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जवानों के शौर्य, पराक्रम और बलिदान से लिखी गई विजय गाथा

Sat, 25 Jul 2020 02:20 AM IST
बरेली ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: बरेली ब्यूरो Updated Sat, 25 Jul 2020 02:20 AM IST
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Victory saga written by soldiers' valor, valor and sacrifice
kargil vijay diwas - फोटो : अमर उजाला

कारगिल विजय दिवस पर विशेष

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जाट रेजीमेंट सेंटर के जवानों ने निभाई थी कारगिल विजय में अहम भूमिका

बरेली। आज पूरा देश कारगिल विजय दिवस पर देश के शहीद जवानों को नमन कर रहा है। वर्ष 1999 में तीन महीने तक कारगिल की पहाड़ियों पर पाकिस्तान के खिलाफ चले ऑपरेशन विजय में सैकड़ों जवान शहीद हुए थे। इन शहीदों में कई जवान बरेली के भी थे। जिन्होंने देश के मान, सम्मान को बरकरार रखने के लिए प्राणों की बाजी लगाने में तनिक भी संकोच नहीं किया। इसमें जाट रेजीमेंट सेंटर के जवानों की अतुलनीय भूमिका हमेशा अमिट रहेगी।
सेना से मिली जानकारी के मुताबिक साल 1999, मई का आखिरी सप्ताह था। जाट रेजीमेंट सेंटर को अलर्ट जारी हुआ, जो जवान छुट्टी पर थे, उन्हें वापस बुला लिया गया। इसके बाद 17 वीं जाट रेजीमेंट के जांबाज वहां पहुंचे। द्रास सेक्टर से टारगेट की तरफ बढ़ना शुरू किया। पोस्ट जिस पर दुश्मन कब्जा करने की फिराक में था उसे उनके चंगुल से मुक्त कराने का मकसद लिए उन पोस्टों की ओर तमाम परेशानियों का सामना करते हुए बिना अपने प्राणों की परवाह किए जवान आगे बढ़ते गए। बर्फ से ढंकी पहाड़ियों में रास्ता भी साथ ही बनाते जा रहे थे। वहीं, 16,250 फीट की ऊंचाई पर बैठा दुश्मन बीच-बीच में गोलियां भी बरसाता रहता था। इसलिए यह काम रात में ही होता था। हालात का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि जवानों के पास दुश्मन से निपटने के लिए न तो पर्याप्त ऑक्सीजन थी और नहीं भरपूर राशन ही था। गोलाबारी के बीच जवानों को इशारों में समझा दिया जाता था कि जब दुश्मन पर फायरिंग की जाएगी तो उनका अगला पड़ाव कौन सा प्वॉइंट होगा। बरसती गोलियों का सामना करते हुए जवान आगे बढ़ते जाते थे। युद्ध में कैप्टन अनुज नैय्यर शहीद हुए थे, जिन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। साथ ही, जाट रेजीमेंट सेंटर को पराक्रम और शूरवीरता के लिए कारगिल थियेटर ऑनर और साइटेशन यूनिट अवार्ड से सम्मानित किया गया।
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पत्तियां खाने का भी मिला था प्रशिक्षण 

Victory saga written by soldiers' valor, valor and sacrifice
Kargil war - फोटो : अमर उजाला

विजय का रास्ता आसान नहीं होता। वह भी तब जब दुश्मन ऊंचाई पर बैठा हो। ऐसे में एक जवान 32 किलो का स्लीपिंग बैग लेकर पर्वत पर चढ़ रहा था। जिसमें 72 घंटे का खाना और ड्राईफ्रूट थे। मगर यह सब कब खत्म हो जाए और ऊंचाई पर कुछ खाने को मिले या न मिले इसे देखते हुए जवानों को पहाड़ पर पेड़, पौधों की पत्तियां खाने का भी प्रशिक्षण दिया गया था। उन्हें खुद को लंबे समय तक जिंदा रहने के लिए यह खास प्रशिक्षण मिला था।

पिंपल कॉम्पलेक्स को मुक्त कराना था

Victory saga written by soldiers' valor, valor and sacrifice
कारगिल युद्ध जीतने के बाद भारतीय सेना (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala

17 वीं जाट रेजीमेंट को पिंपल कॉम्प्लेक्स को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने का टारगेट मिला था। साथ ही, टाइगर हिल की ओर बढ़ने बटालियन को भी बैकअप देना था। करीब नौ हजार फीट की ऊंचाई पार करने के बाद पेड़ भी दूर तक नजर नहीं आ रहे थे। टारगेट के करीब पहुंचते हुए वह दुश्मन के करीब भी पहुंच रहे थे। गोलियों से घायल जवान भी आगे बढ़ते जाते। जो आगे नहीं बढ़ पाते, उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता और प्राथमिक उपचार होता।

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रात नौ बजे निर्णायक हमला

Victory saga written by soldiers' valor, valor and sacrifice
गोले दागता बोफोर्स (फाइल फोटो) - फोटो : demo pic
जाट रेजीमेंट सेंटर के अफसरों से मिली जानकारी के मुताबिक छह जुलाई 1999 का दिन था, जब जाट रेजीमेंट के जवान निर्णायक जंग के लिए बढ़ रहे थे। रात करीब नौ बजे सेना पहाड़ी पर पहुंच चुकी थी महज बीस मीटर की दूरी पर दुश्मन था। दोनों तरफ से करीब पांच घंटे तक जवाबी हमला जारी रहा। भारतीय सेना और जाट सेंटर के जांबाजों के आगे दुश्मन टिक न सका और घुटने टेक दिए। जहां दुश्मन का कब्जा था, वहां तिरंगा फहराने लगा।

छुट्टी पर आए थे घर.. और फिर शहीद हुए 

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हरिओम पाल सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले हरिओम पाल सिंह की पत्नी गुड्डी देवी के मुताबिक वह कारगिल युद्ध से पहले छुट्टियां बिताने घर आए हुए थे लेकिन अचानक कंपनी कमांडर की तरफ से फरमान आते ही वह 26 जून 1999 को ड्यूटी पर रवाना हो गए। इसके बाद परिवार के लोगों से उनकी कभी कोई बात नहीं हो सकी। फिर दो जुलाई को उनके शहीद होने की खबर पहुंची, जिससे पूरा परिवार टूट गया। एक जुलाई 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान वह शहीद हो गए। ड्यूटी के दौरान उन्हें कई मेडल मिले थे, लेकिन स्पेशल सर्विस मेडल उन्हें मरणोपरांत मिला। शहीद के परिवार को घर चलाने के लिए उनको डीडीपुरम में पेट्रोल पंप सरकार ने दिया। जिसे उनकी पत्नी गुड्डी देवी और बेटा प्रताप संचालित करते हैं। उन्होंने तीन युद्ध लड़े ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन मेघदूत और अपने अंतिम युद्ध ऑपरेशन विजय।

दो दुश्मनों को मार गिराने के बाद शहीद हुए पंकज

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लेफ्टिनेंट पंकज अरोड़ा (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
मेरे बेटे ने मरते हुए भी दो दुश्मनों की जान ली थी, बहुत जांबाज था मेरा बच्चा। यह कहना है ऑपरेशन पराक्रम में शहीद हुए लेफ्टिनेंट पंकज अरोड़ा के पिता श्याम सुंदर अरोड़ा और मां प्रेमलता अरोड़ा का। बात करते हुए मां का दिल भारी हो गया, उन्होंने बताया उसे बचपन से ही सेना में भर्ती होने का शौक था। पंतनगर यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद ही उसका चयन आर्मी में हो गया था। आठ महीने ही हुए थे उसे, और राजौरी में ऑपरेशन पराक्रम के दौरान देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त हुई। पिता श्याम सुंदर को गर्व है कि उनके बेटे ने सीने पर गोली खाई। बेटे ने देश के लिए जान दी तो गर्व से सीना चौड़ा हो गया। उसकी शहादत पर उसे सेना मेडल से नवाजा गया है। मां प्रेमलता ने बताया कि उनके तीन बेटों में वह सबसे छोटा था। शहादत के बाद उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से नवाजा गया था।
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