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कुमायूं एक्सप्रेस: वर्षों पुरानी मांग पूरी तो हुई पर यात्री सुविधाएं नदारद
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बरेली। पूर्वोत्तर रेलवे की सबसे प्रसिद्ध ट्रेन कुमायूं एक्सप्रेस का बदले नाम और कलेवर के साथ संचालन भले शुरू हो गया हो मगर इसमें यात्री सुविधाओं का टोटा है। इज्जतनगर मंडल की यह सबसे ऐतिहासिक ट्रेन बिना एसी डिब्बों के चलाई जा रही है। लंबे समय से मांग के बावजूद रेलवे प्रबंधन इस ट्रेन का संचालन प्रतिदिन नहीं कर रहा है। इससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
उत्तराखंड से वाया बरेली होते हुए आगरा तक चलने वाली इस ट्रेन का पहाड़ के साथ मैदान के लोगों से भावानात्मक नाता रहा है। अंग्रजों के जमाने से चल रही यह ट्रेन आगरा जाने के लिए सबसे बेहतर जरिया हुआ करती थी। इसका संचालन आजादी के पहले भाप के इंजन से शुरू हुआ था। उस दौर में इज्जतनगर रेल मंडल का नाम भी कुमायूं रेलवे हुआ करता था। इस वजह से इस ट्रेन का नाम भी कुमायूं एक्सप्रेस रखा गया। छोटी लाइन पर दौड़ने वाली चुनिंदा सबसे तेज गाड़ियों में यह ट्रेन भी शामिल थी।
वर्ष 2008 में अमान परिवर्तन के चलते कुमायूं एक्सप्रेस का संचालन बंद होने के बाद दुबारा इस ट्रेन को 2015 में चलाया गया। ट्रेन का फिर से संचालन होने के दौरान रेलवे ने सुविधाओं पर कैंची चला दी। मीटरगेज पर चलने वाली ट्रेन जहां प्रतिदिन चलाई जाती थी, वहीं अब इसे सप्ताह में सिर्फ तीन दिन संचालित किया जा रहा है। दो साल पहले कोरोना महामारी के चलते जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाने की वजह से इस ट्रेन के पहिए एक बार फिर थम गए। कोरोना संक्रमण कम होने के बाद यात्रियों की मांग को देखते हुए रेलवे ने बीते दिनों फिर से इस ट्रेन का संचालन शुरू किया मगर इस बार भी यात्रियों को सुविधाओं में कटौती की मार झेलनी पड़ी। वर्तमान में इस ट्रेन का संचालन बिना एसी कोच के किया जा रहा है।
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एसी कोच न होने से यात्री परेशान
कोरोना काल से पहले इस ट्रेन में स्लीपर के पांच कोच लगाने के साथ एसी थ्री टियर के दो और एसी टू टियर का एक कोच लगाया जाता था। कोरोना संक्रमण कम होने के बाद अब यह ट्रेन सिर्फ जनरल कोच के साथ ही चलाई जा रही है। एसी कोच न लगे होने की वजह से गर्मियों में सवारियों को लू के थपेड़ों के बीच मजबूरन झुलसते हुए यात्रा करनी पड़ी। जाड़े में ट्रेन से यात्रा करने वालों को ठंड की मार झेलनी होगी। अधिकांश यात्री एसी का किराया देने को भी तैयार रहते हैं मगर एसी कोच न लगे होने की वजह से उन्हें मजबूरन जनरल कोच में ही यात्रा करनी पड़ती है।
अंग्रेजों ने की थी ट्रेन की शुरूआत
उत्तराखंड के काठगोदाम से आगरा तक चलने वाली इस ट्रेन की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी। तब यह ट्रेन कुमायूं एक्सप्रेस के नाम से चलाई जाती थी। उस दौर में भी यह ट्रेन खासी लोकप्रिय थी। अंग्रेज अफसर पहाड़ों से आगरा का सफर इसी ट्रेन से करते थे। छोटी लाइन मीटरगेज से बड़ी लाइन ब्राडगेज में तब्दील होने पर यह ट्रेन 2008 में बंद कर दी गई। 2015 में अमान परिवर्तन का काम पूरा होने के बाद ट्रेन फिर से चलाई गई। अब इस ट्रेन को रामनगर- आगरा फोर्ट के नाम से जाना जाता है।
यूनियन की ओर से कई बार इज्जतनगर मंडल के अफसरों के सामने यह मामला रखा जा चुका है। ट्रेन में सुविधाओं की कमी का मामला बोर्ड स्तर पर भी उठाया जाएगा। एसी कोच न लगे होने की वजह से सफर में परेशानी आती है। - बसंत कुमार, यूनियन नेता
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उत्तराखंड से वाया बरेली होते हुए आगरा तक चलने वाली इस ट्रेन का पहाड़ के साथ मैदान के लोगों से भावानात्मक नाता रहा है। अंग्रजों के जमाने से चल रही यह ट्रेन आगरा जाने के लिए सबसे बेहतर जरिया हुआ करती थी। इसका संचालन आजादी के पहले भाप के इंजन से शुरू हुआ था। उस दौर में इज्जतनगर रेल मंडल का नाम भी कुमायूं रेलवे हुआ करता था। इस वजह से इस ट्रेन का नाम भी कुमायूं एक्सप्रेस रखा गया। छोटी लाइन पर दौड़ने वाली चुनिंदा सबसे तेज गाड़ियों में यह ट्रेन भी शामिल थी।
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वर्ष 2008 में अमान परिवर्तन के चलते कुमायूं एक्सप्रेस का संचालन बंद होने के बाद दुबारा इस ट्रेन को 2015 में चलाया गया। ट्रेन का फिर से संचालन होने के दौरान रेलवे ने सुविधाओं पर कैंची चला दी। मीटरगेज पर चलने वाली ट्रेन जहां प्रतिदिन चलाई जाती थी, वहीं अब इसे सप्ताह में सिर्फ तीन दिन संचालित किया जा रहा है। दो साल पहले कोरोना महामारी के चलते जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाने की वजह से इस ट्रेन के पहिए एक बार फिर थम गए। कोरोना संक्रमण कम होने के बाद यात्रियों की मांग को देखते हुए रेलवे ने बीते दिनों फिर से इस ट्रेन का संचालन शुरू किया मगर इस बार भी यात्रियों को सुविधाओं में कटौती की मार झेलनी पड़ी। वर्तमान में इस ट्रेन का संचालन बिना एसी कोच के किया जा रहा है।
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एसी कोच न होने से यात्री परेशान
कोरोना काल से पहले इस ट्रेन में स्लीपर के पांच कोच लगाने के साथ एसी थ्री टियर के दो और एसी टू टियर का एक कोच लगाया जाता था। कोरोना संक्रमण कम होने के बाद अब यह ट्रेन सिर्फ जनरल कोच के साथ ही चलाई जा रही है। एसी कोच न लगे होने की वजह से गर्मियों में सवारियों को लू के थपेड़ों के बीच मजबूरन झुलसते हुए यात्रा करनी पड़ी। जाड़े में ट्रेन से यात्रा करने वालों को ठंड की मार झेलनी होगी। अधिकांश यात्री एसी का किराया देने को भी तैयार रहते हैं मगर एसी कोच न लगे होने की वजह से उन्हें मजबूरन जनरल कोच में ही यात्रा करनी पड़ती है।
अंग्रेजों ने की थी ट्रेन की शुरूआत
उत्तराखंड के काठगोदाम से आगरा तक चलने वाली इस ट्रेन की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी। तब यह ट्रेन कुमायूं एक्सप्रेस के नाम से चलाई जाती थी। उस दौर में भी यह ट्रेन खासी लोकप्रिय थी। अंग्रेज अफसर पहाड़ों से आगरा का सफर इसी ट्रेन से करते थे। छोटी लाइन मीटरगेज से बड़ी लाइन ब्राडगेज में तब्दील होने पर यह ट्रेन 2008 में बंद कर दी गई। 2015 में अमान परिवर्तन का काम पूरा होने के बाद ट्रेन फिर से चलाई गई। अब इस ट्रेन को रामनगर- आगरा फोर्ट के नाम से जाना जाता है।
यूनियन की ओर से कई बार इज्जतनगर मंडल के अफसरों के सामने यह मामला रखा जा चुका है। ट्रेन में सुविधाओं की कमी का मामला बोर्ड स्तर पर भी उठाया जाएगा। एसी कोच न लगे होने की वजह से सफर में परेशानी आती है। - बसंत कुमार, यूनियन नेता