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ग्रीन बेल्ट को खुला क्षेत्र लिखकर दे दी कब्जे की खुली छूट
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डीएम आवास के पास टनकपुर हाईवे किनारे ग्रीन बेल्ट में बने मकान।
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। मास्टर प्लान 2011 खत्म होने वाला है। अगले मास्टर प्लान की तैयारी चल रही है। मगर, पुराने मास्टर प्लान मेें शामिल ग्रीन लैंड का हाईवे किनारे कहीं पता नहीं चल रहा। मास्टर प्लान 2011 में ग्रीन लैंड को खुला क्षेत्र दर्शा दिया गया। अफसरों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। नतीजा यह निकला कि टनकपुर हाईवे पर नौगवा चौराहे से कचहरी तिराहे तक अधिकांश स्थानों पर ग्रीन बेल्ट की हरियाली को ठिकाने लगाकर अनाधिकृत कब्जे कर लिए गए। हालांकि अब अफसर प्रस्तावित मास्टर प्लान में ग्रीन लैंड शामिल कराने की बात कर रहे हैं।
एक समय था, जब ठंडी सड़क के नाम से मशहूर टनकपुर हाइवे के दोनों ओर हरियाली देखकर राहगीर कुछ पल ठहरकर उसका आनंद लेते थे। मई-जून की गर्मी में घने पेड़ों की छाया में राहगीर घंटों आराम करते थे। मगर अब यह बीते जमाने की बात हो चुकी हैं। उस समय शहर की आबादी एक लाख से भी कम थी। उस समय के मास्टर प्लान में यह अनुमान लगाया गया कि आने वाले समय में शहर की आबादी 2.5 लाख होगी। बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर 2011 के मास्टर प्लान बनाने की रुपरेखा 1990-2000 के दशक में शुरू हो गई थी। शहर के किस इलाके में क्या बनेगा, किस रोड पर अस्पताल, किस रोड पर स्टेडियम होगा, कामर्शियल एरिया कहां बनाया जाएगा, ग्रीन बेल्ट कहां होगी, इन सबका जिक्र मास्टर प्लान में था।
शहर को सुनियोजित ढंग से बसाने को लेकर पहले मास्टर प्लान को वर्ष 1998 में शासन की स्वीकृति मिली और मास्टर प्लान 2011 में लागू कर दिया गया। मगर, यह सिर्फ कागजों में ही लागू रहा। माफियाओं ने मनमाने तरीके से अनाधिकृत कॉलोनियां बना डालीं। नजूल की जमीनों पर कब्जे कर लिए। यहां तक कि प्लॉटिंग करने वाले भू-माफियाओं ने ग्रीन बेल्ट की जमीन भी नहीं छोड़ी। अब हाईवे पर ग्रीन लैंड खोजने से नहीं मिल रही तो इसके लिए पूरा सिस्टम ही जिम्मेदार है।
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मास्टर प्लान 2011 कागजों में तो लागू हो गया, लेकिन अफसरों ने उसे धरातल पर लागू कराने में रुचि नहीं दिखाई। माफियाओं ने तो मास्टर प्लान को तवज्जो ही नहीं दी। इससे शहर का भूगोल ही बिगड़ गया। औद्योगिक क्षेत्र में अवैध कॉलोनियां बन गईं और आबादी वाले क्षेत्रों में इंडस्ट्रीज खड़ी कर दी गईं। प्रशासन की अनदेखी के चलते हाईवे की सड़कों के किनारे बनी ग्रीन बेल्ट पर कब्जे होने शुरू हो गए। जमीन कारोबार से जुड़े माफियाओं ने ग्रीन बेल्ट में लगे पेड़ों को कटवाकर सुनियोजित तरीके से पहले उनमें खोखे या छोटी मोटी दुकान खोली। जब उनको पूरी तरह से संतुष्टि मिल गई कि अब कोई अफसर उंगली नहीं उठाएगा तो उस स्थान पर आसान किस्तों में प्लाट बिक्री का बोर्ड लगाकर उस जगह को बेच डाला।
गायब हो गई ग्रीन लैँड
शहर के नौगवां चौराहा से कचहरी तिराहा तक जाने वाले टनकपुर हाइवे पर निगाह डाले तो अधिकांश स्थानों से हरियाली पूरी तरह गायब हैं। कहीं खोखे खुले हैं तो कहीं दुकानें। नौगवां चौराहे से डिग्री कॉलेज चौराहा तक और गौहनिया चौराहा से कचहरी चौराहा तक हाइवे के दोनों ओर अब भी ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे होते जा रहे हैं।
पड़ताल हुई तो उजागर हुआ मामला
ग्रीन बेल्ट पर हो रहे कब्जों को लेकर जब ‘अमर उजाला’ ने विनियमित क्षेत्र कार्यालय से पता किया गया तो वहां मास्टर प्लान 2011 का नक्शा खोलकर दिखाया। मानचित्र में ग्रीन लैंड की जगह पर खुला क्षेत्र लिखा पाया गया। मास्टर प्लान 2011 में ग्रीन लैंड का कहीं जिक्र ही नहीं है। इस मामले में जब उच्चाधिकारियों से जानकारी की गई तो उनका कहना था कि प्रस्तावित मास्टर प्लान 2031 में खुले क्षेत्र को ग्रीन लैंड का दर्ज किया जाएगा।
मेरे संज्ञान में ग्रीन बेेल्ट में अतिक्रमण का मामला नहीं आया है। मगर, मुझसे पहले जो अधिकारी रहे, उनके कार्यकाल में ग्रीन लैंड की जमीन पर कब्जे के मामले हो सकते हैं। फिलहाल, इस मामले को दिखवाया जाएगा। प्रस्तावित मास्टर प्लान में खुले क्षेत्र को ग्रीन लैंड में दर्ज कराने के प्रयास किए जाएंगे। -अरुण कुमार सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट
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एक समय था, जब ठंडी सड़क के नाम से मशहूर टनकपुर हाइवे के दोनों ओर हरियाली देखकर राहगीर कुछ पल ठहरकर उसका आनंद लेते थे। मई-जून की गर्मी में घने पेड़ों की छाया में राहगीर घंटों आराम करते थे। मगर अब यह बीते जमाने की बात हो चुकी हैं। उस समय शहर की आबादी एक लाख से भी कम थी। उस समय के मास्टर प्लान में यह अनुमान लगाया गया कि आने वाले समय में शहर की आबादी 2.5 लाख होगी। बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर 2011 के मास्टर प्लान बनाने की रुपरेखा 1990-2000 के दशक में शुरू हो गई थी। शहर के किस इलाके में क्या बनेगा, किस रोड पर अस्पताल, किस रोड पर स्टेडियम होगा, कामर्शियल एरिया कहां बनाया जाएगा, ग्रीन बेल्ट कहां होगी, इन सबका जिक्र मास्टर प्लान में था।
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शहर को सुनियोजित ढंग से बसाने को लेकर पहले मास्टर प्लान को वर्ष 1998 में शासन की स्वीकृति मिली और मास्टर प्लान 2011 में लागू कर दिया गया। मगर, यह सिर्फ कागजों में ही लागू रहा। माफियाओं ने मनमाने तरीके से अनाधिकृत कॉलोनियां बना डालीं। नजूल की जमीनों पर कब्जे कर लिए। यहां तक कि प्लॉटिंग करने वाले भू-माफियाओं ने ग्रीन बेल्ट की जमीन भी नहीं छोड़ी। अब हाईवे पर ग्रीन लैंड खोजने से नहीं मिल रही तो इसके लिए पूरा सिस्टम ही जिम्मेदार है।
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मास्टर प्लान 2011 कागजों में तो लागू हो गया, लेकिन अफसरों ने उसे धरातल पर लागू कराने में रुचि नहीं दिखाई। माफियाओं ने तो मास्टर प्लान को तवज्जो ही नहीं दी। इससे शहर का भूगोल ही बिगड़ गया। औद्योगिक क्षेत्र में अवैध कॉलोनियां बन गईं और आबादी वाले क्षेत्रों में इंडस्ट्रीज खड़ी कर दी गईं। प्रशासन की अनदेखी के चलते हाईवे की सड़कों के किनारे बनी ग्रीन बेल्ट पर कब्जे होने शुरू हो गए। जमीन कारोबार से जुड़े माफियाओं ने ग्रीन बेल्ट में लगे पेड़ों को कटवाकर सुनियोजित तरीके से पहले उनमें खोखे या छोटी मोटी दुकान खोली। जब उनको पूरी तरह से संतुष्टि मिल गई कि अब कोई अफसर उंगली नहीं उठाएगा तो उस स्थान पर आसान किस्तों में प्लाट बिक्री का बोर्ड लगाकर उस जगह को बेच डाला।
गायब हो गई ग्रीन लैँड
शहर के नौगवां चौराहा से कचहरी तिराहा तक जाने वाले टनकपुर हाइवे पर निगाह डाले तो अधिकांश स्थानों से हरियाली पूरी तरह गायब हैं। कहीं खोखे खुले हैं तो कहीं दुकानें। नौगवां चौराहे से डिग्री कॉलेज चौराहा तक और गौहनिया चौराहा से कचहरी चौराहा तक हाइवे के दोनों ओर अब भी ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे होते जा रहे हैं।
पड़ताल हुई तो उजागर हुआ मामला
ग्रीन बेल्ट पर हो रहे कब्जों को लेकर जब ‘अमर उजाला’ ने विनियमित क्षेत्र कार्यालय से पता किया गया तो वहां मास्टर प्लान 2011 का नक्शा खोलकर दिखाया। मानचित्र में ग्रीन लैंड की जगह पर खुला क्षेत्र लिखा पाया गया। मास्टर प्लान 2011 में ग्रीन लैंड का कहीं जिक्र ही नहीं है। इस मामले में जब उच्चाधिकारियों से जानकारी की गई तो उनका कहना था कि प्रस्तावित मास्टर प्लान 2031 में खुले क्षेत्र को ग्रीन लैंड का दर्ज किया जाएगा।
मेरे संज्ञान में ग्रीन बेेल्ट में अतिक्रमण का मामला नहीं आया है। मगर, मुझसे पहले जो अधिकारी रहे, उनके कार्यकाल में ग्रीन लैंड की जमीन पर कब्जे के मामले हो सकते हैं। फिलहाल, इस मामले को दिखवाया जाएगा। प्रस्तावित मास्टर प्लान में खुले क्षेत्र को ग्रीन लैंड में दर्ज कराने के प्रयास किए जाएंगे। -अरुण कुमार सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट