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Bareilly News: वर्षों बाद मैदानी मकरंद से मधुमक्खियों ने बनाया शहद
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बरेली। गर्मी की दस्तक के साथ ही पहाड़ों का रुख करने वाले मौनपालक मौसम अनुकूल होने की वजह से इस साल मैदानी इलाके में ही डटे रहे। मधुमक्खियों को पहाड़ी फूलों का मकरंद नहीं मिला। वर्षों बाद मधुमक्खियों ने मैदानी मकरंद से शहद तैयार किया। इससे जहां उत्पादन लागत घटी, वहीं मधुमक्खियों की मृत्युदर में भी कमी आई।
पिछले वर्षों में फरवरी के आखिरी तक दिन का पारा 35 डिग्री के पार पहुंचने से मैदानी इलाकों में फूल और परागकण जल्दी खत्म होने लगते थे। शहद उत्पादन बढ़ाने और मधुमक्खियों को पर्याप्त भोजन दिलाने के लिए मौनपालक पहाड़ी क्षेत्रों का रुख करते थे। इस वर्ष मार्च, अप्रैल, मई में पारा अनुकूल रहा। खेतों, बागों, जंगली पौधों पर काफी समय तक फूल बने रहे। मैदानी इलाकों में ही पर्याप्त परागकण मिलते रहे। नतीजा, वर्ष 2000 के बाद पहली बार गर्मी में मौनपालकों को बक्से लेकर पहाड़ों का सफर तय नहीं करना पड़ा।
भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान परिसर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रंजीत सिंह के मुताबिक, मधुमक्खियों के लिए 25 से 35 डिग्री तक तापमान चाहिए। मैदानी इलाके का तापमान अनुकूल होने से इस बार मधुमक्खियों को फल-फूल, सब्जी, सरसों, यूकेलिप्टस, लीची व अन्य फूलों से पर्याप्त मकरंद मिला।
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आंधी-बारिश संग गिरे ओले, बक्से लेकर लौटना पड़ा
फोटो
भोजीपुरा (टांडा इनायतुल्ला) के मौनपालक आलोक पाल मार्च में बक्से लेकर नैनीताल के पहाड़ों पर गए थे। तीसरे दिन आंधी, बारिश और ओले गिरने से कुछ मधुमक्खियाें की मौत हुई। मौसम शांत होने पर पक्षी उन्हें मारने लगे। तब वह बक्से लेकर लौटे। बरेली, बदायूं के वन सरीखे क्षेत्र में बक्से लगाए। फूल, फल के अलावा वैकल्पिक फीड भी दिया। मैदान में मौनपालन से तमाम खर्चे बचे।
पहाड़ों पर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी
फोटो
फतेहगंज पश्चिमी (चमरौआ) के मौनपालक कमलवीर श्रीवास्तव के मुताबिक, अबकी गर्मियों के दिन कम रहे। कुछ दिन ही पारा 40 डिग्री के पारा दर्ज हुआ। इसलिए पलायन नहीं किया। बताया कि हर साल बक्से ट्रकों में भरकर पहाड़ पर ले जाने पड़ते थे। परिवहन का खर्च होता था। झटकों से कई मधुमक्खियां भी मर जाती थीं। मैदान में रहने से यह खर्च बचा। बक्से सुरक्षित होने से काॅलोनियां सुरक्षित रहीं। शहद उत्पादन बढ़ा।
गर्मी और पलायन से होने वाली समस्या
- गर्मी में परागकण और फूल कम मिलने पर शहद उत्पादन घटता है।
- भोजन स्रोत तेजी से खत्म होने पर तनाव बढ़ने से मधुमक्खियों की मृत्यु हो जाती है।
- बक्सों को पहाड़ी क्षेत्रों में ले जाने पर परिवहन खर्च उठाना पड़ता है।
- लंबी दूरी में मधुमक्खी के बक्से टूटने से कॉलोनी कमजोर पड़ती है।
- पहाड़ पर मौसम बदलने पर मधुमक्खियों का व्यवहार बदलता है।
- प्रशिक्षित श्रमिक और तकनीकी जानकारी की कमी भी बड़ी चुनौती है।
- बारिश और आंधी के दौरान बक्सों को सुरक्षित रखना कठिन होता है।
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पिछले वर्षों में फरवरी के आखिरी तक दिन का पारा 35 डिग्री के पार पहुंचने से मैदानी इलाकों में फूल और परागकण जल्दी खत्म होने लगते थे। शहद उत्पादन बढ़ाने और मधुमक्खियों को पर्याप्त भोजन दिलाने के लिए मौनपालक पहाड़ी क्षेत्रों का रुख करते थे। इस वर्ष मार्च, अप्रैल, मई में पारा अनुकूल रहा। खेतों, बागों, जंगली पौधों पर काफी समय तक फूल बने रहे। मैदानी इलाकों में ही पर्याप्त परागकण मिलते रहे। नतीजा, वर्ष 2000 के बाद पहली बार गर्मी में मौनपालकों को बक्से लेकर पहाड़ों का सफर तय नहीं करना पड़ा।
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भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान परिसर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रंजीत सिंह के मुताबिक, मधुमक्खियों के लिए 25 से 35 डिग्री तक तापमान चाहिए। मैदानी इलाके का तापमान अनुकूल होने से इस बार मधुमक्खियों को फल-फूल, सब्जी, सरसों, यूकेलिप्टस, लीची व अन्य फूलों से पर्याप्त मकरंद मिला।
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आंधी-बारिश संग गिरे ओले, बक्से लेकर लौटना पड़ा
फोटो
भोजीपुरा (टांडा इनायतुल्ला) के मौनपालक आलोक पाल मार्च में बक्से लेकर नैनीताल के पहाड़ों पर गए थे। तीसरे दिन आंधी, बारिश और ओले गिरने से कुछ मधुमक्खियाें की मौत हुई। मौसम शांत होने पर पक्षी उन्हें मारने लगे। तब वह बक्से लेकर लौटे। बरेली, बदायूं के वन सरीखे क्षेत्र में बक्से लगाए। फूल, फल के अलावा वैकल्पिक फीड भी दिया। मैदान में मौनपालन से तमाम खर्चे बचे।
पहाड़ों पर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी
फोटो
फतेहगंज पश्चिमी (चमरौआ) के मौनपालक कमलवीर श्रीवास्तव के मुताबिक, अबकी गर्मियों के दिन कम रहे। कुछ दिन ही पारा 40 डिग्री के पारा दर्ज हुआ। इसलिए पलायन नहीं किया। बताया कि हर साल बक्से ट्रकों में भरकर पहाड़ पर ले जाने पड़ते थे। परिवहन का खर्च होता था। झटकों से कई मधुमक्खियां भी मर जाती थीं। मैदान में रहने से यह खर्च बचा। बक्से सुरक्षित होने से काॅलोनियां सुरक्षित रहीं। शहद उत्पादन बढ़ा।
गर्मी और पलायन से होने वाली समस्या
- गर्मी में परागकण और फूल कम मिलने पर शहद उत्पादन घटता है।
- भोजन स्रोत तेजी से खत्म होने पर तनाव बढ़ने से मधुमक्खियों की मृत्यु हो जाती है।
- बक्सों को पहाड़ी क्षेत्रों में ले जाने पर परिवहन खर्च उठाना पड़ता है।
- लंबी दूरी में मधुमक्खी के बक्से टूटने से कॉलोनी कमजोर पड़ती है।
- पहाड़ पर मौसम बदलने पर मधुमक्खियों का व्यवहार बदलता है।
- प्रशिक्षित श्रमिक और तकनीकी जानकारी की कमी भी बड़ी चुनौती है।
- बारिश और आंधी के दौरान बक्सों को सुरक्षित रखना कठिन होता है।