत निकासी की प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई। उन्होंने एडीएम वित्त से इस मामले में जानकारी करने के बाद रेत की बिक्री पर रोक लगा दी।
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