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सांसद जी विकास के वादे पर कितने पाबंद.. अफसर बेहतर जानते हैं
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16वीं लोकसभा की सांसद निधि भी अब तक खर्च नहीं
पीएफएमएस के तहत कार्यदायी संस्थाओं के खाते न खुलवाने से अटका हुआ है सांसद निधि का ट्रांजेक्शन, सांसद भी भूले
बरेली। पब्लिक को सपनों की दुनिया में माथापच्ची करते रहने के लिए कैद करने की कला ही ‘राजनीति’ की गुणवत्ता है। सियासत के इसी हुनर से अफसरशाही भी प्रेरणा लेती है और यही वजह है कि विकास की तमाम योजनाएं अटकी रह जाती हैं। नेता और अफसर भले ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराएं लेकिन असलियत इस बात से परखी जा सकती है कि कई सांसद अब तक 16वीं लोकसभा में मिली अपनी निधि की आखिरी किस्त का भी अब तक उपयोग नहीं कर पाए हैं। 17वीं लोकसभा की पहली किस्त भी अब तक उनके खातों की शोभा बढ़ा रही है। दरअसल कार्यदायी संस्थाओं ने अब तक पब्लिक फाइनेंसियल मैनेजमेंट सिस्टम यानी पीएमएफएस के तहत खाते नहीं खुलवाए हैं लिहाजा उनमें बजट का ट्रांजक्शन ही ठप पड़ा है।
सांसदों को जारी होने वाली निधि में पिछले सालों में देश भर में बड़े पैमाने पर दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद 17वीं लोकसभा का गठन होने के बाद केंद्र सरकार ने सांसद निधि की धनराशि को पीएफएमएस के तहत जारी किए जाने का नियम बना दिया था। इस व्यवस्था में सांसद निधि के एक-एक रुपये का हिसाब-किताब ऑनलाइन रहने का इंतजाम किया गया था और सांसद निधि में दुरुपयोग की संभावना खत्म हो गई थी। केंद्र सरकार की ओर से आठ महीने पहले यह आदेश जारी होने के फौरन बाद सांसदों के खाते तो खोल दिए गए, लेकिन कार्यदायी संस्थाओं ने अब तक अपने खाते नहीं खुलवाए हैं। नतीजा यह है कि सांसद निधि का पैसा अब तक सांसदों के खातों में ही डंप पड़ा है। सांसदी की ओर से भी कार्यदायी संस्थाओं पर पीएफएमएस के तहत खाते खुलवाने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है। हालांकि डीआरडीए के परियोजना निदेशक ने एक बार फिर सांसद निधि की धनराशि खातों में ट्रांसफर करने के लिए कार्यदायी संस्थाओं को जल्द पीएफएमएस खाते खुलवाने को पत्र लिखा है।
खातों में डंप हैं 10 करोड़
अफसरों के मुताबिक 17वीं लोकसभा की सांसद निधि की पहली किस्त के ढाई-ढाई करोड़ रुपये बरेली के सांसद संतोष गंगवार, आंवला के धर्मेंद्र कश्यप और पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी के खातों में भेज दी गई है। 16वीं लोकसभा के दौरान जारी सांसद निधि की अंतिम किस्त के भी तीनों सांसदों के खातों में करीब ढाई करोड़ रुपये भी अब तक व्यय नहीं हो पाए हैं। इस तरह करीब दस करोड़ रुपये की धनराशि खातों में डंप है, लेकिन न इस पर सांसदों की कोई तवज्जो है न कार्यदायी संस्थाएं ध्यान दे रही हैं।
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पहले दिए जाते थे चेक और कैश
पीएफएमएस लागू होने से पहले सांसद निधि को व्यय करने के सिस्टम में कोई भी पारदर्शिता नहीं थी जिसकी वजह से उसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी होता था। स्कूलों को फर्नीचर सप्लाई, बाउंड्री, रोड, सोलर लाइट समेत इंटरलॉकिंग सड़कों के निर्माण में बड़े पैमाने पर धांधली उजागर भी हुई थी। चूंकि भुगतान कैश या चेक की शक्ल में होता था लिहाजा उसकी मॉनीटरिंग करना भी काफी कठिन था। इसी वजह से पीएफएमएस प्रणाली के जरिये सांसद निधि के एक-एक रुपये का हिसाब रखने की व्यवस्था की गई है। इसमें कार्यदायी संस्थाओं के विकास कार्यों की फोटो समेत स्थलीय रिपोर्ट अपलोड करने के बाद ही अगली किस्त जारी होगी। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी।
वर्जन:
सांसद निधि के तहत जारी होने वाले बजट की पहली किस्त खातों में भेज दी गई है लेकिन कार्यदायी संस्थाओं के खाते न खुलने से बजट का ट्रांजक्शन नहीं हो पा रहा है। खाते खोलने के लिए कार्यदायी संस्थाओं को फिर पत्र लिखा गया है। - वीरेंद्र कुमार, पीडी डीआरडीए
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पीएफएमएस के तहत कार्यदायी संस्थाओं के खाते न खुलवाने से अटका हुआ है सांसद निधि का ट्रांजेक्शन, सांसद भी भूले
17वीं लोकसभा की पहली किस्त भी अब तक खातों में डंप, संतोष, धर्मेंद्र और वरुण की निधि से ठप पड़े हैं विकास कार्य
बरेली। पब्लिक को सपनों की दुनिया में माथापच्ची करते रहने के लिए कैद करने की कला ही ‘राजनीति’ की गुणवत्ता है। सियासत के इसी हुनर से अफसरशाही भी प्रेरणा लेती है और यही वजह है कि विकास की तमाम योजनाएं अटकी रह जाती हैं। नेता और अफसर भले ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराएं लेकिन असलियत इस बात से परखी जा सकती है कि कई सांसद अब तक 16वीं लोकसभा में मिली अपनी निधि की आखिरी किस्त का भी अब तक उपयोग नहीं कर पाए हैं। 17वीं लोकसभा की पहली किस्त भी अब तक उनके खातों की शोभा बढ़ा रही है। दरअसल कार्यदायी संस्थाओं ने अब तक पब्लिक फाइनेंसियल मैनेजमेंट सिस्टम यानी पीएमएफएस के तहत खाते नहीं खुलवाए हैं लिहाजा उनमें बजट का ट्रांजक्शन ही ठप पड़ा है।
सांसदों को जारी होने वाली निधि में पिछले सालों में देश भर में बड़े पैमाने पर दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद 17वीं लोकसभा का गठन होने के बाद केंद्र सरकार ने सांसद निधि की धनराशि को पीएफएमएस के तहत जारी किए जाने का नियम बना दिया था। इस व्यवस्था में सांसद निधि के एक-एक रुपये का हिसाब-किताब ऑनलाइन रहने का इंतजाम किया गया था और सांसद निधि में दुरुपयोग की संभावना खत्म हो गई थी। केंद्र सरकार की ओर से आठ महीने पहले यह आदेश जारी होने के फौरन बाद सांसदों के खाते तो खोल दिए गए, लेकिन कार्यदायी संस्थाओं ने अब तक अपने खाते नहीं खुलवाए हैं। नतीजा यह है कि सांसद निधि का पैसा अब तक सांसदों के खातों में ही डंप पड़ा है। सांसदी की ओर से भी कार्यदायी संस्थाओं पर पीएफएमएस के तहत खाते खुलवाने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है। हालांकि डीआरडीए के परियोजना निदेशक ने एक बार फिर सांसद निधि की धनराशि खातों में ट्रांसफर करने के लिए कार्यदायी संस्थाओं को जल्द पीएफएमएस खाते खुलवाने को पत्र लिखा है।
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खातों में डंप हैं 10 करोड़
अफसरों के मुताबिक 17वीं लोकसभा की सांसद निधि की पहली किस्त के ढाई-ढाई करोड़ रुपये बरेली के सांसद संतोष गंगवार, आंवला के धर्मेंद्र कश्यप और पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी के खातों में भेज दी गई है। 16वीं लोकसभा के दौरान जारी सांसद निधि की अंतिम किस्त के भी तीनों सांसदों के खातों में करीब ढाई करोड़ रुपये भी अब तक व्यय नहीं हो पाए हैं। इस तरह करीब दस करोड़ रुपये की धनराशि खातों में डंप है, लेकिन न इस पर सांसदों की कोई तवज्जो है न कार्यदायी संस्थाएं ध्यान दे रही हैं।
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पहले दिए जाते थे चेक और कैश
पीएफएमएस लागू होने से पहले सांसद निधि को व्यय करने के सिस्टम में कोई भी पारदर्शिता नहीं थी जिसकी वजह से उसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी होता था। स्कूलों को फर्नीचर सप्लाई, बाउंड्री, रोड, सोलर लाइट समेत इंटरलॉकिंग सड़कों के निर्माण में बड़े पैमाने पर धांधली उजागर भी हुई थी। चूंकि भुगतान कैश या चेक की शक्ल में होता था लिहाजा उसकी मॉनीटरिंग करना भी काफी कठिन था। इसी वजह से पीएफएमएस प्रणाली के जरिये सांसद निधि के एक-एक रुपये का हिसाब रखने की व्यवस्था की गई है। इसमें कार्यदायी संस्थाओं के विकास कार्यों की फोटो समेत स्थलीय रिपोर्ट अपलोड करने के बाद ही अगली किस्त जारी होगी। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी।
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सांसद निधि के तहत जारी होने वाले बजट की पहली किस्त खातों में भेज दी गई है लेकिन कार्यदायी संस्थाओं के खाते न खुलने से बजट का ट्रांजक्शन नहीं हो पा रहा है। खाते खोलने के लिए कार्यदायी संस्थाओं को फिर पत्र लिखा गया है। - वीरेंद्र कुमार, पीडी डीआरडीए