{"_id":"57fd3b184f1c1bd87528eb6d","slug":"it-begins-to-allow-majesty-ramlila","type":"story","status":"publish","title_hn":"यहां रानी साहिबा की अनुमति से शुरू होती है रामलीला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यहां रानी साहिबा की अनुमति से शुरू होती है रामलीला
बरेली, ब्यूरो
Updated Wed, 12 Oct 2016 12:48 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चौधरी तालाब में 449 साल से हो रही रामलीला का गौरवशाली इतिहास है। इसकी शुरुआत कराने वाली रानी महालक्ष्मीबाई (रानी साहिबा) अब भले नहीं हैं लेकिन उनके समक्ष शीश झुकाकर रामलीला का मंचन करने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब कलाकार रानी साहिबा के सामने शीश झ़ुकाते थे लेकिन आज उनके नाम के फाटक पर शीश झुकाने के बाद ही मंचन को जाते हैं।
रानी साहिबा लखना स्टेट की महारानी हुआ करती थीं। तब लखना स्टेट बरेली से लेकर इटावा तक था। बरेली के 125 गांव इस स्टेट की सल्तनत में हुआ करते थे। शहर के साहूकारा-किला इलाके में चौधरी मोहल्ला में रानी साहब का भव्य महल हुआ करता था। यहां तक जाने के लिए फाटक आज भी है। इसे आज भी रानी साहिबा के फाटक के रूप में जाना जाता है। रामलीला कमेटी से जुड़े शांतनु रोहतगी बताते हैं कि रानी साहिबा जब तक जीवित रहीं, तब तक रामलीला के कलाकार मंचन को जाने से पहले उनसे अनुमति लेते थे और उनके समक्ष शीश झुकाकर रामलीला मंच पर पहुंचने थे। मंचन के बाद लौटकर रानी साहिबा का अभिवादन करने के बाद ही घर को जाते थे। रानी साहिबा के निधन के बाद तब रामलीला के कलाकारों ने मंचन से पहले रानी साहब के फाटक पर शीश झुकाने के बाद ही मंचन शुरू करने का सिलसिला शुरू कर दिया। यह एक तरह से रामलीला के संस्थापक के रूप में रानी साहिबा से मंचन की प्रतीकात्मक अनुमति जैसा था। इसके बाद से लगातार हर साल यह परंपरा निभाई जा रही है। आज भी हर दिन रामलीला के मंचन की शुरुआत करने से पहले राम, लक्ष्मण और सीता के स्वरूप फाटक पर पहुंचते हैं। पूजा भी करते हैं और इसके बाद रामलीला स्थल आ जाते हैं। रामलीला के समापन के बाद भी फाटक पर जाकर सिर झुकाते हैं। रोहतगी ने बताया कि रामलीला हार्टमैन कालेज के मैदान में चल रही है और अब चूंकि रानी साहिबा के फाटक और लीला स्थल के बीच चौधरी तालाब क्रासिंग बंद हो चुकी है इसलिए क्रासिंग का पुल पार करके कलाकारों को फाटक और रामलीला स्थल तक आना-जाना पड़ता है। ऐसे में उनको टेंपो की व्यवस्था की गई है। जबकि पिछले साल तक पैदल ही कलाकार आते-जाते थे।
विज्ञापन
रानी साहिबा लखना स्टेट की महारानी हुआ करती थीं। तब लखना स्टेट बरेली से लेकर इटावा तक था। बरेली के 125 गांव इस स्टेट की सल्तनत में हुआ करते थे। शहर के साहूकारा-किला इलाके में चौधरी मोहल्ला में रानी साहब का भव्य महल हुआ करता था। यहां तक जाने के लिए फाटक आज भी है। इसे आज भी रानी साहिबा के फाटक के रूप में जाना जाता है। रामलीला कमेटी से जुड़े शांतनु रोहतगी बताते हैं कि रानी साहिबा जब तक जीवित रहीं, तब तक रामलीला के कलाकार मंचन को जाने से पहले उनसे अनुमति लेते थे और उनके समक्ष शीश झुकाकर रामलीला मंच पर पहुंचने थे। मंचन के बाद लौटकर रानी साहिबा का अभिवादन करने के बाद ही घर को जाते थे। रानी साहिबा के निधन के बाद तब रामलीला के कलाकारों ने मंचन से पहले रानी साहब के फाटक पर शीश झुकाने के बाद ही मंचन शुरू करने का सिलसिला शुरू कर दिया। यह एक तरह से रामलीला के संस्थापक के रूप में रानी साहिबा से मंचन की प्रतीकात्मक अनुमति जैसा था। इसके बाद से लगातार हर साल यह परंपरा निभाई जा रही है। आज भी हर दिन रामलीला के मंचन की शुरुआत करने से पहले राम, लक्ष्मण और सीता के स्वरूप फाटक पर पहुंचते हैं। पूजा भी करते हैं और इसके बाद रामलीला स्थल आ जाते हैं। रामलीला के समापन के बाद भी फाटक पर जाकर सिर झुकाते हैं। रोहतगी ने बताया कि रामलीला हार्टमैन कालेज के मैदान में चल रही है और अब चूंकि रानी साहिबा के फाटक और लीला स्थल के बीच चौधरी तालाब क्रासिंग बंद हो चुकी है इसलिए क्रासिंग का पुल पार करके कलाकारों को फाटक और रामलीला स्थल तक आना-जाना पड़ता है। ऐसे में उनको टेंपो की व्यवस्था की गई है। जबकि पिछले साल तक पैदल ही कलाकार आते-जाते थे।
विज्ञापन