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जितना तकलीफ पीड़िता को हुई उतना ही दर्द दोषियों को होना चाहिए
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जितना तकलीफ पीड़िता को हुई उतना ही दर्द दोषियों को होना चाहिए
- फोटो : अमर उजाला, बरेली
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अपराजिता अभियान के तहत 8 यूपी गर्ल्स बटालियन की कैडेट्स ने कानून को और धारदार बनाने की मांग की
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बरेली। हैदराबाद में डॉ. बिटिया के साथ जैसी अमानवीय नृशंस घटना हुई, ठीक वैसी ही सुलूक दोषियों के साथ ही होना चाहिए। ताकि उन्हें दिए गए असहनीय दर्द की पीड़ा का एहसास हो। जब तक दोषियों को सिर्फ कैद किया जाएगा तब तक महिला सुरक्षा के दावे बेमानी है। यह आक्रोश गुुरुवार को अमर उजाला अपराजिता अभियान के तहत आयोजित कार्यक्रम में 8यूपी गर्ल्स बटालियन की कैडेट्स में दिखाई दिया। उनका कहना था कि महिलाएं दावे और वादे से सुरक्षित नहीं होंगी बल्कि इसके लिए बनाए गए सख्त कानूनों को और धार देनी पड़ेगी।
कैडेट्स का कहना था कि 21वीं सदी और देश को आजाद हुए 73 साल हो रहे हैं लेकिन महिलाओं में सुरक्षा के बजाय असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ रही है। घरों मेें उत्पीड़न के बाद जब समाज की सोच बदली और उन्होंने घूंघट और घर की दहलीज की गरिमा बरकरार रखते हुए उससे बाहर कदम बाहर निकाले तो दरिंदों ने उन्हें नोंचना शुरू कर दिया। जिसने महिला और पुरुषों को समानता का दर्जा देने वाले ‘आयावर्त’ को एक बार फिर संकीर्ण मानसिकता का द्योतक बनाने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाएं जब तक पुरुषों के साथ कदम बढ़ाकर परिवार और देश की बागडोर नहीं संभालेंगी तब तक विकास की कल्पना सिर्फ किताबों तक ही सीमित रहेगी। उन्होंने अपराधियों को महिलाओं के बाद कानून की धाराओं से खेलने से पहले ही उन्हें मौत देने की मांग की है। ताकि अपराध से पहले उनके चेहरे पर खौफ दिखाई दे।
चुनावी वादे नहीं धरातल पर दिखे सुरक्षा
सरकार को थोड़ा कठोर निर्णय लेना चाहिए। दोषियों को भी असहनीय दर्द हो, ऐसी सजा देनी चाहिए। जब तक यह नहीं होगा तब तक महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी वादे ही बनकर रहेंगे। धरातल से उनका कोई सरोकार नहीं रहेगा। सजा कैसी हो, यह कोर्ट नहीं समाज ही तय करे।- अंशू सिंह, कैडेट
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डरें नहीं, डटकर मुकाबला करें महिलाएं
लड़कियों को आत्मनिर्भर बनना होगा। महिलाओं को भी एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए कि अन्य उससे सबक लें। डरी, सहमी और हमेशा कमजोर बनने से बेहतर है कि वे अपराजिता बनें। सरकार हम चुनते हैं, इसलिए सरकार पर दोषारोपण करना जायज नहीं कहा जा सकता। - मुस्कान पटेल, कैडेट
रैलियों और गोष्ठियों से नहीं मिलेगी सुरक्षा
डॉ. बिटिया के साथ हुई घटना बेहद खौफनाक है। कानून बनाने और उसके प्रति रैलियां, गोष्ठियों का आयोजन करने से घटनाओं पर रोक नहीं लग सकती है। महिलाओं को भी अपराधियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए। घर या कार्यालय से बाहर निकलते समय खुद को वह तैयार रखें। - फेमिना खान, कैडेट
सरकारी दावों को नकारती है यह घटना
ऐसी ह्दयविराक घटना किसी के साथ न हो। ऐसी घटनाएं ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ की सरकारी योजनाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है। क्योंकि इन घटनाओं के बाद तो कोई पेरेंट्स अपने बच्चियों को घर से बाहर ही नहीं निकलने देंगे। तब इन नारों का क्या औचित्य रह जाएगा। - पूजा सामंत, कैडेट
सरकार से मैं बस यही चाहती हूं कि जो कानून बने हैं, उनका कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। कानून से मिली सजा से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जैसे उसे जलाया गया है वैसे ही इन सभी दरिंदों को भी जलाकर मार देना चाहिए। ताकि अपराध से पहले रूह तक कांप जाए।- पूजा सिंह, कैडेट
कानून और समाज का मिले पूरा सहयोग
इन घटनाओं पर रोक लगाने की तमाम कोशिशों के बाद भी रोक नहीं लग रही है। कोर्ट को तत्काल निर्णय लेकर दोषियों को सख्त सजा देनी चाहिए। कानून में ऐसा संशोधन हो कि तत्काल सजा का प्रावधान हो, ताकि अपराधी में भय हो। लड़कियों को भी जागरूक होना होगा। - लेफ्टीनेंट बीनम सक्सेना, 8यूपी गर्ल्स बटालियन
कैडेट्स का कहना था कि 21वीं सदी और देश को आजाद हुए 73 साल हो रहे हैं लेकिन महिलाओं में सुरक्षा के बजाय असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ रही है। घरों मेें उत्पीड़न के बाद जब समाज की सोच बदली और उन्होंने घूंघट और घर की दहलीज की गरिमा बरकरार रखते हुए उससे बाहर कदम बाहर निकाले तो दरिंदों ने उन्हें नोंचना शुरू कर दिया। जिसने महिला और पुरुषों को समानता का दर्जा देने वाले ‘आयावर्त’ को एक बार फिर संकीर्ण मानसिकता का द्योतक बनाने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाएं जब तक पुरुषों के साथ कदम बढ़ाकर परिवार और देश की बागडोर नहीं संभालेंगी तब तक विकास की कल्पना सिर्फ किताबों तक ही सीमित रहेगी। उन्होंने अपराधियों को महिलाओं के बाद कानून की धाराओं से खेलने से पहले ही उन्हें मौत देने की मांग की है। ताकि अपराध से पहले उनके चेहरे पर खौफ दिखाई दे।
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चुनावी वादे नहीं धरातल पर दिखे सुरक्षा
सरकार को थोड़ा कठोर निर्णय लेना चाहिए। दोषियों को भी असहनीय दर्द हो, ऐसी सजा देनी चाहिए। जब तक यह नहीं होगा तब तक महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी वादे ही बनकर रहेंगे। धरातल से उनका कोई सरोकार नहीं रहेगा। सजा कैसी हो, यह कोर्ट नहीं समाज ही तय करे।- अंशू सिंह, कैडेट
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डरें नहीं, डटकर मुकाबला करें महिलाएं
लड़कियों को आत्मनिर्भर बनना होगा। महिलाओं को भी एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए कि अन्य उससे सबक लें। डरी, सहमी और हमेशा कमजोर बनने से बेहतर है कि वे अपराजिता बनें। सरकार हम चुनते हैं, इसलिए सरकार पर दोषारोपण करना जायज नहीं कहा जा सकता। - मुस्कान पटेल, कैडेट
रैलियों और गोष्ठियों से नहीं मिलेगी सुरक्षा
डॉ. बिटिया के साथ हुई घटना बेहद खौफनाक है। कानून बनाने और उसके प्रति रैलियां, गोष्ठियों का आयोजन करने से घटनाओं पर रोक नहीं लग सकती है। महिलाओं को भी अपराधियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए। घर या कार्यालय से बाहर निकलते समय खुद को वह तैयार रखें। - फेमिना खान, कैडेट
सरकारी दावों को नकारती है यह घटना
ऐसी ह्दयविराक घटना किसी के साथ न हो। ऐसी घटनाएं ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ की सरकारी योजनाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है। क्योंकि इन घटनाओं के बाद तो कोई पेरेंट्स अपने बच्चियों को घर से बाहर ही नहीं निकलने देंगे। तब इन नारों का क्या औचित्य रह जाएगा। - पूजा सामंत, कैडेट
सरकार से मैं बस यही चाहती हूं कि जो कानून बने हैं, उनका कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। कानून से मिली सजा से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जैसे उसे जलाया गया है वैसे ही इन सभी दरिंदों को भी जलाकर मार देना चाहिए। ताकि अपराध से पहले रूह तक कांप जाए।- पूजा सिंह, कैडेट
कानून और समाज का मिले पूरा सहयोग
इन घटनाओं पर रोक लगाने की तमाम कोशिशों के बाद भी रोक नहीं लग रही है। कोर्ट को तत्काल निर्णय लेकर दोषियों को सख्त सजा देनी चाहिए। कानून में ऐसा संशोधन हो कि तत्काल सजा का प्रावधान हो, ताकि अपराधी में भय हो। लड़कियों को भी जागरूक होना होगा। - लेफ्टीनेंट बीनम सक्सेना, 8यूपी गर्ल्स बटालियन