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चाइना ने पट कर दियाबरेली में मांझे का धंधा
बरेली।
Updated Sun, 25 Jun 2017 12:52 AM IST
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चाइना ने पट कर दियाबरेली में मांझे का धंधा
- फोटो : चाइना ने पट कर दियाबरेली में मांझे का धंधा
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बदहाल उद्योग-7
सरकारी नीतियों और चाइना के मांझा ने बरेली के कारीगरी और कारोबार दोनों का पट कर दिया है। बरेली में बनी रंग बिरंगी पतंगें भी अब आसमान में कम दिखने लगीं हैं, क्योंकि इन पर फैंसी पतंगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया है।
बरेली में बनने वाली पतंग की डोर तो चाइनीज मांझा ने काट दी है। इससे धीरे-धीरे पतंग मांझा कारोबार अपनी पहचान और धार खोता जा रहा है। करीब 200 साल पुराने मांझा बाजार पर चीनी माल ने कब्जा कर लिया है। तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लोकसभा चुनाव में वोट मांगने बरेली आए थे तब उन्होंने कहा था कि आज गुजरात में अगर पतंग उड़ती है तो उसका मांझा बरेली से आता है, लेकिन यही मांझा अब दुश्वारी के दिन गिन रहा है।
पतंग और मांझे का थोक और फुटकर कारोबार करने वाले सराय खाम के इनाम अली बताते हैं कि वह 35 साल से यह काम कर रहे हैं। बरेली में अब सिर्फ 25 फीसदी बाजार ही सूती धागे के मांझे का बचा है। बरेली में करीब 10 हजार लोग यह काम करते हैं। दिल्ली तो अब बरेली का मांझा जाता ही नहीं है। वहां नायलान के मांझे का ही प्रयोग चल रहा है, जिस पर एनजीटी ने रोक लगाई है। इसकी कीमत इतनी कम है कि लोग यही खरीदते हैं।
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इनाम बताते हैं कि 120 से 360 रुपये में सूती धागे से बनी मांझा चरखी मिल जाती है, लेकिन नायलान मांझा 80 से 180 रुपये में आता है। सूती धागा पानी से खराब हो जाता है, जबकि नायलोन खराब नहीं होता, लेकिन यह काफी खतरनाक है। बाकरगंज और सीबी गंज रोड पर करीब 500 परिवार मांझा बनाने के कारोबार से जुड़े हैं।
काफी मेहनत से बनता है मांझा
उपेक्षा के चलते काफी लोग इस कारोबार से हटते जा रहे हैं। महिलाएं कांच से बना बारीक पाउडर तैयार कर कुछ पैसे कमा लेती हैं। बाकरगंज के जमीर कारीगर बताते हैं कि एक दिन में दो चरखी मांझा तैयार करते हैं, तो 150 रुपये मिलते हैं। सूती धागे पर चावल से बना मांड, रंग और कांच पाउडर आदि का लेप चढ़ाकर मांझा तैयार करते हैं। लेपन कार्य भी मेहनत से होता है।
एक रुपये में मात्र तीस पैसे ही कारोबार शेष
कारोबारी इदरीस कहते हैं कि दिल्ली, मेरठ, बनारस में बरेली मांझे की मांग काफी थी जो अब गिर गई है। अब कानपुर, फर्रुखाबाद और लखनऊ ही माल जाता है। एक रुपये में मात्र 30 पैसे ही कारोबार बचा है। कहते हैं राजस्थान और गुजरात में भी केवल सीजनल माल जाता है। वह कहते हैं कि नायलान का मांझा सस्ता है और इसका कारोबार करने वाले बड़े मजबूत और पैसे वाले हैं। इसलिए इस पर रोक नहीं लग रही है।
कभी 250 करोड़ का था कारोबार
बरेली में मांझा कारोबार दो शतक पुराना है। बाकरगंज, नवदिया, स्वालेनगर, अशरफ खां छावनी समेत कई इलाकों में सिर्फ इसी का काम होता था। एक साल में 250 करोड़ रुपये का कारोबार सिर्फ बरेली से होता था, लेकिन अब यह सिमटकर दो करोड़ रुपये रह गया है। सिर्फ 25 फीसदी काम मांझे का हो रहा है।
यहां बनता है मांझा
बाकरगंज, बिसारतगंज, नवदिया, सनउआ, जसौली, स्वालेनगर, मिलक, विधौलिया, बादशाहनगर, चंदपुर सनइया, सीबीगंज, सैदपुर, शाही आदि।
इन शहरों में सप्लाई
लखनऊ, फर्रुखाबाद, मेरठ, बनारस, कानपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, मलेशिया, सउदी अरब, नेपाल स्थानों पर सप्लाई होती है।
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सरकारी नीतियों और चाइना के मांझा ने बरेली के कारीगरी और कारोबार दोनों का पट कर दिया है। बरेली में बनी रंग बिरंगी पतंगें भी अब आसमान में कम दिखने लगीं हैं, क्योंकि इन पर फैंसी पतंगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया है।
बरेली में बनने वाली पतंग की डोर तो चाइनीज मांझा ने काट दी है। इससे धीरे-धीरे पतंग मांझा कारोबार अपनी पहचान और धार खोता जा रहा है। करीब 200 साल पुराने मांझा बाजार पर चीनी माल ने कब्जा कर लिया है। तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लोकसभा चुनाव में वोट मांगने बरेली आए थे तब उन्होंने कहा था कि आज गुजरात में अगर पतंग उड़ती है तो उसका मांझा बरेली से आता है, लेकिन यही मांझा अब दुश्वारी के दिन गिन रहा है।
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पतंग और मांझे का थोक और फुटकर कारोबार करने वाले सराय खाम के इनाम अली बताते हैं कि वह 35 साल से यह काम कर रहे हैं। बरेली में अब सिर्फ 25 फीसदी बाजार ही सूती धागे के मांझे का बचा है। बरेली में करीब 10 हजार लोग यह काम करते हैं। दिल्ली तो अब बरेली का मांझा जाता ही नहीं है। वहां नायलान के मांझे का ही प्रयोग चल रहा है, जिस पर एनजीटी ने रोक लगाई है। इसकी कीमत इतनी कम है कि लोग यही खरीदते हैं।
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इनाम बताते हैं कि 120 से 360 रुपये में सूती धागे से बनी मांझा चरखी मिल जाती है, लेकिन नायलान मांझा 80 से 180 रुपये में आता है। सूती धागा पानी से खराब हो जाता है, जबकि नायलोन खराब नहीं होता, लेकिन यह काफी खतरनाक है। बाकरगंज और सीबी गंज रोड पर करीब 500 परिवार मांझा बनाने के कारोबार से जुड़े हैं।
काफी मेहनत से बनता है मांझा
उपेक्षा के चलते काफी लोग इस कारोबार से हटते जा रहे हैं। महिलाएं कांच से बना बारीक पाउडर तैयार कर कुछ पैसे कमा लेती हैं। बाकरगंज के जमीर कारीगर बताते हैं कि एक दिन में दो चरखी मांझा तैयार करते हैं, तो 150 रुपये मिलते हैं। सूती धागे पर चावल से बना मांड, रंग और कांच पाउडर आदि का लेप चढ़ाकर मांझा तैयार करते हैं। लेपन कार्य भी मेहनत से होता है।
एक रुपये में मात्र तीस पैसे ही कारोबार शेष
कारोबारी इदरीस कहते हैं कि दिल्ली, मेरठ, बनारस में बरेली मांझे की मांग काफी थी जो अब गिर गई है। अब कानपुर, फर्रुखाबाद और लखनऊ ही माल जाता है। एक रुपये में मात्र 30 पैसे ही कारोबार बचा है। कहते हैं राजस्थान और गुजरात में भी केवल सीजनल माल जाता है। वह कहते हैं कि नायलान का मांझा सस्ता है और इसका कारोबार करने वाले बड़े मजबूत और पैसे वाले हैं। इसलिए इस पर रोक नहीं लग रही है।
कभी 250 करोड़ का था कारोबार
बरेली में मांझा कारोबार दो शतक पुराना है। बाकरगंज, नवदिया, स्वालेनगर, अशरफ खां छावनी समेत कई इलाकों में सिर्फ इसी का काम होता था। एक साल में 250 करोड़ रुपये का कारोबार सिर्फ बरेली से होता था, लेकिन अब यह सिमटकर दो करोड़ रुपये रह गया है। सिर्फ 25 फीसदी काम मांझे का हो रहा है।
यहां बनता है मांझा
बाकरगंज, बिसारतगंज, नवदिया, सनउआ, जसौली, स्वालेनगर, मिलक, विधौलिया, बादशाहनगर, चंदपुर सनइया, सीबीगंज, सैदपुर, शाही आदि।
इन शहरों में सप्लाई
लखनऊ, फर्रुखाबाद, मेरठ, बनारस, कानपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, मलेशिया, सउदी अरब, नेपाल स्थानों पर सप्लाई होती है।