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Bareilly News: मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बोले- कोर्ट का विरोध नहीं... मगर अदालतें दे रहीं शरीयत में दखल
Sun, 14 Jul 2024 12:45 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sun, 14 Jul 2024 12:45 PM IST
सार
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि कुछ वर्षों से अदालतें मुसलमानों की कमजोर कड़ी पर हाथ रख रही हैं। मस्जिदों, मदरसों व महिलाओं को मुद्दा बनाकर अदालतों में रोज सुनवाई होती है।
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मौलाना शहाबुद्दीन रजवी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि कुछ वर्षों से अदालतें मुसलमानों की कमजोर कड़ी पर हाथ रख रही हैं। मस्जिदों, मदरसों व महिलाओं को मुद्दा बनाकर अदालतों में रोज सुनवाई होती है। इसी बहाने शरीयत का मजाक बनाकर तौहीन की जाती है। इन तमाम मसाइल को लेकर देश का मुसलमान बहुत परेशान है।
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मौलाना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं और गैर मुस्लिम महिलाओं दोनों के बारे में फैसला दिया है। इस फैसले को एकतरफा कहना मुनासिब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फाजिल जजों ने महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए ये निर्णय दिया है। मौलाना के अनुसार इस्लाम धर्म भी उन मुस्लिम महिलाओं के साथ है जो तलाकशुदा, बेवा या यतीम हैं। पैगंबर-ए-इस्लाम ने तो यहां तक कहा है कि शौहर अपनी बीवियों का हर तरह से ख्याल रखें।
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शरीयत में व्यवस्था है कि तीन तलाक वाली महिलाओं का इद्दत के दौरान खर्चा (इखराजात) शौहर अदा करेगा। उसके बाद वह महिला दूसरे से निकाह कर सकती है। मौलाना ने मुस्लिम महिलाओं से अपील की है कि वे कोर्ट-कचहरी जाने से बचें, ताकि शरीयत का मजाक न बनाया जाए।
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देशभर में स्थापित दारुल इफ्ता और दारुल कजा (शरीयत कोर्ट) से वाबस्ता उलमा जिम्मेदारी निभाएं। शरीयत के नाम पर बनीं संस्थाओं को कोर्ट में लंबित धार्मिक याचिकाओं पर अच्छे वकील खड़े करने चाहिए जो मजबूत दलीलों के साथ अदालतों को संतुष्ट कर सकें।