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विश्वविद्यालय में शोर- डेढ़ सौ करोड़ का खेल खुला मगर पर्दे के पीछे की कहानी सामने आना बाकी
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बरेली। डेढ़ सौ करोड़ की रकम प्राइवेट सेक्टर की कंपनी पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस में निवेश किए जाने का खेल खुलने के बाद रुहेलखंड विश्वविद्यालय के अफसरों ने अपनी गर्दन बचाने की जोड़तोड़ शुरू हो गई है। वित्त अधिकारी को जिम्मेदार बताते हुए मामले की जांच कराने पर जोर दे रहे कुलपति ने उनसे इस संबंध में अब तक कोई जवाब नहीं मांगा है। उधर, वित्त अधिकारी भी यह सफाई तो दे रहे हैं कि इस मामले में कोई नियम नहीं तोड़ा गया लेकिन इसके साथ धनराशि को हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से निकालकर फिर बैंक में जमा कराने भी की तैयारी कर रहे हैं। इस बीच विश्वविद्यालय की स्टाफ एसोसिएशन और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी परिषद ने कुलपति को ज्ञापन देकर धनराशि को वापस लाने की मांग की है।
बैंक में जमा डेढ़ सौ करोड़ रुपये प्राइवेट सेक्टर की कंपनी में निवेश किए जाने का मंगलवार को खुलासा होते ही विश्वविद्यालय में हड़कंप मच गया था। आरोप लगाए गए कि कुलपति प्रो. अनिल शुक्ला और वित्त अधिकारी सुरेश चंद्र उपाध्याय नियमविरुद्ध ढंग से यह धनराशि फाइनेंस कंपनी में निवेश कर दी। वित्त अधिकारी ने इस धनराशि को सिर्फ 35 करोड़ रुपये बता रहे हैं। उनका कहना है कि चूंकि पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस की ब्याज दर ज्यादा है, इसलिए इस कंपनी में निवेश किया गया। विश्वविद्यालय के कर्मचारी आरोप लगा रहे हैं कि नियमों के विरुद्ध डेढ़ सौ करोड़ रुपये हाउसिंग फाइनेंस में लगाने का खेल तो खुल गया लेकिन विश्वविद्यालय के अधिकारियों की इसके पीछे कंपनी से क्या डील हुई है, इसका खुलासा होना बाकी है। लिहाजा इस मामले में शासन को उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए।
सवाल पर सवाल.. विश्वविद्यालय के अफसर खामोश
भड़के कर्मचारी, पूछा- किसकी अनुमति दांव पर लगाई इतनी बड़ी रकम
बुधवार को विश्वविद्यालय की मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी परिषद ने कुलपति को संबोधित ज्ञापन में चार बिंदुओं पर सवाल उठाते हुए यह धनराशि 30 सितंबर तक वापस बैंक में जमा करने की मांग की है। ज्ञापन में चार सवाल करते हुए उन्होंने पूछा है कि किस नियम के तहत यह धनराशि फाइनेंस कंपनी में लगाई गई। कितनी धनराशि अब तक कंपनी को दी गई और कितनी अभी बाकी है। यह भी बताने को कहा है कि विश्वविद्यालय में इस समय कितनी राशि की एफडीआर मौजूद हैं और डेढ़ सौ करोड़ रुपये की धनराशि किसकी अनुमति से पीएनबी फाइनेंस में जमा की गई। इन सवालों का जवाब 27 सितंबर तक देने को कहा गया है।
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संकट में डूबे रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश का जोखिम क्यों
विश्वविद्यालय स्टाफ का यह भी कहना है कि नोटबंदी, जीएसटी और रेरा लागू होने के बाद रियल एस्टेट सेक्टर में लगातार गिरावट आ रही है। आम्रपाली, जेपी और सहारा जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियाें का हाल तक काफी खराब है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों को यह भी बताना चाहिए कि इसके बावजूद ऐसी क्या वजह थी जो इस डूबते हुए सेक्टर में डेढ़ सौ करोड़ रुपये का निवेश कर दिया गया।
कुलपति पर सवाल.. वित्त कमेटी में क्यों नहीं रखा मुद्दा
विश्वविद्यालय में कहा जा रहा है कि कुलपति भले ही इस मामले से पल्ला झाड़ रहे हों लेकिन वित्त कमेटी के वह अध्यक्ष होते हैं। मगर कमेटी के सामने यह प्रस्ताव रखने के बजाय कुलपति और वित्त अधिकारी ने आपसी रजामंदी से डेढ़ सौ करोड़ रुपये मनमुताबिक निवेश करने का फैसला ले लिया।
अब भुगतना पड़ेगा करोड़ों का नुकसान
वित्त अधिकारी सुरेश चंद्र उपाध्याय का कहना है कि अपनी जरूरत भर की राशि ही इसमें निवेश की गई थी, जिस पर 8.65 प्रतिशत की दर से ब्याज मिल रहा था। मगर कर्मचारियों की मांग है इसलिए यह धनराशि फाइनेंस कंपनी से निकालकर बैंक में जमा की जाएगी। समय से पहले यह धनराशि निकालने के चलते कुछ नुकसान उठाना पड़ेगा। सूत्रों के मुताबिक यह नुकसान करोड़ों में हो सकता है।
पुराना खेल: 1996 में भी मचा था घमासान
बताया जाता है कि वर्ष 1996-97 में ग्रुप इंश्योरेंस का पैसा मैच्योर होने से पहले ही निकालकर दूसरी कंपनी में निवेश किया गया था। इसकी वजह से आठ प्रतिशत धनराशि काट ली गई। इस कटौती पर विश्वविद्यालय में काफी घमासान मचा था और यह मामला अब भी फाइलों में दबा हुआ है।
स्टाफ एसोसिएशन और कर्मचारियों का ज्ञापन मिला है, उनको सूचनाएं उपलब्ध करा दी जाएंगी। मेरा कहना है कि इस मामले की जांच कराई जानी चाहिए और जो भी दोषी हों, उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। - प्रो. अनिल शुक्ला, कुलपति, रुहेलखंड विश्वविद्यालय
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बैंक में जमा डेढ़ सौ करोड़ रुपये प्राइवेट सेक्टर की कंपनी में निवेश किए जाने का मंगलवार को खुलासा होते ही विश्वविद्यालय में हड़कंप मच गया था। आरोप लगाए गए कि कुलपति प्रो. अनिल शुक्ला और वित्त अधिकारी सुरेश चंद्र उपाध्याय नियमविरुद्ध ढंग से यह धनराशि फाइनेंस कंपनी में निवेश कर दी। वित्त अधिकारी ने इस धनराशि को सिर्फ 35 करोड़ रुपये बता रहे हैं। उनका कहना है कि चूंकि पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस की ब्याज दर ज्यादा है, इसलिए इस कंपनी में निवेश किया गया। विश्वविद्यालय के कर्मचारी आरोप लगा रहे हैं कि नियमों के विरुद्ध डेढ़ सौ करोड़ रुपये हाउसिंग फाइनेंस में लगाने का खेल तो खुल गया लेकिन विश्वविद्यालय के अधिकारियों की इसके पीछे कंपनी से क्या डील हुई है, इसका खुलासा होना बाकी है। लिहाजा इस मामले में शासन को उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए।
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सवाल पर सवाल.. विश्वविद्यालय के अफसर खामोश
भड़के कर्मचारी, पूछा- किसकी अनुमति दांव पर लगाई इतनी बड़ी रकम
बुधवार को विश्वविद्यालय की मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी परिषद ने कुलपति को संबोधित ज्ञापन में चार बिंदुओं पर सवाल उठाते हुए यह धनराशि 30 सितंबर तक वापस बैंक में जमा करने की मांग की है। ज्ञापन में चार सवाल करते हुए उन्होंने पूछा है कि किस नियम के तहत यह धनराशि फाइनेंस कंपनी में लगाई गई। कितनी धनराशि अब तक कंपनी को दी गई और कितनी अभी बाकी है। यह भी बताने को कहा है कि विश्वविद्यालय में इस समय कितनी राशि की एफडीआर मौजूद हैं और डेढ़ सौ करोड़ रुपये की धनराशि किसकी अनुमति से पीएनबी फाइनेंस में जमा की गई। इन सवालों का जवाब 27 सितंबर तक देने को कहा गया है।
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संकट में डूबे रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश का जोखिम क्यों
विश्वविद्यालय स्टाफ का यह भी कहना है कि नोटबंदी, जीएसटी और रेरा लागू होने के बाद रियल एस्टेट सेक्टर में लगातार गिरावट आ रही है। आम्रपाली, जेपी और सहारा जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियाें का हाल तक काफी खराब है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों को यह भी बताना चाहिए कि इसके बावजूद ऐसी क्या वजह थी जो इस डूबते हुए सेक्टर में डेढ़ सौ करोड़ रुपये का निवेश कर दिया गया।
कुलपति पर सवाल.. वित्त कमेटी में क्यों नहीं रखा मुद्दा
विश्वविद्यालय में कहा जा रहा है कि कुलपति भले ही इस मामले से पल्ला झाड़ रहे हों लेकिन वित्त कमेटी के वह अध्यक्ष होते हैं। मगर कमेटी के सामने यह प्रस्ताव रखने के बजाय कुलपति और वित्त अधिकारी ने आपसी रजामंदी से डेढ़ सौ करोड़ रुपये मनमुताबिक निवेश करने का फैसला ले लिया।
अब भुगतना पड़ेगा करोड़ों का नुकसान
वित्त अधिकारी सुरेश चंद्र उपाध्याय का कहना है कि अपनी जरूरत भर की राशि ही इसमें निवेश की गई थी, जिस पर 8.65 प्रतिशत की दर से ब्याज मिल रहा था। मगर कर्मचारियों की मांग है इसलिए यह धनराशि फाइनेंस कंपनी से निकालकर बैंक में जमा की जाएगी। समय से पहले यह धनराशि निकालने के चलते कुछ नुकसान उठाना पड़ेगा। सूत्रों के मुताबिक यह नुकसान करोड़ों में हो सकता है।
पुराना खेल: 1996 में भी मचा था घमासान
बताया जाता है कि वर्ष 1996-97 में ग्रुप इंश्योरेंस का पैसा मैच्योर होने से पहले ही निकालकर दूसरी कंपनी में निवेश किया गया था। इसकी वजह से आठ प्रतिशत धनराशि काट ली गई। इस कटौती पर विश्वविद्यालय में काफी घमासान मचा था और यह मामला अब भी फाइलों में दबा हुआ है।
स्टाफ एसोसिएशन और कर्मचारियों का ज्ञापन मिला है, उनको सूचनाएं उपलब्ध करा दी जाएंगी। मेरा कहना है कि इस मामले की जांच कराई जानी चाहिए और जो भी दोषी हों, उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। - प्रो. अनिल शुक्ला, कुलपति, रुहेलखंड विश्वविद्यालय