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अधूरे बसेरों में कैसे कटे रैन, अलाव तक नहीं जल रहे

Fri, 03 Dec 2021 01:26 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 03 Dec 2021 01:26 AM IST
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How the rain was cut in the incomplete shelters, even the bonfire is not burning
रैन बसेरा में चादर दिखाता एक यात्री।
सार्वजनिक स्थानों पर ठिठुरते हुए रात काट रहे हैं बेघर और बेसहारा लोग
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बरेली। बृहस्पतिवार को बूंदाबांदी से मौसम का मिजाज बिगड़ गया। दिन भर बादल छाए रहे। अधिकतम तापमान 21.3 तो न्यूनतम 14.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। इसके बावजूद अब तक शहर में कहीं अलाव जलने शुरू नहीं हुए हैं। अस्थायी रैन बसेरे भी तैयार नहीं हुए हैं। स्थायी रैन बसेरों में अव्यवस्थाएं हावी हैं। नगर निगम अफसर चेत नहीं रहे हैं। इससे बेघर और बेसहारा लोगों के लिए सर्द रातें काटना मुश्किल होता जा रहा है। मौसम विभाग के अनुसार इसी सप्ताह से शीत लहर शुरू हो जाएगी। नगर आयुक्त अभिषेक आनंद ने बताया कि अलाव जल्द जलवाने शुरू किए जाएंगे। अस्थायी रैन बसेरों को बनाने का काम शुरू हो चुका है। यदि किसी स्थायी रैन बसेरे में दिक्कतें हैं तो उन्हें भी दूर किया जाएगा।
पुराना रोडवेज बस अड्डा
यहां रैन बसेरे के नाम पर अभी सिर्फ टिन शेड डाला गया है। अंदर सफाई तक नहीं हुई है। अब तक यहां तख्त भी नहीं डाले गए हैं। अलाव की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां सैकड़ों यात्री देर रात तक बसों के इंतजार में ठंड से ठिठुरते रहते हैं। सर्द रात में घंटों बसों का इंतजार करना यात्रियों के लिए मुसीबत साबित हो रहा है। इसके अलावा बेघर लोग भी प्लेटफार्म पर किसी तरह रात काट रहे हैं।
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नगर निगम के पास स्थायी रैन बसेरा
नगर निगम कार्यालय के पास में स्थायी रैन बसेरा बना हुआ है। यहां कोविड काल से पहले तख्त मंगाए गए थे। दो साल में अधिकतर तख्त टूट चुके हैं। इन्हें किसी तरह जोड़कर लगा दिया गया है। यह कभी भी टूट सकते हैं। रजाई अभी यहां नहीं डलवाई गई हैं। अलाव का भी कोई इंतजाम नहीं है।
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रेलवे जंक्शन
रेलवे जंक्शन के बाहर सैकड़ों बेसहारा लोग पेड़ के नीचे या खुले आसमान के नीचे रात काटते हैं। यहां रिक्शा चालक, मजदूर और बेसहारा लोग हर रात मौजूद रहते हैं। यहां अब तक अलाव की कोई व्यवस्था नहीं है। रैन बसेरा बनाने का काम भी शुरू नहीं किया गया है।

हजियापुर
हजियापुर में नगर निगम का स्थायी रैन बसेरा है। इसे अभी तक खोला ही नहीं गया है। न ही यहां अलाव की कोई व्यवस्था की गई है। यही हाल बाकरगंज रैन बसेरा की है। यहां रैन बसेरा बना है लेकिन रात नौ बजे के बाद गेट पर कोई आवाज भी देता रहे तो खोला नहीं जाता है।
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