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कानून के जरिये औलाद से अपना हक ले सकते हैं बुजुर्ग
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बरेली। औलाद के सताए बुजुर्गों को अगर अपने अधिकार पता हों तो वह अपने नालायक बेटे या बेटी को कानून की मदद से सबक सिखा सकते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में वह कोर्ट के जरिये उनसे अपने गुजारे का खर्च ले सकते हैं।
बार काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष और सदस्य शिरीष मेहरोत्रा बताते हैं कि संविधान में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए खास प्रावधान किए गए हैं। उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कानून भी हैं। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्गों की देखभाल के लिए कई दिशा-निर्देश भी दिए हैं। घरेलू हिंसा, आपसी मतभेद और संपत्ति विवाद में बुजुर्गों से मारपीट जैसे मामलों से बुजुर्गों को उनका हक दिलाने के लिए, मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण व कल्याण अधिनियम 2007 में प्रावधान किए गए हैं। इस कानून में बुजुर्गों को कई अधिकार दिए गए हैं।
ये कहता है अधिनियम
- कोई भी वरिष्ठ नागरिक जिसकी आयु 60 या उससे ज्यादा है, जो अपनी आय या अपनी संपत्ति से होने वाली आय से अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है, वे अपने व्यस्क बच्चों या रिश्तेदारों से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। अभिभावकों में सगे और दत्तक माता-पिता और सौतेले माता और पिता भी शामिल हैं।
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- अधिनियम में ये भी प्रावधान है कि अगर रखरखाव का दावा करने वाले दादा-दादी या माता-पिता हैं और उनके बच्चे या पोता-पोती अभी नाबालिग हैं तो वे अपने रिश्तेदार जो उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी होगा, उस पर भी दावा कर सकते हैं।
- कोई वरिष्ठ नागरिक अगर इस शर्त पर अपनी संपत्ति उत्तराधिकारी के नाम कर चुका है कि वह उसकी आर्थिक और शारीरिक जरूरतों का भरण पोषण करेगा तो उसके ऐसा न करने पर वे अपनी संपत्ति उससे वापस भी ले सकते हैं।
- वरिष्ठ नागरिक अपने क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास अर्जी लगा सकते हैं। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व न्यायालय द्वारा अधिकतम दस हजार रुपये तक प्रतिमाह का भरण पोषण खर्च वरिष्ठ उन्हें दिला सकता है।
- वरिष्ठ नागरिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के प्रावधान के तहत भी न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायालय में भरण पोषण का आवेदन पेश कर सकते हैं। कानून यह भी है कि राज्य के हर जिले में कम से कम एक वृद्धाश्रम हो ताकि ऐसे वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई नहीं है, उनकी यहां देखभाल हो सके।
- सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गो के उपचार का अलग से प्रावधान है, उन्हें ज्यादा वक्त तक इंतजार ना करना पड़े इसके लिए अलग से लाइन की व्यवस्था होती है। वहीं, वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा या फिर उन्हें घर से निकाल देना एक गंभीर अपराध है, इसके लिए पांच हजार रुपये का जुर्माना या तीन महीने की कैद या दोनों हो सकते हैं।
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बार काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष और सदस्य शिरीष मेहरोत्रा बताते हैं कि संविधान में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए खास प्रावधान किए गए हैं। उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कानून भी हैं। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्गों की देखभाल के लिए कई दिशा-निर्देश भी दिए हैं। घरेलू हिंसा, आपसी मतभेद और संपत्ति विवाद में बुजुर्गों से मारपीट जैसे मामलों से बुजुर्गों को उनका हक दिलाने के लिए, मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण व कल्याण अधिनियम 2007 में प्रावधान किए गए हैं। इस कानून में बुजुर्गों को कई अधिकार दिए गए हैं।
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ये कहता है अधिनियम
- कोई भी वरिष्ठ नागरिक जिसकी आयु 60 या उससे ज्यादा है, जो अपनी आय या अपनी संपत्ति से होने वाली आय से अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है, वे अपने व्यस्क बच्चों या रिश्तेदारों से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। अभिभावकों में सगे और दत्तक माता-पिता और सौतेले माता और पिता भी शामिल हैं।
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- अधिनियम में ये भी प्रावधान है कि अगर रखरखाव का दावा करने वाले दादा-दादी या माता-पिता हैं और उनके बच्चे या पोता-पोती अभी नाबालिग हैं तो वे अपने रिश्तेदार जो उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी होगा, उस पर भी दावा कर सकते हैं।
- कोई वरिष्ठ नागरिक अगर इस शर्त पर अपनी संपत्ति उत्तराधिकारी के नाम कर चुका है कि वह उसकी आर्थिक और शारीरिक जरूरतों का भरण पोषण करेगा तो उसके ऐसा न करने पर वे अपनी संपत्ति उससे वापस भी ले सकते हैं।
- वरिष्ठ नागरिक अपने क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास अर्जी लगा सकते हैं। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व न्यायालय द्वारा अधिकतम दस हजार रुपये तक प्रतिमाह का भरण पोषण खर्च वरिष्ठ उन्हें दिला सकता है।
- वरिष्ठ नागरिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के प्रावधान के तहत भी न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायालय में भरण पोषण का आवेदन पेश कर सकते हैं। कानून यह भी है कि राज्य के हर जिले में कम से कम एक वृद्धाश्रम हो ताकि ऐसे वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई नहीं है, उनकी यहां देखभाल हो सके।
- सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गो के उपचार का अलग से प्रावधान है, उन्हें ज्यादा वक्त तक इंतजार ना करना पड़े इसके लिए अलग से लाइन की व्यवस्था होती है। वहीं, वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा या फिर उन्हें घर से निकाल देना एक गंभीर अपराध है, इसके लिए पांच हजार रुपये का जुर्माना या तीन महीने की कैद या दोनों हो सकते हैं।