{"_id":"4ca92c203d76e44893cb6fd6b246264a","slug":"i-went-with-her-husband-s-funeral-performed-extended-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पति की शवयात्रा में साथ चलीं, मुखाग्नि भी दी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पति की शवयात्रा में साथ चलीं, मुखाग्नि भी दी
बरेली
Updated Sun, 03 Jan 2016 01:43 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरेली। ऊषारानी ने सहधर्मिणी बनकर पति की सेवा तो की ही, पति के लिए बेटे का धर्म भी निभा दिया। उन्होंने पति गोवर्धन श्रीवास्तव की चिता को मुखाग्नि दी। गोवर्धन नगर निगम में टैक्स इंस्पेक्टर थे। ब्रेन अटैक के बाद दिल्ली के राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उनका शुक्रवार को निधन हो गया। शनिवार को दोपहर पुरानाशहर के मोहल्ला कटराचांद खां स्थित घर से सैटेलाइट के पास स्थित गुलाबबाड़ी के लिए शवयात्रा रवाना हुई तो सबसे आगे ऊषा ही थीं। चिता सजाई गई तो ऊषा ने जब मुखाग्नि दी तो वहां मौजूद हर किसी की आंख नम हो गई।
गोवर्धन का कोई बेटा नहीं है। दो बेटियां ही हैं। 17 वर्षीय बड़ी बेटी खुशबू बरेली कॉलेज में बीकाम प्रथम वर्ष की छात्रा है और दूसरी 14 वर्षीय करुणा हाईस्कूल में पढ़ती है। परिवार में ही नहीं, निकट की रिश्तेदारियों में भी कोई पुरुष नहीं है। गोवर्धन के कोई भाई या भतीजा भी नहीं है। हालांकि ऊषा के मुखाग्नि देते वक्त कुछ रिश्तेदारों ने गोवर्धन के साढू के किसी बेटे से मुुखाग्नि दिलाने का सुझाव दिया लेकिन ऊषा इसके लिए राजी नहीं हुईं। बोली- उनके पति की इच्छा थी कि वही उनकी चिता को मुखाग्नि दे इसलिए यह काम वह खुद करेंगी। उनके इस निर्णय के बाद फिर किसी की नहीं चली।
बरेली में पहले भी कई लड़कियां अपनों को मुखाग्नि दे चुकी हैं। किसी ने अपने दादा तो किसी ने अपने पिता को तो मुखाग्नि दी लेकिन किसी महिला की ओर से पति को मुखाग्नि देने का यह खास मामला है। खास बात यह है कि यह कदम ऐसे परिवार में उठाया गया है, जो परंपरागत और रुढ़ीवादिता के लिए जाने जाते हैं। जाहिर है कि मुखाग्नि देने के पुरुषों के परंपरागत समझे जाने वाला अधिकार अब सिर्फ पढ़ीलिखी लड़कियों तक ही सीमित नहीं रह गया है, उसके लिए घरेलू महिलाएं भी जागरूक हुई हैं। ऊषा हाईस्कूल तक ही पढ़ीलिखी हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
गोवर्धन का कोई बेटा नहीं है। दो बेटियां ही हैं। 17 वर्षीय बड़ी बेटी खुशबू बरेली कॉलेज में बीकाम प्रथम वर्ष की छात्रा है और दूसरी 14 वर्षीय करुणा हाईस्कूल में पढ़ती है। परिवार में ही नहीं, निकट की रिश्तेदारियों में भी कोई पुरुष नहीं है। गोवर्धन के कोई भाई या भतीजा भी नहीं है। हालांकि ऊषा के मुखाग्नि देते वक्त कुछ रिश्तेदारों ने गोवर्धन के साढू के किसी बेटे से मुुखाग्नि दिलाने का सुझाव दिया लेकिन ऊषा इसके लिए राजी नहीं हुईं। बोली- उनके पति की इच्छा थी कि वही उनकी चिता को मुखाग्नि दे इसलिए यह काम वह खुद करेंगी। उनके इस निर्णय के बाद फिर किसी की नहीं चली।
विज्ञापन
बरेली में पहले भी कई लड़कियां अपनों को मुखाग्नि दे चुकी हैं। किसी ने अपने दादा तो किसी ने अपने पिता को तो मुखाग्नि दी लेकिन किसी महिला की ओर से पति को मुखाग्नि देने का यह खास मामला है। खास बात यह है कि यह कदम ऐसे परिवार में उठाया गया है, जो परंपरागत और रुढ़ीवादिता के लिए जाने जाते हैं। जाहिर है कि मुखाग्नि देने के पुरुषों के परंपरागत समझे जाने वाला अधिकार अब सिर्फ पढ़ीलिखी लड़कियों तक ही सीमित नहीं रह गया है, उसके लिए घरेलू महिलाएं भी जागरूक हुई हैं। ऊषा हाईस्कूल तक ही पढ़ीलिखी हैं।
विज्ञापन