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साहब ! कई और भी हैं फर्जी डिग्री वालों के अस्पताल

Wed, 07 Aug 2019 01:27 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 07 Aug 2019 01:27 AM IST
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Health
पीलीभीत। लाश का इलाज करने और फर्जी डिग्री मामले ने शहर की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोल कर रखकर दी है। लेकिन फर्जी डिग्री वाले डॉक्टर शहर में और भी हैं। कई अस्पतालों के डॉक्टर बिना डिग्री के सर्जरी तक कर रहे हैं। पिछले दिनों अस्पतालों के सील करने की कार्रवाई के बाद कुछ अस्पताल खुल नहीं रहे हैं। इससे संशय और बढ़ गया।
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जिले की प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधा की बात करें तो आंकड़ों में महज 80 अस्पताल पंजीकृत हैं, जबकि खुलेआम चार से पांच सौ अस्पताल संचालित हो रहे हैं। उनमें मरीजों को देखकर दवाएं देने के साथ ही सर्जरी भी धड़ल्ले से की जा रही है। इसके पीछे सिस्टम की साठगांठ अहम वजह है। अफसर भले ही इसको लेकर सख्त दावे करें लेकिन खेल उन्हीं के कार्यालयों से हो रहा है। इसकी हकीकत लाश का इलाज करने वाले अस्पताल पर हुई कार्रवाई से साफ है। इसी तरह से कई अन्य अस्पतालों में डॉक्टर जिनके पास ऑपरेशन करने से संबंधित डिग्रियां तक नहीं हैं, वे भी स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की मेहरबानी से मरीजों को लूटने का काम कर रहे हैं। रिन्यूवल के समय डिग्रियां की जांच करने के नाम पर कार्यालय में बैठे बैठाए ही रिपोर्ट तैयार कर ली जाती है।
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इस तरह चलता है पंजीकरण रिन्यूवल में खेल
बीएएमएस डिग्री के चिकित्सकों का पंजीकरण क्षेत्रीय आयुर्वेदिक/ यूनानी कार्यालय और अस्पताल तथा नर्सिंग होम्स का पंजीकरण सीएमओ कार्यालय में होता है। सीएमओ कार्यालय में रिन्यूवल के लिए फाइल पहुंचती है तो लिपिक डॉक्टर को कार्यालय बुलाकर पहले तो दस्तावेजों में तमाम खामियां गिनाई जाती हैं। बाद में सेटिंग होने पर सारी खामियों पर पर्दा डाल दिया जाता है।
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नेटवर्क इतना मजबूत कि अफसरों को कर देते हैं खमोश
बिना पंजीकरण और फर्जी डिग्री पर चल रहे अस्पताल संचालकों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि वे स्वास्थ्य विभाग के अलावा कुछ प्रशासनिक अफसरों को खुश करने में भी पीछे नहीं रहते। यह और बात है कि जब कोई बड़ा मामला आता है तो फजीहत से बचने के लिए कार्रवाई करनी ही पड़ती है।

पंजीकृत अस्पताल करीब 80, फर्जी 400 से अधिक
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में करीब 80 छोटे-बड़े अस्पतालों का सीएमओ कार्यालय में पंजीकरण है। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल इतर है। सूत्रों की मानें तो 400 से अधिक अस्पताल संचलित हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी कार्यालय में 234 क्लीनिकों का पंजीकरण हैं।

पंजीकरण क्लीनिक का, करते हैं प्रसव
जिले में बहुत से अस्पताल ऐसे हैं, जिन्होंने अपना पंजीकरण क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी कार्यालय में केवल क्लीनिक का करवा रखा है। साठगांठ के चलते यहां भी ओपीडी के साथ प्रसव होते हैं। इनमें गांव की दाइयां प्रसव कराती हैं। कई बार असुरक्षित प्रसव होने के कारण जच्चा-बच्चा की मौत के भी कई मामले हो चुके हैं।

पूरनपुर में पड़ा छापा, लेकिन नहीं हुई कार्रवाई
पिछले दिनों डीएम के यहां हुई शिकायत पर स्वास्थ्य विभाग की टीम ने पूरनपुर के एक नर्सिंग होम पर छापा मारा था। जांच में तमाम अनियमितताएं मिलीं थीं। यहां सिर्फ पैथेलॉजी लैब सील करने की कार्रवाई की गई। नर्सिंग होम संचालक पर भी सख्त कार्रवाई का दावा किया गया, लेकिन बाद में मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 0000

किराए पर डिग्री दे रहे डॉक्टर
एमबीबीएस डॉक्टर ही अस्पताल का पंजीकरण करा सकते हैं। सूत्रों की मानें तो कुछ लोग एमबीबीएस की डिग्री लगाकर पंजीकरण करा लेते हैं, जिसके बदले में संबंधित डॉक्टर द्वारा अस्पताल संचालक से हर महीने धनराशि वसूली जाती है।

दो अस्पतालों को लेकर चर्चा का बाजार गर्म
शहर में दो अस्पताल इन दिनों चर्चा में है। इनमें एक अस्पताल ने शटर गिरा रखा है। यह अस्पताल महिला चिकित्सक का है। उनके पास बीएएमएस की डिग्री है। लिहाजा इसका पंजीकरण आयुर्वेदिक यूनानी अधिकारी कार्यालय में था। 20 मार्च को पंजीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद इसका रिन्यूवल नहीं कराया गया। इसके बाद तीन महीने तक अस्पताल में ऑपरेशन के साथ मरीजों का इलाज भी होता रहा।

नाम गुम जाएगा,,चोला ये बदल जाएगा
पीलीभीत। मैकूलाल अस्पताल के सील होने के बाद अब प्रबंधन ने उसे चलाने के लिए नया पंजीकरण कराने की कोशिशें तेज कर दी हैं। अस्पताल संचालक डॉ. योगेंद्र नाथ की एमएस और एमसीएच की डिग्री जांच में फर्जी पाए जाने और उन पर लाश को वेंटिलेटर पर रखकर इलाज के नाम पर एक लाख रुपये वसूलने के आरोप की पुष्टि के बाद अस्पताल प्रबंधन डॉ. योगेंद्र की पत्नी डॉ. दिव्या मिश्रा के नाम से अस्पताल का पंजीकरण कराने की कवायद में लगा है।
इधर, मंगलवार सुबह करीब साढ़े दस बजे डॉ. दिव्या मिश्रा अपने अधिवक्ता के साथ सीएमओ कार्यालय पहुंची। यहां वह मैकूलाल अस्पताल के नए पंजीकरण के लिए आई थीं। सीएमओ की गैरमौजूदगी में एसीएमओ डॉ. वीर बहादुर राम मिले, लेकिन उन्होंने कागजात रिसीव करने से इंकार कर दिया। इस पर चिकित्सक के साथ आए अधिवक्ता का पारा चढ़ गया। दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। हंगामा होने पर स्टाफ के लोग आ गए और दोनों को शांत कराया। इसके बाद अधिवक्ता एसीएमओ के व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए लौट गए। एसीएमओ ने बताया कि मैकूलाल अस्पताल का पंजीकरण अब तक डॉ.योगेंद्रनाथ के नाम से था। अब पंजीकरण उनकी पत्नी डॉ.दिव्या मिश्रा के नाम से कराने के लिए आए थे।


मैकूलाल अस्पताल के सील होने के बाद अब उसे चलाने के लिए डॉ. दिव्या के नाम से नया पंजीकरण होना है। इससे संबंधित अभिलेख डॉ. दिव्या से देने के लिए कहा गया था। सोमवार सुबह कार्यालय में मेरी अनुपस्थिति में एसीएमओ और अधिवक्ता के बीच हुई कहासुनी का मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। पूर्व में अस्पताल के पंजीकरण और रिन्यूवल किस तरह किए जाते रहे इसकी मुझे जानकारी नहीं। मेरे चार्ज लाने के बाद रिन्यूवल से संबंधित कोई फाइल पैंडिंग नहीं है। अगर कोई अस्पताल संचालक पंजीकरण या रिन्यूवल के वक्त लिपिक से सीधे संपर्क करता है और उसकी फाइल पर ध्यान नहीं दिया जा रहा तो इसके लिए आवेदक खुद भी जिम्मेदार है। मेरे अलावा किसी एसीएमओ से इसको लेकर कोई शिकायत भी नहीं की गई है।
-डॉ. सीमा अग्रवाल, सीएमओ
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