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UP: दांव पर इन दिग्गजों की प्रतिष्ठा, आठ बार के सांसद और फायरब्रांड नेता के भविष्य पर अटकलें; दिलचस्प होगी जंग
Fri, 22 Mar 2024 11:16 AM IST
शाहरुख खान
शशांक मिश्र, अमर उजाला, बरेली
शशांक मिश्र, अमर उजाला, बरेली
Published by: शाहरुख खान
Updated Fri, 22 Mar 2024 11:16 AM IST
सार
सियासी समर में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। भाजपा के कई चेहरों को पार्टी आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार है। सपा ने बदायूं में शिवपाल और पीलीभीत में गंगवार को उतारकर चुनौती पेश कर दी है।
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Lok Sabha Elections 2024
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लोकसभा चुनाव के शंखनाद के साथ ही रुहेलखंड की धरती से जुड़े दिग्गजों की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। बरेली मंडल की सभी पांच सीटों पर पूर्व में अलग-अलग चुनाव में कांग्रेस, सपा और भाजपा अपना दबदबा जमा चुके हैं। लेकिन, इस बार यहां राजनीतिक दलों के बीच चल रहे घमासान नए समीकरण बना रहे हैं।
फिलहाल, इस क्षेत्र में दिग्गजों की प्रतिष्ठा चुनावी रण में उतरने से लेकर जीत हार तक के दांव पर लगी है। पिछले चुनाव में भाजपा के लिए मुफीद रहे इस क्षेत्र में कई दिग्गज पार्टी के बड़े चेहरे बन चुके हैं।
मगर, भाजपा की ओर से आंवला, शाहजहांपुर लोकसभा सीट को छोड़कर किसी भी क्षेत्र के लिए प्रत्याशियों की घोषणा नहीं होने से इन दिग्गजों की सांसें अटकी हैं। आठ बार के सांसद संतोष गंगवार, फायरब्रांड नेता वरुण गांधी और स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी बदायूं सांसद संघमित्रा मौर्या के भविष्य पर अटकलें लग रही हैं।
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उधर, समाजवादी पार्टी ने बदायूं से पूर्व मंत्री शिवपाल यादव, पीलीभीत से पूर्व राज्य मंत्री भगवत सरन गंगवार, बरेली से पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन को मैदान में उतार दिया है। दूसरी तरफ भाजपा ने पांच लोकसभा में आंवला से वर्तमान सांसद धर्मेंद्र कश्यप, शाहजहांपुर में सांसद अरुण कुमार सागर को मैदान में उतार दिया है।
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फिलहाल, इस क्षेत्र में दिग्गजों की प्रतिष्ठा चुनावी रण में उतरने से लेकर जीत हार तक के दांव पर लगी है। पिछले चुनाव में भाजपा के लिए मुफीद रहे इस क्षेत्र में कई दिग्गज पार्टी के बड़े चेहरे बन चुके हैं।
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मगर, भाजपा की ओर से आंवला, शाहजहांपुर लोकसभा सीट को छोड़कर किसी भी क्षेत्र के लिए प्रत्याशियों की घोषणा नहीं होने से इन दिग्गजों की सांसें अटकी हैं। आठ बार के सांसद संतोष गंगवार, फायरब्रांड नेता वरुण गांधी और स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी बदायूं सांसद संघमित्रा मौर्या के भविष्य पर अटकलें लग रही हैं।
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उधर, समाजवादी पार्टी ने बदायूं से पूर्व मंत्री शिवपाल यादव, पीलीभीत से पूर्व राज्य मंत्री भगवत सरन गंगवार, बरेली से पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन को मैदान में उतार दिया है। दूसरी तरफ भाजपा ने पांच लोकसभा में आंवला से वर्तमान सांसद धर्मेंद्र कश्यप, शाहजहांपुर में सांसद अरुण कुमार सागर को मैदान में उतार दिया है।
दरअसल, बरेली मंडल की पांचों लोकसभा सीट में बदायूं को छोड़कर सभी सीट पर पिछले एक दशक से भाजपा का कब्जा है। बरेली, आंवला और पीलीभीत तो भाजपा की परंपरागत सीट बनी हुई है। इस सियासी समीकरण को देखते हुए मजबूत विपक्ष बनकर सामना करने के लिए तैयार गठबंधन इस गढ़ में सेंधमारी की भी पूरी तैयारी में जुटा है।
यही कारण है कि कांग्रेस और सपा गठबंधन इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए भाजपा के दिग्गजों के सामने अपने बड़े चेहरों को उतारने में पीछे नहीं है। दूसरी तरफ, भाजपा की ओर से बदायूं, बरेली और पीलीभीत में अब तक प्रत्याशियों की घोषणा नहीं होने से संशय के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के दिग्गजों के सियासी सफर को लेकर राजनीतिक गलियारे में अपने कयास लगाए जा रहे हैं।
बदायूं तय करेगा दिग्गजों का कद
समाजवादी पार्टी ने बदायूं में अपनी खोई प्रतिष्ठा वापस पाने की जुगत में पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव को मैदान में उतारा है। इस सीट पर स्वामी प्रसाद मौर्या की बेटी संघमित्रा मौर्या भाजपा सांसद हैं। पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या की अलग पार्टी बनाने और भाजपा के खिलाफ मुखर रहने के चलते कई तरह की संभावनाओं को बल मिल रहा है।
समाजवादी पार्टी ने बदायूं में अपनी खोई प्रतिष्ठा वापस पाने की जुगत में पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव को मैदान में उतारा है। इस सीट पर स्वामी प्रसाद मौर्या की बेटी संघमित्रा मौर्या भाजपा सांसद हैं। पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या की अलग पार्टी बनाने और भाजपा के खिलाफ मुखर रहने के चलते कई तरह की संभावनाओं को बल मिल रहा है।
फिलहाल, बदायूं में पहली बार वर्ष 1991 में भाजपा के स्वामी चिन्मयानंद ने खाता खोला था। इसके बाद कांग्रेस से सांसद रहे सलीम शेरवानी ने 1996 में यह सीट सपा के खाते में डाल दी थी। इसके बाद 2004 तक सलीम शेरवानी इस सीट से सांसद रहे ओर इसके बाद वर्ष 2014 तक धमेंद्र यादव ने यहां से प्रतिनिधित्व किया। मगर, 2019 में यह सीट भाजपा के पास आ गई थी।
बरेली के घमासान पर होगी नजर
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बरेली से आठ बार के सांसद संतोष गंगवार की सियासत में अब उम्र बाधा बन रही है। वर्ष 2009 को छोड़कर गंगवार वर्ष 1989 से लगातार जीतते आ रहे हैं। वर्ष 2009 में उन्हें परास्त करने वाले प्रवीण सिंह ऐरन को सपा ने इस बार फिर यहां से उतार दिया है। पहली सूची में गंगवार का नाम नहीं होने की वजह से यहां भाजपा के निर्णय पर सबकी नजर टिकी है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बरेली से आठ बार के सांसद संतोष गंगवार की सियासत में अब उम्र बाधा बन रही है। वर्ष 2009 को छोड़कर गंगवार वर्ष 1989 से लगातार जीतते आ रहे हैं। वर्ष 2009 में उन्हें परास्त करने वाले प्रवीण सिंह ऐरन को सपा ने इस बार फिर यहां से उतार दिया है। पहली सूची में गंगवार का नाम नहीं होने की वजह से यहां भाजपा के निर्णय पर सबकी नजर टिकी है।
भाजपा के फैसले पर वरुण का सियासी सफर
पीलीभीत सीट को दो बार फतह कर चुके भाजपा के फायरब्रांड रहे वरुण गांधी पर भी उहापोह है। फिलहाल उन्होंने नामांकन पत्र खरीद कराकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। ऐसे में उनके चौंकाने वाले फैसले से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर, भाजपा के निर्णय पर ही उनका आगे का सियासी सफर तय होगा। फिलहाल, सपा ने यहां पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार के नाम का एलान कर दिया है।
पीलीभीत सीट को दो बार फतह कर चुके भाजपा के फायरब्रांड रहे वरुण गांधी पर भी उहापोह है। फिलहाल उन्होंने नामांकन पत्र खरीद कराकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। ऐसे में उनके चौंकाने वाले फैसले से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर, भाजपा के निर्णय पर ही उनका आगे का सियासी सफर तय होगा। फिलहाल, सपा ने यहां पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार के नाम का एलान कर दिया है।
धर्मेंद्र के सामने हैट्रिक की चुनौती
आंवला सीट पर भाजपा ने धर्मेंद्र कश्यप पर तीसरी बार भरोसा जताया है। ऐसे में उनके सामने भी हैट्रिक की अग्नि परीक्षा को पार करना बड़ी चुनौती होगी। सपा ने यहां से नीरज मौर्य को प्रत्याशी बनाया है। वहीं सपा से इस्तीफा देने वाले आबिद अली को बसपा ने यहां से प्रत्याशी घोषित किया है।
आंवला सीट पर भाजपा ने धर्मेंद्र कश्यप पर तीसरी बार भरोसा जताया है। ऐसे में उनके सामने भी हैट्रिक की अग्नि परीक्षा को पार करना बड़ी चुनौती होगी। सपा ने यहां से नीरज मौर्य को प्रत्याशी बनाया है। वहीं सपा से इस्तीफा देने वाले आबिद अली को बसपा ने यहां से प्रत्याशी घोषित किया है।
विपक्ष के गढ़ में हैट्रिक की चुनौती
लगातार दो बार से शाहजहांपुर सीट पर काबिज भाजपा के सामने हैट्रिक की चुनौती होगी। 1962 में अस्तित्व में आई शाहजहांपुर सीट पर पहली बार वर्ष 1989 में भाजपा ने खाता खोला और 1991 व 1998 में हुए चुनाव में अपना दबदबा बरकरार रखा। इससे पहले वर्ष 1996 के चुनाव में यह सीट सपा के खाते में गई और वर्ष 1999 से एक दशक तक कांग्रेस के पास रही। वर्ष 2009 में सपा ने इस पर कब्जा किया और वर्ष 2014 से लगातार दो बार भाजपा ने अपना वर्चस्व कायम किया है।
लगातार दो बार से शाहजहांपुर सीट पर काबिज भाजपा के सामने हैट्रिक की चुनौती होगी। 1962 में अस्तित्व में आई शाहजहांपुर सीट पर पहली बार वर्ष 1989 में भाजपा ने खाता खोला और 1991 व 1998 में हुए चुनाव में अपना दबदबा बरकरार रखा। इससे पहले वर्ष 1996 के चुनाव में यह सीट सपा के खाते में गई और वर्ष 1999 से एक दशक तक कांग्रेस के पास रही। वर्ष 2009 में सपा ने इस पर कब्जा किया और वर्ष 2014 से लगातार दो बार भाजपा ने अपना वर्चस्व कायम किया है।
दिलचस्प होगा खीरी का मुकाबला
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र टेनी के तीसरी बार चुनावी मैदान में आने से बरेली मंडल से सटी लखीमपुर खीरी की सीट वीआईपी बन गई है। गठबंधन की ओर से यहां पूर्व विधायक उत्कर्ष वर्मा मैदान में हैं और बसपा की ओर से अभी पत्ते खुलने बाकी हैं। वर्ष 2009 से पहले तक खीरी सीट पर ज्यादातर एक ही परिवार का कब्जा रहा। यहां बाल गोविंद वर्मा लंबे समय तक कांग्रेस से सांसद रहे और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी उषा वर्मा सांसद रहीं। इसके बाद उनके बेटे रवि वर्मा सपा के साथ हो लिए और वह भी तीन बार सांसद रहे। हालांकि इस बार इस परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं है।
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र टेनी के तीसरी बार चुनावी मैदान में आने से बरेली मंडल से सटी लखीमपुर खीरी की सीट वीआईपी बन गई है। गठबंधन की ओर से यहां पूर्व विधायक उत्कर्ष वर्मा मैदान में हैं और बसपा की ओर से अभी पत्ते खुलने बाकी हैं। वर्ष 2009 से पहले तक खीरी सीट पर ज्यादातर एक ही परिवार का कब्जा रहा। यहां बाल गोविंद वर्मा लंबे समय तक कांग्रेस से सांसद रहे और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी उषा वर्मा सांसद रहीं। इसके बाद उनके बेटे रवि वर्मा सपा के साथ हो लिए और वह भी तीन बार सांसद रहे। हालांकि इस बार इस परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं है।
भाजपा की हैट्रिक या विपक्ष की वापसी
वर्ष 2008 के परिसीमन में अस्तित्व में आई बरेली मंडल से सटी धौरहरा लोकसभा सीट पर भी भाजपा के सामने हैट्रिक की चुनौती है। यहां अब तक तीन बार ही चुनाव हुए हैं और वर्ष 2009 के पहले चुनाव में कांग्रेस के जितिन प्रसाद सांसद बने थे। इसके बाद वर्ष 2014 में भाजपा ने इस सीट पर कब्जा जमाया और रेखा वर्मा सांसद बनी। वर्ष 2019 में भी भाजपा ने जीत हासिल की। हालांकि इस सीट के पहले सांसद जितिन प्रसाद इस समय भाजपा में हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं।
वर्ष 2008 के परिसीमन में अस्तित्व में आई बरेली मंडल से सटी धौरहरा लोकसभा सीट पर भी भाजपा के सामने हैट्रिक की चुनौती है। यहां अब तक तीन बार ही चुनाव हुए हैं और वर्ष 2009 के पहले चुनाव में कांग्रेस के जितिन प्रसाद सांसद बने थे। इसके बाद वर्ष 2014 में भाजपा ने इस सीट पर कब्जा जमाया और रेखा वर्मा सांसद बनी। वर्ष 2019 में भी भाजपा ने जीत हासिल की। हालांकि इस सीट के पहले सांसद जितिन प्रसाद इस समय भाजपा में हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं।