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सोच लीजिए! अपने बच्चों को मेमोरी लॉस डिप्रेशन और अस्थमा से कैसे बचाएंगे
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बरेली। कोई समझे न समझे लेकिन हालात यही इशारा कर रहे हैं कि हम लोग अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाने वाले हैं। शायद एक ऐसी दुनिया जिसमें एक स्वस्थ जीवन जीना बड़ी चुनौती होगी। बचपन से ही शरीर में जड़ें जमाने वाली अस्थमा, डिप्रेशन और मेमोरी लॉस जैसी तमाम शारीरिक और मानसिक बीमारियां उस वक्त उनकी सबसे कड़ी परीक्षा ले रही होंगी जब वयस्क होने के बाद उनके सामने जिंदगी सबसे बड़ी चुनौतियां पेश कर रही होगी। विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि अगर हम अभी अपनी बेपरवाही से उबरकर अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोच लें तो शायद उनके जीवन की मुश्किलें कुछ कम हो जाएं।
बाल दिवस से बेहतर और कोई दिन नहीं होगा जब बढ़ते प्रदूषण के आने वाले प्रभावों को महसूस कर लें क्योंकि यह आने वाली पीढ़ी की जिंदगी का सवाल है। विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि देश भर में लोगों को यह समझना होगा कि दिल्ली में प्रदूषण की वजह से स्कूलों को बंद करने की नौबत आने वाले समय में बड़े शहरों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। जिसे विकास समझा जा रहा है, वह दरअसल विकास नहीं बल्कि विनाश है। हम न बच्चों को साफ हवा दे पा रहे हैं न साफ पानी। कानफोड़ू शोर उनकी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है। बच्चे हर वक्त हर जगह प्रदूषण से घिरे हुए हैं। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य, व्यक्तित्व और शारीरिक-मानसिक विकास पर पड़ रहा है।
हारमोन को प्रभावित कर रहा है प्रदूषण
प्रदूषण किसी भी बच्चे को व्यक्तित्व, शारीरिक एवं मानसिक विकास और सांवेगिक (इमोशनल) रूप से प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण से स्रावित ग्रंथियां प्रभावित होती हैं और शरीर को कम ऑक्सीजन मिलने से शारीरिक विकास बाधित होने लगता है। इससे उनकी लंबाई बढ़ना धीमा या अचानक तेज हो जाता है। ध्वनि प्रदूषण से सीखने, याद करने और सोचने की क्षमता बाधित होती है। कई बार लगातार अच्छी नींद नहीं मिलती तो बच्चा डिप्रेशन में चला जाता है। उसमें चिड़चिड़ापन, नाखून काटने, बिस्तर गीला करना जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। उसकी उम्र अगर दस साल है तो वह छह साल के बच्चे की तरह व्यवहार शुरू कर देता है। लंबे समय तक इस स्थिति में मानसिक स्थिति बिगड़ने जैसे हालात बन जाते हैं।
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- डॉ. सुविधा शर्मा, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, बरेली कॉलेज
अशुद्ध पानी बना रहा है पेट का मरीज
बच्चे नाजुक होते हैं और बढ़ते वायु प्रदूषण से उनके फेफड़े प्रभावित हो रहे हैं। उन्हें बड़े मैदान में साफ हवा में खेलने को प्रेरित करना जरूरी है। जहां तेज आवाज हो, वहां बच्चों को भेजने से बचें। 20 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि उनके लिए घातक है। बच्चों में पेट की सभी बीमारियों का कारण पानी है और आजकल स्वच्छ पानी मिलना मुश्किल हो गया है। आरओ भी बहुत भरोसे मंद नहीं, बेहतर होगा पानी उबालकर पिलाएं।
- डॉ. गिरीश अग्रवाल, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ
वायु प्रदूषण से अस्थमा का खतरा
वायु प्रदूषण के चलते बच्चों में अस्थमा और एलर्जी की समस्या बढ़ रही है। बच्चों को मॉस्क तो हर समय नहीं लगाया जा सकता, बेहतर होगा ज्यादा प्रदूषण वाली जगह पर बच्चों को जाने से रोकें। यही स्थिति ध्वनि प्रदूषण की है और बच्चों की सुनने की क्षमता बाधित होने लगती है। जिला अस्पताल में बच्चों में सबसे ज्यादा डायरिया, टायफायड की बीमारी सामने आती है, जिसका कारण जल प्रदूषण ही होता है।
- डॉ. कर्मेंद्र, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल
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बाल दिवस से बेहतर और कोई दिन नहीं होगा जब बढ़ते प्रदूषण के आने वाले प्रभावों को महसूस कर लें क्योंकि यह आने वाली पीढ़ी की जिंदगी का सवाल है। विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि देश भर में लोगों को यह समझना होगा कि दिल्ली में प्रदूषण की वजह से स्कूलों को बंद करने की नौबत आने वाले समय में बड़े शहरों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। जिसे विकास समझा जा रहा है, वह दरअसल विकास नहीं बल्कि विनाश है। हम न बच्चों को साफ हवा दे पा रहे हैं न साफ पानी। कानफोड़ू शोर उनकी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है। बच्चे हर वक्त हर जगह प्रदूषण से घिरे हुए हैं। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य, व्यक्तित्व और शारीरिक-मानसिक विकास पर पड़ रहा है।
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हारमोन को प्रभावित कर रहा है प्रदूषण
प्रदूषण किसी भी बच्चे को व्यक्तित्व, शारीरिक एवं मानसिक विकास और सांवेगिक (इमोशनल) रूप से प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण से स्रावित ग्रंथियां प्रभावित होती हैं और शरीर को कम ऑक्सीजन मिलने से शारीरिक विकास बाधित होने लगता है। इससे उनकी लंबाई बढ़ना धीमा या अचानक तेज हो जाता है। ध्वनि प्रदूषण से सीखने, याद करने और सोचने की क्षमता बाधित होती है। कई बार लगातार अच्छी नींद नहीं मिलती तो बच्चा डिप्रेशन में चला जाता है। उसमें चिड़चिड़ापन, नाखून काटने, बिस्तर गीला करना जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। उसकी उम्र अगर दस साल है तो वह छह साल के बच्चे की तरह व्यवहार शुरू कर देता है। लंबे समय तक इस स्थिति में मानसिक स्थिति बिगड़ने जैसे हालात बन जाते हैं।
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- डॉ. सुविधा शर्मा, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, बरेली कॉलेज
अशुद्ध पानी बना रहा है पेट का मरीज
बच्चे नाजुक होते हैं और बढ़ते वायु प्रदूषण से उनके फेफड़े प्रभावित हो रहे हैं। उन्हें बड़े मैदान में साफ हवा में खेलने को प्रेरित करना जरूरी है। जहां तेज आवाज हो, वहां बच्चों को भेजने से बचें। 20 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि उनके लिए घातक है। बच्चों में पेट की सभी बीमारियों का कारण पानी है और आजकल स्वच्छ पानी मिलना मुश्किल हो गया है। आरओ भी बहुत भरोसे मंद नहीं, बेहतर होगा पानी उबालकर पिलाएं।
- डॉ. गिरीश अग्रवाल, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ
वायु प्रदूषण से अस्थमा का खतरा
वायु प्रदूषण के चलते बच्चों में अस्थमा और एलर्जी की समस्या बढ़ रही है। बच्चों को मॉस्क तो हर समय नहीं लगाया जा सकता, बेहतर होगा ज्यादा प्रदूषण वाली जगह पर बच्चों को जाने से रोकें। यही स्थिति ध्वनि प्रदूषण की है और बच्चों की सुनने की क्षमता बाधित होने लगती है। जिला अस्पताल में बच्चों में सबसे ज्यादा डायरिया, टायफायड की बीमारी सामने आती है, जिसका कारण जल प्रदूषण ही होता है।
- डॉ. कर्मेंद्र, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल