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नगर निगम : 164 साल में तय किया नगर पालिका से स्मार्ट सिटी बनने तक का सफर
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बरेली। तमाम उतार-चढ़ाव के बीच यादगार तारीखों के साथ शहर का विस्तार हुआ। ब्रिटिश हुकूमत में 1858 में नगर पालिका का दर्जा मिलने के बाद महानगर पालिका और फिर 1994 में नगर निगम बना। 164 साल बाद 2022 में स्मार्ट सिटी में शहर को शामिल किया गया।
बरेली प्रदेश का सातवां और देश का 50वां बड़ा शहर है। इस शहर को अंग्रेजों ने साल 1858 में नगर पालिका का दर्जा दिया था। फिर यह 1982 में महानगर पालिका बना। इसके बाद आसपास के 36 गांवों को शामिल कर 1994 में नगर निगम बनाया गया। सीमा क्षेत्र में वृद्धि हुई। जन सहूलियतों को कई हिस्सों में विस्तार मिला। कई हिस्सों में सड़कों और जलनिकासी का इंतजाम न होने से गांव जैसे हालात थे। नियोजित तरीके से विकास नहीं हो सका। अलबत्ता सियासत भी खूब हुई। इसी बीच 2022 में स्मार्ट सिटी बनने पर शहर के पांच वार्डों में 900 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
फाल्तूनगंज, गांधी उद्यान, सिविल लाइंस, श्यामगंज, सेटेलाइट, नगर निगम के आसपास की सड़कें चौड़ी हुईं। ओवरब्रिज बने। लाइटों से शहर जगमग हुआ। हालांकि अभी भी विकास से पिछड़े इलाकों के लोग बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। इनका कहना है कि असली आजादी तभी है जब हमें शहरी होने के नाते बुनियादी सुविधाएं नसीब हों। इसके लिए अधिकारियों ने योजनाएं बनाईं पर कहीं बजट की कमी तो कहीं दूसरी अड़चन सामने आती रहीं। ब्यूरो
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तारीख के आईने में नगर निगम का सफरनामा
- 24 जून 1858 को ब्रिटिश हुकूमत ने कराई थी म्यूनिसिपल बोर्ड (नगर पालिका) की स्थापना तब थे 27 वार्ड
- 15 जून 1982 को महानगर पालिका बनी, वार्डों की संख्या बढ़कर 30 हुई, एक वार्ड से चुने जाने लगे दो सभासद
- 31 मई 1994 बना नगर निगम, नगर प्रमुख का पद सृजित हुआ और राजकुमार अग्रवाल पहले नगर प्रमुख बने
- नगर निगम क्षेत्र में 80 वार्ड और इतने ही पार्षद हैं, आसपास के कुछ गांव शामिल कर शहर को विस्तार देने की तैयारी है
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वर्जन
ये बात सही है कि समय के साथ शहर को विस्तार मिला। अभी सुविधाओं को और विस्तार देने की जरूरत है। जलभराव खत्म करने के लिए समग्र रूप से ड्रेनेज सिस्टम की डीपीआर बनेगी। स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए सीवर लाइनों को विस्तार दिया जाएगा है। अभी 52 प्रतिशत हिस्से में सीवर लाइन है। शेष हिस्से के लिए प्रोजेक्ट तैयार है। शासन और प्रशासन के साथ जनता के सहयोग से शहर की तस्वीर बदलेगी। स्वतंत्रता दिवस पर हम विकास को रफ्तार देने के संकल्प के साथ आगे बढ़ेंगे।
- संजीव कुमार मौर्य. नगर आयुक्त
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बरेली प्रदेश का सातवां और देश का 50वां बड़ा शहर है। इस शहर को अंग्रेजों ने साल 1858 में नगर पालिका का दर्जा दिया था। फिर यह 1982 में महानगर पालिका बना। इसके बाद आसपास के 36 गांवों को शामिल कर 1994 में नगर निगम बनाया गया। सीमा क्षेत्र में वृद्धि हुई। जन सहूलियतों को कई हिस्सों में विस्तार मिला। कई हिस्सों में सड़कों और जलनिकासी का इंतजाम न होने से गांव जैसे हालात थे। नियोजित तरीके से विकास नहीं हो सका। अलबत्ता सियासत भी खूब हुई। इसी बीच 2022 में स्मार्ट सिटी बनने पर शहर के पांच वार्डों में 900 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
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फाल्तूनगंज, गांधी उद्यान, सिविल लाइंस, श्यामगंज, सेटेलाइट, नगर निगम के आसपास की सड़कें चौड़ी हुईं। ओवरब्रिज बने। लाइटों से शहर जगमग हुआ। हालांकि अभी भी विकास से पिछड़े इलाकों के लोग बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। इनका कहना है कि असली आजादी तभी है जब हमें शहरी होने के नाते बुनियादी सुविधाएं नसीब हों। इसके लिए अधिकारियों ने योजनाएं बनाईं पर कहीं बजट की कमी तो कहीं दूसरी अड़चन सामने आती रहीं। ब्यूरो
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तारीख के आईने में नगर निगम का सफरनामा
- 24 जून 1858 को ब्रिटिश हुकूमत ने कराई थी म्यूनिसिपल बोर्ड (नगर पालिका) की स्थापना तब थे 27 वार्ड
- 15 जून 1982 को महानगर पालिका बनी, वार्डों की संख्या बढ़कर 30 हुई, एक वार्ड से चुने जाने लगे दो सभासद
- 31 मई 1994 बना नगर निगम, नगर प्रमुख का पद सृजित हुआ और राजकुमार अग्रवाल पहले नगर प्रमुख बने
- नगर निगम क्षेत्र में 80 वार्ड और इतने ही पार्षद हैं, आसपास के कुछ गांव शामिल कर शहर को विस्तार देने की तैयारी है
वर्जन
ये बात सही है कि समय के साथ शहर को विस्तार मिला। अभी सुविधाओं को और विस्तार देने की जरूरत है। जलभराव खत्म करने के लिए समग्र रूप से ड्रेनेज सिस्टम की डीपीआर बनेगी। स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए सीवर लाइनों को विस्तार दिया जाएगा है। अभी 52 प्रतिशत हिस्से में सीवर लाइन है। शेष हिस्से के लिए प्रोजेक्ट तैयार है। शासन और प्रशासन के साथ जनता के सहयोग से शहर की तस्वीर बदलेगी। स्वतंत्रता दिवस पर हम विकास को रफ्तार देने के संकल्प के साथ आगे बढ़ेंगे।
- संजीव कुमार मौर्य. नगर आयुक्त