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Bareilly News: नहर में डूबे युवक का मिला शव
Mon, 31 Aug 2026 01:58 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Mon, 31 Aug 2026 01:58 AM IST
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बहेड़ी। गांव सिंघौती में शनिवार दोपहर नहर में नहाने के दौरान डूबे संजीव कुमार (35) का शवरविवार को मिला। एसडीआरएफ की टीम ने 21 घंटे की मशक्कत से शव को ढूंढकर निकाला। पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा है।
पुलिस के मुताबिक, सिंघौती निवासी संजीव शनिवार दोपहर नहर में नहाने गए थे। नहाने के दौरान वह गहरे पानी में चले गए लेकिन निकल नहीं सके। काफी देर तक घर नहीं लौटे तो परिजनों ने तलाश शुरू की। आसपास न दिखने पर नहर में तलाश कराई गई। सूचना पर गई पुलिस ने भी तलाश कराई लेकिन संजीव का पता नहीं लगा। रविवार सुबह एसडीआरएफ को बुलाया गया। सीओ बहेड़ी अरुण कुमार सिंह ने बताया कि एसडीआरएफ टीम को रविवार सुबह करीब नौ बजे संजीव का शव मिला। मौके पर चीख-पुकार मच गई। ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।
नहर से शव निकालकर बाहर लाया गया तो जैसे परिवार की ही सांसें थम गईं। मासूम भाई-बहन दौड़कर शव से लिपट गए। कहा, भैया छोड़कर मत जाओ। रात को रोटी कौन देगा। बहन ने हाथों से भाई के चेहरे पर पानी की छीटें मारी, जैसे संजीव रोज उसका मुंह धोता था लेकिन न उठने पर मायूस हो गई। पिता प्यारेलाल और मां की रोने की आवाज दूर तक जा रही थी। मां बेहोश हो गईं। पिता ने फटी आंखों से कहा, मेरा सहारा चला गया। वहां मौजूद हर शख्स यह देख सिहर गया। संजीव परिवार में अकेले कमाने वाले सदस्य थे। वह दिनभर ईंट-गारा ढोने और खेतों में मजदूरी करके जो रुपये लाता, उसी से बुजुर्ग पिता की दवाएं आतीं, छोटे भाई की फीस भरती और घर का चूल्हा जलता था। संजीव की मौत ने हंसते-खेलते मासूम भाई-बहन और बुजुर्ग माता-पिता से उनका एकमात्र सहारा छीन लिया। संवाद
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पुलिस के मुताबिक, सिंघौती निवासी संजीव शनिवार दोपहर नहर में नहाने गए थे। नहाने के दौरान वह गहरे पानी में चले गए लेकिन निकल नहीं सके। काफी देर तक घर नहीं लौटे तो परिजनों ने तलाश शुरू की। आसपास न दिखने पर नहर में तलाश कराई गई। सूचना पर गई पुलिस ने भी तलाश कराई लेकिन संजीव का पता नहीं लगा। रविवार सुबह एसडीआरएफ को बुलाया गया। सीओ बहेड़ी अरुण कुमार सिंह ने बताया कि एसडीआरएफ टीम को रविवार सुबह करीब नौ बजे संजीव का शव मिला। मौके पर चीख-पुकार मच गई। ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।
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नहर से शव निकालकर बाहर लाया गया तो जैसे परिवार की ही सांसें थम गईं। मासूम भाई-बहन दौड़कर शव से लिपट गए। कहा, भैया छोड़कर मत जाओ। रात को रोटी कौन देगा। बहन ने हाथों से भाई के चेहरे पर पानी की छीटें मारी, जैसे संजीव रोज उसका मुंह धोता था लेकिन न उठने पर मायूस हो गई। पिता प्यारेलाल और मां की रोने की आवाज दूर तक जा रही थी। मां बेहोश हो गईं। पिता ने फटी आंखों से कहा, मेरा सहारा चला गया। वहां मौजूद हर शख्स यह देख सिहर गया। संजीव परिवार में अकेले कमाने वाले सदस्य थे। वह दिनभर ईंट-गारा ढोने और खेतों में मजदूरी करके जो रुपये लाता, उसी से बुजुर्ग पिता की दवाएं आतीं, छोटे भाई की फीस भरती और घर का चूल्हा जलता था। संजीव की मौत ने हंसते-खेलते मासूम भाई-बहन और बुजुर्ग माता-पिता से उनका एकमात्र सहारा छीन लिया। संवाद
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