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खतौनियों में नाम खुरचवाया और बन गए जमींदार साहब
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
Updated Wed, 09 May 2018 06:19 PM IST
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फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में रईसों-माफिया और सरकारी बाबुओं के गठजोड़ के जरिये अरबों कीमत की जमीन कब्जाने के मामले में हैरतअंगेज तथ्यों का खुलासा हो रहा है। सबसे दिलचस्प तो यह है कि फतेहगंज पूर्वी का कुल रकबा ही 16 सौ बीघा है, जबकि रिकॉर्ड में गड़बड़ी के जरिये इस कस्बे की आठ सौ से करीब एक हजार बीघा यानी आधी से ज्यादा जमीन अकेले बेग फैमिली के नाम दर्ज हो चुकी है। माफिया और सरकारी बाबुओं के दुस्साहस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने जमींदारी से मुक्त हुई जमीन ही नहीं, बल्कि कुछ लोगों की निजी और स्वास्थ्य केंद्र, इंटर कॉलेज और सेना की जमीन भी नहीं छोड़ी। यह जमीन भी राजस्व अभिलेखों में बेग फैमिली के नाम दर्ज हो चुकी है।
अरबों की जमीन पर कब्जे के इस सनसनीखेज मामले में में शिकायत के बाद प्रशासन की ओर से एफआईआर तो दर्ज करा दी गई, लेकिन मामले की अपने स्तर पर गहराई से जांच कराने के बजाय प्रशासन ने भी हाथ खींच लिए। एफआईआर दर्ज कराने से पहले तत्कालीन एसीएम प्रथम की ओर से जरूर प्रारंभिक जांच की गई थी, जिसमें पता चला था कि जमीन को अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक नहीं बल्कि कई खतौनियों को रिकॉर्ड रूम से निकालकर उन पर पहले से चली आ रही मिल्कियत को ब्लेड से खुरचकर वहां बेग फैमिली के सदस्यों के नाम लिख दिए गए। खतौनियों को एक नहीं बल्कि कई जगह खुरचा गया है। अभिलेखों को देखने भर से यह जालसाजी साफ पता चल रही है।
यह जालसाजी तब पकड़ में आई जब एक जमींदार मुख्त्यार अली जिन्होंने अपनी जमीन बहादुर अली खां और कटरा के विधायक के बाबा सुरेंद्र पाल सिंह को बैनामा कर दी थी, उस जमीन की मिल्कियत से मुख्त्यार अली का नाम हटाकर माफिया ने अपने लोगों के नाम दर्ज करा दिए और फिर न्यायालय मेें यह आरोप लगाते हुए मुकदमा भी दायर कर दिया कि जब खतौनियों में जमीन मुख्तार अली आदि लोगों के नाम ही दर्ज नहीं है तो उन्होंने इस जमीन को दूसरे लोगों को कैसे बेच दिया। इसको लेकर मुत्त्शर अली के बेटे अख्तर अली और उस्मान अली ने शिकायतें की तब छानबीन शुरू हुई और जमीन घोटाले की परत दर परत खुलने लगीं। इसी दौरान पता लगा कि माफिया ने इसके साथ फतेहगंज के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र और एक इंटर कॉलेज के साथ सेना की कुछ जमीन पर अपना नाम दर्ज करा लिया है। प्रशासनिक रिकॉर्ड पर अगर यकीन करें तो करीब 16 सौ बीघे में बसे फतेहगंज पूर्वी में करीब आठ सौ-हजार बीघा, फरीदपुर में एक सौ अस्सी और बरेली मेें 633 बीघे जमीन के रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई है। अभिलेखों में यह हेराफेरी कई सालों से की जा रही थी।
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1380 फसली के चक्कर में खुली कहानी असली
फरीदपुर तहसील में एक-एक करके कई अभिलेखों में ब्लेड से खुरचकर जमीन की मिल्कियत बदल दी गई। मामले की छानबीन शुरू हुई तो यह दिक्कत सामने आई कि पुरानी खतौनियों में सभी के नाम ही गायब कर दिए गए, लिहाजा यह कैसे सिद्ध किया जाए कि जमीन की असली मिल्कियत किसके नाम दर्ज थी या इसके असली मालिक शिकायतकर्ता यानी मुुख्त्यार अली के बेटे अख्तर और उस्मान ही हैं। छानबीन के दौरान 1380 फसली की जांच की गई तो पाया गया कि जालसाज उसमें हेराफेरी करना भूल गए थे और उसमें असली जमींदारों के नाम दर्ज रह गए हैं। इस तरह 1380 फसली से असली कहानी सामने आ गई।
एसडीएम ने फर्जी खतौनियों पर टेप चिपकवाकर बिक्री का खेल रुकवाया
खतौनियों में फर्जीवाड़े का खेल शायद आगे भी नहीं रुकता लेकिन फरीदपुर के तत्कालीन एसडीएम प्रशांत शर्मा ने यह मामला जानकारी में आने के बाद खतौनियों को जहां-जहां ब्लेड से खुरचकर उसमें जालसाजी की गई थी, वहां-वहां पारदर्शी टेप लगवा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि भविष्य में खतौनियों में कोई और गड़बड़ करना मुमकिन नहीं रह गया और उसके बाद से आज तक ये खतौनियां जैसी की तैसी हैं।
दो आरोपी रिटायर, एक नवाबगंज तहसील में तैनात
फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में सैकड़ों बीघा जमीन के रिकॉर्ड में जालसाजी करने के मामले में नवाबगंज में तैनात एसडीएम अरुणमणि तिवारी ने सात लोगों के खिलाफ 13 अक्तूबर 2017 को कोतवाली बरेली में मुकदमा दर्ज कराया था। इनमें वाहिद बेग, ताहिर बेग, फैयाज बेग, मोहम्मद बेग और आसिफ बेग शामिल थे जो फतेहगंज पूर्वी के निवासी थे। माफिया के साथ साठगांठ के चलते राजस्व रिकार्ड में हेराफेरी करने वाले बाबुओं में राजेंद्रनगर निवासी विनोद कुमार सक्सेना और सुभाषनगर में बालाजी मंदिर के पीछे रहने वाली शैली जौहरी सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि ऊषा जयंत नवाबगंज तहसील में डब्लूबीएन के पद पर कार्यरत हैं। ऊषा जयंत ने बताया कि उनके ऊपर लगे आरोप निराधार हैं। रिकॉर्ड रूम का रखरखाव कर्मचारी ममता सक्सेना की देखरेख में होता था जिनकी अब मौत हो चुकी है। नकल उर्दू में जारी की जाती थी। उर्दू की जानकारी न होने के कारण अभिलेखों में क्या दर्ज किया जाता था, यह उन्हें नहीं पता। उनके खिलाफ जांच हो चुकी है और उसमें वह निर्दोष साबित हुई थीं।
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अरबों की जमीन पर कब्जे के इस सनसनीखेज मामले में में शिकायत के बाद प्रशासन की ओर से एफआईआर तो दर्ज करा दी गई, लेकिन मामले की अपने स्तर पर गहराई से जांच कराने के बजाय प्रशासन ने भी हाथ खींच लिए। एफआईआर दर्ज कराने से पहले तत्कालीन एसीएम प्रथम की ओर से जरूर प्रारंभिक जांच की गई थी, जिसमें पता चला था कि जमीन को अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक नहीं बल्कि कई खतौनियों को रिकॉर्ड रूम से निकालकर उन पर पहले से चली आ रही मिल्कियत को ब्लेड से खुरचकर वहां बेग फैमिली के सदस्यों के नाम लिख दिए गए। खतौनियों को एक नहीं बल्कि कई जगह खुरचा गया है। अभिलेखों को देखने भर से यह जालसाजी साफ पता चल रही है।
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यह जालसाजी तब पकड़ में आई जब एक जमींदार मुख्त्यार अली जिन्होंने अपनी जमीन बहादुर अली खां और कटरा के विधायक के बाबा सुरेंद्र पाल सिंह को बैनामा कर दी थी, उस जमीन की मिल्कियत से मुख्त्यार अली का नाम हटाकर माफिया ने अपने लोगों के नाम दर्ज करा दिए और फिर न्यायालय मेें यह आरोप लगाते हुए मुकदमा भी दायर कर दिया कि जब खतौनियों में जमीन मुख्तार अली आदि लोगों के नाम ही दर्ज नहीं है तो उन्होंने इस जमीन को दूसरे लोगों को कैसे बेच दिया। इसको लेकर मुत्त्शर अली के बेटे अख्तर अली और उस्मान अली ने शिकायतें की तब छानबीन शुरू हुई और जमीन घोटाले की परत दर परत खुलने लगीं। इसी दौरान पता लगा कि माफिया ने इसके साथ फतेहगंज के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र और एक इंटर कॉलेज के साथ सेना की कुछ जमीन पर अपना नाम दर्ज करा लिया है। प्रशासनिक रिकॉर्ड पर अगर यकीन करें तो करीब 16 सौ बीघे में बसे फतेहगंज पूर्वी में करीब आठ सौ-हजार बीघा, फरीदपुर में एक सौ अस्सी और बरेली मेें 633 बीघे जमीन के रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई है। अभिलेखों में यह हेराफेरी कई सालों से की जा रही थी।
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1380 फसली के चक्कर में खुली कहानी असली
फरीदपुर तहसील में एक-एक करके कई अभिलेखों में ब्लेड से खुरचकर जमीन की मिल्कियत बदल दी गई। मामले की छानबीन शुरू हुई तो यह दिक्कत सामने आई कि पुरानी खतौनियों में सभी के नाम ही गायब कर दिए गए, लिहाजा यह कैसे सिद्ध किया जाए कि जमीन की असली मिल्कियत किसके नाम दर्ज थी या इसके असली मालिक शिकायतकर्ता यानी मुुख्त्यार अली के बेटे अख्तर और उस्मान ही हैं। छानबीन के दौरान 1380 फसली की जांच की गई तो पाया गया कि जालसाज उसमें हेराफेरी करना भूल गए थे और उसमें असली जमींदारों के नाम दर्ज रह गए हैं। इस तरह 1380 फसली से असली कहानी सामने आ गई।
एसडीएम ने फर्जी खतौनियों पर टेप चिपकवाकर बिक्री का खेल रुकवाया
खतौनियों में फर्जीवाड़े का खेल शायद आगे भी नहीं रुकता लेकिन फरीदपुर के तत्कालीन एसडीएम प्रशांत शर्मा ने यह मामला जानकारी में आने के बाद खतौनियों को जहां-जहां ब्लेड से खुरचकर उसमें जालसाजी की गई थी, वहां-वहां पारदर्शी टेप लगवा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि भविष्य में खतौनियों में कोई और गड़बड़ करना मुमकिन नहीं रह गया और उसके बाद से आज तक ये खतौनियां जैसी की तैसी हैं।
दो आरोपी रिटायर, एक नवाबगंज तहसील में तैनात
फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में सैकड़ों बीघा जमीन के रिकॉर्ड में जालसाजी करने के मामले में नवाबगंज में तैनात एसडीएम अरुणमणि तिवारी ने सात लोगों के खिलाफ 13 अक्तूबर 2017 को कोतवाली बरेली में मुकदमा दर्ज कराया था। इनमें वाहिद बेग, ताहिर बेग, फैयाज बेग, मोहम्मद बेग और आसिफ बेग शामिल थे जो फतेहगंज पूर्वी के निवासी थे। माफिया के साथ साठगांठ के चलते राजस्व रिकार्ड में हेराफेरी करने वाले बाबुओं में राजेंद्रनगर निवासी विनोद कुमार सक्सेना और सुभाषनगर में बालाजी मंदिर के पीछे रहने वाली शैली जौहरी सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि ऊषा जयंत नवाबगंज तहसील में डब्लूबीएन के पद पर कार्यरत हैं। ऊषा जयंत ने बताया कि उनके ऊपर लगे आरोप निराधार हैं। रिकॉर्ड रूम का रखरखाव कर्मचारी ममता सक्सेना की देखरेख में होता था जिनकी अब मौत हो चुकी है। नकल उर्दू में जारी की जाती थी। उर्दू की जानकारी न होने के कारण अभिलेखों में क्या दर्ज किया जाता था, यह उन्हें नहीं पता। उनके खिलाफ जांच हो चुकी है और उसमें वह निर्दोष साबित हुई थीं।