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आचमन लायक नहीं नदियों का जल.. कैसे होगी पूजा
बरेली
Updated Tue, 24 Oct 2017 01:37 AM IST
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सूर्योपासना का लोकपर्व छठ पूजा आज से प्रारंभ हो रहा है। चार दिन तक चलने वाले छठ पर्व में अस्ताचलगामी सूर्य को तालाब, पोखर या नदी के जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का परायण किया जाता है। बरेली में पूर्वांचल और बिहार की 10 हजार से ज्यादा आबादी इस पर्व को पूरे उत्साह से मनाती है। मगर, यहां रामगंगा के अलावा नकटिया और किला नदियों का जल प्रदूषण की वजह से आचमन के लायक ही नहीं है। 24 घंटे पहले नदी के घाटों की साफ-सफाई भी नहीं कराई गई है। रामगंगा के किनारे खंडित मूर्तियां और कचरा जमा होने से खड़ा होना भी मुश्किल है। त्योहार मनाने वाले श्रद्धालुओं को यही चिंता सता रही है कि वह नदियों के प्रदूषित जल से कैसे आचमन करेंगे। अमर उजाला ने रामगंगा, किला और नकटिया नदियों की पड़ताल की। प्रस्तुत है लाइव रिपोर्ट।
फोटो-
रामगंगा
रामगंगा के घाटों की हर साल श्रद्धालुओं को खुद ही साफ-सफाई करनी पड़ती है। प्रशासन इसमें कोई सहयोग नहीं करता। त्योहार से दो दिन पहले घाटों की सफाई शुरू हो जाती थी लेकिन इस बार इस बार घाटों पर इस कदर गंदगी है कि उसे कुछ लोगों के बूते नहीं हटाया जा सकता। सोमवार 1.30 बजे जब अमर उजाला की टीम रामगंगा नदी किनारे पहुंची तो घाटों पर देवी देवताओं की खंडित मूर्तियां, पूजा सामग्री, जानवरों के अपशिष्ट समेत तमाम कचरा जमा मिला। कूड़ा बीनने वाले दो बच्चे नदी पर आने वाले लोगों से पैसे मांग रहे थे। अफसर भी घाटों का निरीक्षण करके निकल रहे थे लेकिन किसी भी घाट की सफाई नहीं दिखी। रामगंगा के किनारे के घाट पक्के नहीं बने हैं।
फोटो-
किला नदी
बरेली से पहले तक इस नदी को देवरनियां नदी भी कहा जाता है। बरेली में प्रवेश करते ही सैदपुर हाकिंस, नर्सरी रोड, कर्मचारीनगर, बाईपास से होकर बाकरगंज और किला पुल के नीचे नदी के दोनों ओर अतिक्रमण है। शहर के नाले-नालियों और फैक्ट्रियों का गंदा और प्रदूषित जल इसी नदी में गिरता है। कहीं-कहीं तो इतना प्रदूषण हैं कि नदी का पानी काला दिखता है। आगे चलकर यह नदी भी रामगंगा में मिल जाती है। डॉक्टरों की मानें तो इस प्रदूषित जल में स्नान करने से चर्म रोग की आशंका रहती है। अगर नदी साफ सुथरी होती तो श्रद्धालु नदी के किनारे छठ पूजा की परंपरा निभा सकते थे।
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फोटो-
नकटिया नदी
रिठौरा से बरेली में प्रवेश करते ही नकटिया नदी में बड़ी संख्या में नाले-नालियों और सीवर का पानी गिरता है। बैरियर टू, कुसुमनगर, डोहरा रोड पर नदी के दोनों किनारों पर कूडे़े के ढेर जमा है। ग्रीन पार्क और गोल्डन ग्रीन पार्क समेत तमाम कॉलोनियों के सीवर का मुंह नदी में खुला है। नाले-नालियों और सीवर का पानी गिरने से बीसलपुर रोड, हरूनगला से कैंट और ठिरिया निजावत खां तक नदी का पानी पूरी तरह काला होकर निष्प्रयोज्य है। ऐसे में नदी के बजाय पूर्वांचल के मूल निवासी परिवार मंदिर और तालाबों के घाटों की खुद सफाई कर छठ पर्व की परंपराओं का पालन करते हैं।
क्या कहते हैं श्रद्धालु
फोटो-
देवरनियां नदी शहर से बाहर नैनीताल रोड पर थोड़ा बहुत साफ है लेकिन वहां जाने का रास्ता ठीक नहीं है। खेतों से होकर जाना पड़ता है। रामगंगा के किनारे कचरा और खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं। प्रशासन को त्योहार से पहले कम से कम सफाई तो करानी ही चाहिए।
- संजय कुमार पांडेय, वाइस प्रेसीडेंट भोजपुरी समाज
फोटो-
रामगंगा नदी किनारे पूर्वांचल के रहने वाले बहुत से परिवार खुद घाटों की सफाई करके त्योहार मनाते हैं। प्रशासन से कोई मदद नहीं मिलती है। नदी के घाट पक्के हो जाएं और इनकी ठीक से सफाई हो, तब त्योहार की पवित्रता बनी रहेेगी।
- प्रमोद सिंह बागी, मूल निवासी (बलिया)
फोटो-
बरेली की रामगंगा, किला और नकटिया नदी किनारे कूड़ा, कचरा का साम्राज्य तो है ही, नदियों का जल भी प्रदूषित है। नदी के किनारे पहुंचते ही ऐसी बदबू से सामना होता है कि सांस लेना मुश्किल। ऐसे में छठ या अन्य त्योहार मनाने में दिक्कतें आती हैं। सरकार और जनता दोनों को जागरूक होना चाहिए। - मनोज कुमार सिंह, श्रद्धालु
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रामगंगा
रामगंगा के घाटों की हर साल श्रद्धालुओं को खुद ही साफ-सफाई करनी पड़ती है। प्रशासन इसमें कोई सहयोग नहीं करता। त्योहार से दो दिन पहले घाटों की सफाई शुरू हो जाती थी लेकिन इस बार इस बार घाटों पर इस कदर गंदगी है कि उसे कुछ लोगों के बूते नहीं हटाया जा सकता। सोमवार 1.30 बजे जब अमर उजाला की टीम रामगंगा नदी किनारे पहुंची तो घाटों पर देवी देवताओं की खंडित मूर्तियां, पूजा सामग्री, जानवरों के अपशिष्ट समेत तमाम कचरा जमा मिला। कूड़ा बीनने वाले दो बच्चे नदी पर आने वाले लोगों से पैसे मांग रहे थे। अफसर भी घाटों का निरीक्षण करके निकल रहे थे लेकिन किसी भी घाट की सफाई नहीं दिखी। रामगंगा के किनारे के घाट पक्के नहीं बने हैं।
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किला नदी
बरेली से पहले तक इस नदी को देवरनियां नदी भी कहा जाता है। बरेली में प्रवेश करते ही सैदपुर हाकिंस, नर्सरी रोड, कर्मचारीनगर, बाईपास से होकर बाकरगंज और किला पुल के नीचे नदी के दोनों ओर अतिक्रमण है। शहर के नाले-नालियों और फैक्ट्रियों का गंदा और प्रदूषित जल इसी नदी में गिरता है। कहीं-कहीं तो इतना प्रदूषण हैं कि नदी का पानी काला दिखता है। आगे चलकर यह नदी भी रामगंगा में मिल जाती है। डॉक्टरों की मानें तो इस प्रदूषित जल में स्नान करने से चर्म रोग की आशंका रहती है। अगर नदी साफ सुथरी होती तो श्रद्धालु नदी के किनारे छठ पूजा की परंपरा निभा सकते थे।
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नकटिया नदी
रिठौरा से बरेली में प्रवेश करते ही नकटिया नदी में बड़ी संख्या में नाले-नालियों और सीवर का पानी गिरता है। बैरियर टू, कुसुमनगर, डोहरा रोड पर नदी के दोनों किनारों पर कूडे़े के ढेर जमा है। ग्रीन पार्क और गोल्डन ग्रीन पार्क समेत तमाम कॉलोनियों के सीवर का मुंह नदी में खुला है। नाले-नालियों और सीवर का पानी गिरने से बीसलपुर रोड, हरूनगला से कैंट और ठिरिया निजावत खां तक नदी का पानी पूरी तरह काला होकर निष्प्रयोज्य है। ऐसे में नदी के बजाय पूर्वांचल के मूल निवासी परिवार मंदिर और तालाबों के घाटों की खुद सफाई कर छठ पर्व की परंपराओं का पालन करते हैं।
क्या कहते हैं श्रद्धालु
फोटो-
देवरनियां नदी शहर से बाहर नैनीताल रोड पर थोड़ा बहुत साफ है लेकिन वहां जाने का रास्ता ठीक नहीं है। खेतों से होकर जाना पड़ता है। रामगंगा के किनारे कचरा और खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं। प्रशासन को त्योहार से पहले कम से कम सफाई तो करानी ही चाहिए।
- संजय कुमार पांडेय, वाइस प्रेसीडेंट भोजपुरी समाज
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रामगंगा नदी किनारे पूर्वांचल के रहने वाले बहुत से परिवार खुद घाटों की सफाई करके त्योहार मनाते हैं। प्रशासन से कोई मदद नहीं मिलती है। नदी के घाट पक्के हो जाएं और इनकी ठीक से सफाई हो, तब त्योहार की पवित्रता बनी रहेेगी।
- प्रमोद सिंह बागी, मूल निवासी (बलिया)
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बरेली की रामगंगा, किला और नकटिया नदी किनारे कूड़ा, कचरा का साम्राज्य तो है ही, नदियों का जल भी प्रदूषित है। नदी के किनारे पहुंचते ही ऐसी बदबू से सामना होता है कि सांस लेना मुश्किल। ऐसे में छठ या अन्य त्योहार मनाने में दिक्कतें आती हैं। सरकार और जनता दोनों को जागरूक होना चाहिए। - मनोज कुमार सिंह, श्रद्धालु