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Bareilly News: प्रवासी पक्षियों की पहचान व निगरानी भी अब एआई से
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बरेली। उत्तर प्रदेश के समृद्ध वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) और लाखों देश-विदेशी प्रवासी पक्षियों के संरक्षण कि दिशा में बरेली कॉलेज का एक अध्ययन सराहनीय पहल है। जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. राजेंद्र सिंह के निर्देशन में अमित कुमार सिंह ने यह अध्ययन किया है। उन्होंने एआई, उपग्रह छवियों, ड्रोन फोटोग्राफी और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम पर आधारित एकीकृत बायोडायवर्सिटी मॉडल तैयार किया है।
शोधार्थी अमित कुमार सिंह ने बताया कि वैश्विक पक्षी प्रवास के प्रमुख मार्ग सेंट्रल एशियन फ्लाईवे पर उत्तर प्रदेश अहम स्थान रखता है। हर साल सर्दी में साइबेरिया, मंगोलिया, चीन, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप से लाखों प्रवासी पक्षी यूपी की नदियों, झीलों और जलाशयों का रुख करते हैं।
राज्य के प्रमुख पक्षी विहारों जैसे बखीरा, सांडी, समसपुर, नवाबगंज, सुर सरोवर, ओखला और लाख बहोसी में 300 से अधिक प्रजातियों के जलपक्षी पहुंचते हैं। शोध में चिंता जताई गई है कि इन स्थलों पर शहरीकरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण के कारण इन प्राकृतिक आवासों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, जिससे पक्षियों का जीवन संकट पर है।
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बिना नुकसान पहुंचाए की जा सकेगी सटीक गणना
अध्ययन के अनुसार, एकीकृत एआई-असिस्टेड बायोडायवर्सिटी डाटाबेस मॉडल की तकनीक परंपरागत गणनाओं की सीमाओं से आगे बिना पक्षियों को नुकसान पहुंचाए उनकी प्रजातियों की स्वचालित पहचान, सटीक गणना और रियल टाइम निगरानी करेगी। इस तकनीक से उपग्रह छवियों और ड्रोन से ली गईं उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरों से जलाशयों की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी। साथ ही पक्षियों की आवाजों की स्वचालित रिकॉर्डिंग और ई-बर्ड या या आई नेचुरलिस्ट जैसे मोबाइल एप के जरिये आम नागरिकों की ओर से साझा किए गए डाटा को एक साथ जोड़ा जाएगा। मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग एल्गोरिदम के जरिये पक्षियों की प्रजातियों की ऑटोमेटिक पहचान और उनकी संख्या की सटीक गिनती संभव हो सकेगी। इससे वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों को पर्यावरणीय खतरों की समय रहते चेतावनी भी मिल सकेगी, जो रामसर स्थलों के प्रबंधन और भविष्य की नीतियों को तय करने में मददगार होगी। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत भारत की जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में दीर्घकालिक और टिकाऊ प्रयास साबित हो सकता है।
कोट :
इस अध्ययन के दौरान सभी शोध नैतिक मानदंडों और वैज्ञानिक दिशा-निर्देशों का पूर्ण पालन किया गया है। अध्ययन के किसी भी चरण में किसी भी पक्षी को न तो पकड़ा गया, न छुआ गया और न ही नियंत्रित किया गया। यह प्रायोगिक प्रक्रिया के अधीन भी नहीं रहा। - प्रो. राजेंद्र सिंह, प्रोफेसर, जंतु विज्ञान विभाग
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शोधार्थी अमित कुमार सिंह ने बताया कि वैश्विक पक्षी प्रवास के प्रमुख मार्ग सेंट्रल एशियन फ्लाईवे पर उत्तर प्रदेश अहम स्थान रखता है। हर साल सर्दी में साइबेरिया, मंगोलिया, चीन, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप से लाखों प्रवासी पक्षी यूपी की नदियों, झीलों और जलाशयों का रुख करते हैं।
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राज्य के प्रमुख पक्षी विहारों जैसे बखीरा, सांडी, समसपुर, नवाबगंज, सुर सरोवर, ओखला और लाख बहोसी में 300 से अधिक प्रजातियों के जलपक्षी पहुंचते हैं। शोध में चिंता जताई गई है कि इन स्थलों पर शहरीकरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण के कारण इन प्राकृतिक आवासों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, जिससे पक्षियों का जीवन संकट पर है।
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बिना नुकसान पहुंचाए की जा सकेगी सटीक गणना
अध्ययन के अनुसार, एकीकृत एआई-असिस्टेड बायोडायवर्सिटी डाटाबेस मॉडल की तकनीक परंपरागत गणनाओं की सीमाओं से आगे बिना पक्षियों को नुकसान पहुंचाए उनकी प्रजातियों की स्वचालित पहचान, सटीक गणना और रियल टाइम निगरानी करेगी। इस तकनीक से उपग्रह छवियों और ड्रोन से ली गईं उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरों से जलाशयों की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी। साथ ही पक्षियों की आवाजों की स्वचालित रिकॉर्डिंग और ई-बर्ड या या आई नेचुरलिस्ट जैसे मोबाइल एप के जरिये आम नागरिकों की ओर से साझा किए गए डाटा को एक साथ जोड़ा जाएगा। मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग एल्गोरिदम के जरिये पक्षियों की प्रजातियों की ऑटोमेटिक पहचान और उनकी संख्या की सटीक गिनती संभव हो सकेगी। इससे वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों को पर्यावरणीय खतरों की समय रहते चेतावनी भी मिल सकेगी, जो रामसर स्थलों के प्रबंधन और भविष्य की नीतियों को तय करने में मददगार होगी। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत भारत की जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में दीर्घकालिक और टिकाऊ प्रयास साबित हो सकता है।
कोट :
इस अध्ययन के दौरान सभी शोध नैतिक मानदंडों और वैज्ञानिक दिशा-निर्देशों का पूर्ण पालन किया गया है। अध्ययन के किसी भी चरण में किसी भी पक्षी को न तो पकड़ा गया, न छुआ गया और न ही नियंत्रित किया गया। यह प्रायोगिक प्रक्रिया के अधीन भी नहीं रहा। - प्रो. राजेंद्र सिंह, प्रोफेसर, जंतु विज्ञान विभाग