बरेली। हिंदी इस देश में सिर्फ इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि वह हमारी राष्ट्रभाषा है बल्कि उसका सबसे बड़ा गुण उसकी मिठास है। मातृभाषा होने के नाते इस भाषा में मां जैसे अपनापन भी महसूस होता है लेकिन फिर भी यह विडंबना है कि अपनों के बीच ही हिंदी को वह सम्मान नहीं मिल पा रहा है जिसकी वह अधिकारी है। कई युवाओं और शिक्षकों का कहना है कि हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए जितनी बातें होती हैं अगर उनका जरा भी पालन हो तो हिंदी को पूरे देश की ही नहीं बल्कि विश्व की भाषा बनाया जा सकता है। सबसे अधिक आवश्यकता इस भाषा को रोजगार से जोड़ने की है ताकि युवाओं के बीच भी हिंदी की जड़ें मजबूत हो सकें। हिंदी का अपना व्यापक क्षेत्र है लेकिन उसकी क्षमताओं के विकास के लिए निरंतर प्रयास भी आवश्यक हैं।
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डॉ. ममता सिंह
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
भारतीय संस्कृति की आत्मा है हिंदी
हिंदी हमें एकता के सूत्र में बांधने वाली भाषा तो है ही, एक-दूसरे के प्रति प्रेम-स्नेह की अभिव्यक्ति का भी सशक्त माध्यम है। हिंदी हमें अपनापन देती हैं और सफलता के द्वार भी खोलती है। मुझे गर्व है कि मैंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की है। एमए और पीएचडी कर हिंदी शिक्षण को जीविका का भी माध्यम बनाया है। हिंदी शिक्षा, मनोरंजन, विज्ञापन के साथ कई क्षेत्रों में युवाओं के लिए भविष्य संवारने का सशक्त विकल्प है। यह अकेली भाषा है जो कोई भ्रम नहीं पैदा करती। सरल और सहज होने के साथ लिखने और बोलने में बहुत आसान है। हिंदी हमारी संस्कृति की आत्मा है और हमारे विचारों को भी सुदृढ़ आधार देती है। हम सबको अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करने के साथ उसके विकास के लिए समर्पण के साथ निरंतर प्रगतिशील रहना चाहिए। - डॉ. ममता सिंह, स्वतंत्र कलाकार ग्रीन पार्क (राजस्थान हिंद ग्रंथ अकादमी से कई पुस्तकें प्रकाशित)
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डॉ. श्यामपाल सिंह मौर्य
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हिंदी अब विश्व भाषा बनने को अग्रसर
अपनी अतुलनीय क्षमता से हिंदी भविष्य की विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है। जब मैंने बीए पास किया था तब एमए में विषयों के चयन को लेकर मैं और मेरे सहपाठी काफी संशय में थे। एक साथी ने मुझसे पूछा था कि मैं एमए में कौन सा विषय लूंगा। मैंने जवाब दिया हिंदी तो वह चौंक गए क्योंकि अंग्रेजी में मेरे बहुत अच्छे नंबर आए थे। मेरे साथी की यह प्रतिक्रिया इसलिए थी क्योंकि हिंदी को लेकर एक बड़े वर्ग में हीनभावना की मानसिकता है जबकि हिंदी राष्ट्रभाषा होने के साथ उसकी भाषिक और साहित्यिक गरिमा भी है। - डॉ. श्यामपाल सिंह मौर्य, विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग बरेली कॉलेज
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लक्ष्मी वर्मा
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हिंदी को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता
हिंदी में अलग ही मिठास है। यह वह भाषा है जिसके शब्दों में जादू है। इस भाषा को बच्चा भी बिना सिखाए बोलता है। बच्चा पहला शब्द मां बोलता है जो हिंदी का ही शब्द है। हिंदी को हर क्षेत्र में मजबूत बनाने की आवश्यकता है। हिंदी आर्थिक गतिविधियों का अंग बनेगी तभी उसे सही मायनों में वह सम्मान मिलेगा जिसकी वह अधिकारी है। अभी तो कॅरियर से जुड़े तमाम क्षेत्रों में हिंदी की उपेक्षा की जा रही है। जब हिंदी रोजगार से जुड़ेगी तो युवाओं में इसका वर्चस्व और भी ज्यादा व्यापक हो जाएगा। - लक्ष्मी वर्मा, शिक्षक
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अनिल कुमार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
करोड़ों लोगों की भाषा होने के बाद भी उपेक्षित
हिंदी की अलग पहचान है। हिंदी करोड़ों लोगों की भाषा ही नहीं है, उनके हृदय में भी बसती है। आवश्यकता इस बात है कि सरकारी कार्यालयों में उसका प्रयोग और ज्यादा व्यापक स्तर किया जाए। उच्च शैक्षिक संस्थाओं और बड़ी सेवाओं में भी हिंदी को उसका अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए। किंतु इसके विपरीत चिंता की बात है कि हिंदी को संकुचित किया जा रहा है। हिंदी के पैरोकार सार्वजनिक मंचों पर उसका गुणगान तो करते हैँ लेकिन उन्होंने हिंदी की सेवा के लिए उनका समर्पण भाव कम ही झलकता है। - अनिल कुमार, छात्र राजीवनगर