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कुदरत की असली मार तो इन्होंने झेली है
बरेली
Updated Fri, 01 May 2015 01:48 AM IST
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पहले सूखा और अब ओले के साथ बारिश की मार ने किसानों की हालत बिगाड़ दी है। इनमें सर्वाधिक नुकसान बटाई या ठेका की खेती करने वाले किसानों का हुआ है। फसल नुकसान के बाद भी उन्हें मालिकों को वादे के मुताबिक पूरा माल या दाम देना पड़ता है। जिले में इस श्रेणी के करीब अस्सी हजार किसान हैं जिनके नाम अपनी एक बीघा जमीन भी नहीं है। बावजूद यह मेहनतकश दूसरों की फसल को बटाई (आधी लागत और फसल का आधा हिस्सा) या ठेका प्रथा (प्रति कुंटल बीघा पर तय उत्पादन) पर करते हैं। इस स्थिति में तय होता है कि फसल ज्या हो या कम, खेत मालिक को उसका हिस्सा देना ही देना है। ओलावृष्टि से हुए नुकसान के बाद बटाई और ठेके पर खेती करने वाले किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। कुछ मामलों में खेत मालिक ने दया करके अपना हिस्सा कम या माफ कर दिया है पर अधिकांश मामलों में उन्होंने सख्ती से अपना हिस्सा वसूला है। इससे छोटे किसान की कमर टूट गई है। ऐसे कई किसान गेहूं निकासी के बाद गांव छोड़कर पलायन भी कर चुके हैं।
दस किसान कर चुके आत्महत्या
जिले में फसल नुकसान के सदमे या आत्महत्या से करीब पचास किसानों की मौत का दावा उनके घरवाले कर रहे हैं। इनमें करीब दस किसान इसी श्रेणी के थे जिन्होंने दूसरे की फसल ठेके या बटाई पर ली थी। हालांकि इन सभी मौतों के बारे में प्रशासन की रिपोर्ट बिल्कुल भिन्न है। वह इसे दैवीय आपदा की श्रेणी में मानने को तैयार नहीं है। मानवीय आधार पर मुआवजे की संस्तुति की गई है। भूमि जोत न होने के कारण शासन से मुआवजा संस्तुति के आसार नजर नहीं आते।
नहीं मिलता योजनाओं का लाभ
जमीन नाम न होने की वजह से इस श्रेणी के किसानों का पंजीकरण नहीं हो पाता और शासन उन्हें किसी योजना का लाभ नहीं दे पाता। किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि लोन, कृषि यंत्र वितरण, बीज अथवा खाद वितरण में भी इन्हें किसी तरह का लाभ नहीं मिलता। फसल बरबादी का मुआवजा भी भूमिधारक किसानों को ही मिलता है। यह उससे भी वंचित रह जाते हैं।
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साहूकार करते हैं शोषण
भूमि न होने की वजह से इस श्रेणी के किसानों को बैंक या किसी सहकारी संस्था से कर्ज नहीं मिल पाता। ऐसे में यह पूरी तरह से साहूकारों पर आश्रित होते हैं। साहूकार इन्हें आठ से दस फीसदी वार्षिक ब्याज दर पर कर्ज देते हैं। जमानत के तौर पर कर्ज से कहीं ज्यादा मूल्य की संपत्ति या जेवर आदि भी अपने पास सुरक्षित रखते हैं। कर्ज चुकता न कर पाने पर चक्रवृद्धि ब्याज लगता है और कुछ साल में जमानत जब्त हो जाती है।
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दस किसान कर चुके आत्महत्या
जिले में फसल नुकसान के सदमे या आत्महत्या से करीब पचास किसानों की मौत का दावा उनके घरवाले कर रहे हैं। इनमें करीब दस किसान इसी श्रेणी के थे जिन्होंने दूसरे की फसल ठेके या बटाई पर ली थी। हालांकि इन सभी मौतों के बारे में प्रशासन की रिपोर्ट बिल्कुल भिन्न है। वह इसे दैवीय आपदा की श्रेणी में मानने को तैयार नहीं है। मानवीय आधार पर मुआवजे की संस्तुति की गई है। भूमि जोत न होने के कारण शासन से मुआवजा संस्तुति के आसार नजर नहीं आते।
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नहीं मिलता योजनाओं का लाभ
जमीन नाम न होने की वजह से इस श्रेणी के किसानों का पंजीकरण नहीं हो पाता और शासन उन्हें किसी योजना का लाभ नहीं दे पाता। किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि लोन, कृषि यंत्र वितरण, बीज अथवा खाद वितरण में भी इन्हें किसी तरह का लाभ नहीं मिलता। फसल बरबादी का मुआवजा भी भूमिधारक किसानों को ही मिलता है। यह उससे भी वंचित रह जाते हैं।
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साहूकार करते हैं शोषण
भूमि न होने की वजह से इस श्रेणी के किसानों को बैंक या किसी सहकारी संस्था से कर्ज नहीं मिल पाता। ऐसे में यह पूरी तरह से साहूकारों पर आश्रित होते हैं। साहूकार इन्हें आठ से दस फीसदी वार्षिक ब्याज दर पर कर्ज देते हैं। जमानत के तौर पर कर्ज से कहीं ज्यादा मूल्य की संपत्ति या जेवर आदि भी अपने पास सुरक्षित रखते हैं। कर्ज चुकता न कर पाने पर चक्रवृद्धि ब्याज लगता है और कुछ साल में जमानत जब्त हो जाती है।