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एक पिता जो मां भी है
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Sun, 19 Jun 2016 12:39 AM IST
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उनकी शख्सियत एक साहित्यकार की है। बहुत लोगों को नहीं मालूम घरेलू जीवन में वह एक पिता की बजाय मां की भूमिका में ज्यादा रहे हैं। बेटियां दस और 12 साल की थी लेकिन बेटा तब एक साल का ही था जब उनका जोड़ा टूट गया। 23 साल हो गए। वो एक साल का बेटा अब कोलकाता में इंजीनियर है और दोनों बेटियां अपने घरों में खुशहाल जीवन जी रही हैं।
ये कहानी है साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी की। 1993 में जब उनकी पत्नी की असमय मौत हो गई थी। एक साल के बेटे के लिए वह दफ्तर से छुट्टी भी लेते तो कितने दिन? अंतत: दफ्तर तो जाना ही था। इसलिए सालभर के बेटे को साथ लेकर अपने दफ्तर जाते। सारा काम उसे गोद में लेकर करते। कुर्तें की एक जेब में बिस्कुट रखते और दूसरी जेब में उसके कपड़े। रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया था। नाश्ता बेटियां बनातीं तो रात का खाना मैं खुद बनाता। तरह-तरह के व्यंजन भी उन्होंने ही बेटियों को बनाना सिखाए। कहा, उस समय पर मैं कर्मचारी यूनियन का जनरल सेक्रेटरी था, लेकिन जब परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो पद छोड़ दिया। एक ‘संदर्श’ पत्रिका निकालता था, उसे भी बंद करना पड़ा। नाटक ग्रुप भी छोड़ना पड़ा। सारी मुश्किलों के बाद भी दूसरी शादी का ख्याल कभी नहीं आया, जबकि तब मैं 40 साल का भी नहीं था। मैं हमेशा सोचता कि बच्चों के लिए मां नहीं ला सकता तो अपने लिए दूसरी पत्नी कैसे ले आऊं। जिन बच्चों को मैं आज डांट लेता हूं, उन्हें दूसरी शादी के बाद डांटूंगा तो पता नहीं उन पर क्या असर पड़ेगा। छोटे बेटके प्रति मुझे कुछ ज्यादा ही लगाव है, उतना ही उसे भी है। इतना सब करने के बाद भी मुझे लगता है कि मैं मां नहीं बन पाया। जब बेटे को चोट लगी तो मैं उसे अस्पताल ले गया। दर्द से चिल्लाते हुए वह पापा-पापा नहीं, बल्कि मम्मी-मम्मी ही बोल रहा था। जबकि उसने यह शब्द कभी नहीं बोला था। मां का अहसास भी नहीं जानता था। मां बनना वाकई बहुत मुश्किल है।
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ये कहानी है साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी की। 1993 में जब उनकी पत्नी की असमय मौत हो गई थी। एक साल के बेटे के लिए वह दफ्तर से छुट्टी भी लेते तो कितने दिन? अंतत: दफ्तर तो जाना ही था। इसलिए सालभर के बेटे को साथ लेकर अपने दफ्तर जाते। सारा काम उसे गोद में लेकर करते। कुर्तें की एक जेब में बिस्कुट रखते और दूसरी जेब में उसके कपड़े। रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया था। नाश्ता बेटियां बनातीं तो रात का खाना मैं खुद बनाता। तरह-तरह के व्यंजन भी उन्होंने ही बेटियों को बनाना सिखाए। कहा, उस समय पर मैं कर्मचारी यूनियन का जनरल सेक्रेटरी था, लेकिन जब परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो पद छोड़ दिया। एक ‘संदर्श’ पत्रिका निकालता था, उसे भी बंद करना पड़ा। नाटक ग्रुप भी छोड़ना पड़ा। सारी मुश्किलों के बाद भी दूसरी शादी का ख्याल कभी नहीं आया, जबकि तब मैं 40 साल का भी नहीं था। मैं हमेशा सोचता कि बच्चों के लिए मां नहीं ला सकता तो अपने लिए दूसरी पत्नी कैसे ले आऊं। जिन बच्चों को मैं आज डांट लेता हूं, उन्हें दूसरी शादी के बाद डांटूंगा तो पता नहीं उन पर क्या असर पड़ेगा। छोटे बेटके प्रति मुझे कुछ ज्यादा ही लगाव है, उतना ही उसे भी है। इतना सब करने के बाद भी मुझे लगता है कि मैं मां नहीं बन पाया। जब बेटे को चोट लगी तो मैं उसे अस्पताल ले गया। दर्द से चिल्लाते हुए वह पापा-पापा नहीं, बल्कि मम्मी-मम्मी ही बोल रहा था। जबकि उसने यह शब्द कभी नहीं बोला था। मां का अहसास भी नहीं जानता था। मां बनना वाकई बहुत मुश्किल है।
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