Independence Day 2023: नवाब खान बहादुर खान ने बरेली में फूंका था क्रांति का बिगुल, अंग्रेज अफसरों को दी थी मौत
बरेली में सेना की 68वीं पलटन अंग्रेज अधिकारियों को मारने और उनके बंगलों को ध्वस्त करने में जुट गई थी। तत्कालीन मजिस्ट्रेट, सिविल सर्जन, जेल अधीक्षक और बरेली कॉलेज के प्राचार्य को मारकर क्रांतिकारियों ने बरेली को आजाद करा लिया था।
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बरेली में जंग-ए-आजादी का जब भी जिक्र होगा तो नवाब खान बहादुर खान का नाम जरूर लिया जाएगा। 1857 की क्रांति में खान बहादुर खान की अगुवाई में ही अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी भड़की थी। दस माह पांच दिन तक बरेली अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा था।
जानकारों के मुताबिक रुहेलखंड में क्रांति की बागडोर नवाब खान बहादुर खान के हाथ में थी। मेरठ में क्रांति की सूचना बरेली पहुंची तो यहां भी तैयारियां शुरू हो गईं। दस्तावेजों के मुताबिक 31 मई 1857 को तोपखाना लाइन में विद्रोह हुआ था।
अंग्रेजों को उतारा था मौत के घाट
बरेली में सेना की 68वीं पलटन अंग्रेज अधिकारियों को मारने और उनके बंगलों को ध्वस्त करने में जुट गई थी। तत्कालीन मजिस्ट्रेट, सिविल सर्जन, जेल अधीक्षक और बरेली कॉलेज के प्राचार्य को मारकर क्रांतिकारियों ने बरेली को आजाद करा लिया था।
पहली जून को विजय जुलूस निकालकर कोतवाली के एक ऊंचे चबूतरे पर खान बहादुर खान की ताजपोशी कर उनको बरेली का नवाब घोषित कर दिया गया था।
यहां बख्त खां ने आंदोलनकारी सेनाओं का सेनापतित्व स्वीकार कर लिया। खान बहादुर खान ने शोभाराम को दीवान बनाया था। इस क्रांति में अध्यापक कुतुबशाह का भी बड़ा योगदान था। क्रांति के दौरान जितने भी इश्तेहार प्रकाशित हुए, उन सब पर कुतुबशाह का नाम दर्ज होता था।
नेपाल नरेश ने धोखे से अंग्रेजों को सौंपा था
वर्ष 1858 की जंग में क्रांतिकारियों की हार के बाद अंग्रेजों का फिर बरेली पर कब्जा हो गया। खान बहादुर खान नेपाल चले गए। नेपाल नरेश जंग बहादुर ने धोखे से उन्हें हिरासत में लेकर अंग्रेजों को सौंप दिया था। एक जनवरी 1860 को उन्हें मुकदमे के लिए बरेली लाकर छावनी में रखा गया था।एक फरवरी को मुकदमा शुरू हुआ। ब्रितानी हुकूमत से लड़ने के जुर्म में उनको फांसी की सजा सुनाई गई। 24 मार्च 1860 को अकब कोतवाली में उन्हें सरेआम फांसी दी गई थी। पुरानी जिला जेल के बाहर खान बहादुर खान को बेड़ियों के साथ दफनाया गया था।