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युवती को 1653 दिन की सजा: दुष्कर्म का झूठा मुकदमा कराने वाली महिलाओं के लिए सबक है कोर्ट का यह फैसला

Tue, 07 May 2024 06:22 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Updated Tue, 07 May 2024 06:22 AM IST
सार

बरेली में दुष्कर्म के मुकदमे में गवाही के दौरान बयान से मुकरने पर कोर्ट ने युवती को उतने ही दिन कैद की सजा सुनाई, जितने दिन आरोपी जेल में रहा था। अदालत का यह फैसला उन महिलाओं के लिए सबक है, जो पुरुषों को झूठे मुकदमे फंसा देती हैं। 

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Bareilly Court decision is a lesson for women who file false cases
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दुष्कर्म के मुकदमे में गवाही से मुकरने वाली युवती को 1,653 दिन कारावास की सजा सुनाई गई है। बरेली जिले में इस तरह का पहला मामला बताया जा रहा है। युवती को अदालत ने उतने दिन की सजा दी, जितने दिन युवक जेल में रहा था। माना जा रहा है कि यह फैसला दुष्कर्म का झूठा मुकदमा दर्ज कराने वाली महिलाओं के अंदर कानून का खौफ पैदा करेगा। उन्हें अब यह भी डर रहेगा कि झूठी गवाही देने या मुकरने पर वह खुद भी जेल जा सकती है।
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यह था मामला 
शहर के दुर्गानगर की महिला ने दो सितंबर, 2019 को बारादरी थाने में अजय नामक युवक पर बेटी के अपहरण व दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था। पुलिस ने अजय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। युवती ने अजय पर नशीला प्रसाद खिलाने और दिल्ली ले जाकर कमरे में बंद कर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। लेकिन, अदालत में गवाही के दौरान युवती मुकर गई। अदालत ने अजय को दोषमुक्त करार दिया, वहीं झूठी गवाही देने के लिए युवती पर मुकदमा चलाया। 
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शनिवार को अपर सत्र न्यायाधीश ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की अदालत ने युवती को 1,653 दिनों की सजा सुनाई थी। युवती ने पुलिस फिर अदालत में 164 के बयानों में कहा था कि अजय उसे नशा देकर दिल्ली ले गया था। वहां कमरे में बंधक बनाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। चार साल बाद गवाही के दौरान युवती इस बयान से मुकर गई तो 1,653 दिनों के बाद अजय जेल से रिहा हो सका। अदालत ने युवती को इतने ही दिन कारावास की सजा सुनाई।
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अदालत ने यह भी माना कि अगर अजय जेल में नहीं होता तो 1,653 दिनों में न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से 5,88,822 रुपये कमाता। इतना ही जुर्माना युवती पर डाला गया। अधिवक्ता अजय लक्ष्मी ने बताया कि अमूमन दुष्कर्म के कई मामलों में इस तरह की स्थिति आती है। इससे जहां अदालत समय बर्बाद होता है, वहीं आरोपी युवक की सामाजिक प्रतिष्ठा भी खराब होती है। उसे जेल में रहना पड़ता है। इससे उसका पूरा परिवार परेशान रहता है।

आईपीसी की धारा 195 के तहत दर्ज हुआ परिवाद
बयानों से मुकरने के बाद अदालत में युवती के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 195 के तहत परिवाद दर्ज किया गया था। सहायक शासकीय अधिवक्ता सुनील कुमार पांडेय ने बताया कि ऐसा मामला जिसमें आजीवन कारावास या सात साल से ज्यादा अवधि के कारावास की सजा हो, इसके लिए मिथ्या साक्ष्य देने व गढ़ने के संबंध में परिवाद दर्ज करने का प्रावधान है।

अदालतों में दुष्कर्म के करीब पांच हजार मुकदमे
बरेली जिले में पिछले कुछ वर्षों में दुष्कर्म के मुकदमों की संख्या में इजाफा हुआ है। एक अनुमान के तहत अदालतों में दुष्कर्म के करीब पांच हजार मुकदमे चल रहे हैं। इनमें पॉक्सो एक्ट के मामले भी शामिल हैं। दुष्कर्म के आरोप में जमानत मिलना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में आरोपी लंबे समय तक जेल में रहता है। पुलिस, डॉक्टर, दोनों पक्षों के गवाहों को अदालत में बुलाकर बयान दर्ज कराए जाते हैं। मुकदमे में गवाही के दौरान पीड़िता के आरोपों से मुकरने पर सबकी मेहनत बेकार हो जाती है। ऐसे मामलों में अब अदालतों ने सख्त रुख अपनाना शुरू कर दिया है।

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