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कौन कहता है कि बेटियां कमजोर हैं
Bareilly
Updated Fri, 24 Jan 2014 05:53 AM IST
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बरेली। बेटी ही बचाएगी अभियान के तहत अमर उजाला कार्यालय में आयोजित तीसरे मंथन में जुटीं डॉक्टर्स और नौकरीपेशा महिलाओं ने महिला के संवेदनशील पहलुओं को रेखांकित करते हुए बेटियों को जागरुक करने के लिए बड़ी पहल की जरूरत बतायी वहीं अधिवक्ता महिलाओं ने बताया कि नारी के लिए कानून कम नहीं लेकिन कहीं जागरूकता की कमी है तो कहीं सिस्टम में कठिनाइयां हैं, जिससे पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलने में बाधाएं हैं। अलबत्ता, सबने एक स्वर में कहा कि बेटियों को बेहतर माहौल उनके घर से ही मिलना चाहिए। अजीब इत्तफाक था कि मंथन में जुटीं डॉक्टर्स और वकील नारी उत्थान के लिए और बेटियों के हक की मुहिम से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुईं थीं कुछ तो नारी सशक्तिकरण की उदाहरण भी हैं। सभी ने माना कि सियासत समेत हर सिस्टम में बेटियों की भागीदारी से बदलाव आ रहा है इसे और बढ़ाना होगा। लंबे मंथन में बहुत से बिंदुओं पर चर्चा हुई। प्रस्तुत हैं प्रतिभागियों के कुछ सूत्र वाक्य-
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इन्होंने कहा...
मैंने सोच समझ कर सिर्फ बेटी को ही पालने का निश्चय किया है। एक बेटी जितना निभा सकती है, लड़के इतना नहीं कर सकते। बेटियों को हम बेहतर शिक्षा और संस्कार देकर अच्छे समाज की नींव डाल सकते हैं।
-चानी मेहरोत्रा, सीनियर मैनेजर एचडीएफसी बैंक
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बेटियों की उपेक्षा बचपन से होने लगती है। उसे ठीक से खाना तक नहीं मिलता। लड़कियों को यदि पर्याप्त पोषण नहीं मिलेगा तो वह स्वस्थ नहीं होंगी और ऐसा हुआ तो उसके बच्चे भी भला कैसे स्वस्थ हो सकते हैं।
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-डॉ. मुक्ता वोरा, डायटीशियन
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मां हो, बहन हो, पत्नी हो या बेटी, नारी के सभी रूप प्यार के हैं। बेटा-बेटी का फर्क हम महिलाएं भी करती हैं। फर्क करना है तो बेटी के हक में करें। अपनी सोच बदलें। दहेज जैसी बुराइयां भी दूर करने की जरूरत है।
-डॉ. कविता अग्रवाल, चिकित्सक
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बेटियों को शिक्षित करना जरूरी है। समाज में उसे सुरक्षित माहौल दिया जाएग और दहेज प्रथा जैसी बुराइयां दूर होंगी तो निश्चित ही भेदभाव खत्म होगा। नारी शक्ति और सेवा का रूप है, हमें महत्व समझना होगा।
डॉ. गरिमा सिंह, चिकित्सक
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महिलाएं जहां भी हैं, व्यक्तिगत प्रयासों से बेटियों के हक में आवाज बुलंद करें। हम फिल्मों में महिलाओं को जिस रूप में पेश कर रहे हैं वह समाज को पतन की ओर धकेल रहा है। समाज में विकृतियां बढ़ना चिंताजनक है।
-डॉ. भारती सरन, चिकित्सक
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बेटियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता है, इस सोच के बजाय हमें उनको समाज में सुरक्षा का माहौल दें तो बेटियों वाले माता-पिता के मन से डर निकलेगा और वह बेटियों को आगे बढ़ाएंगे।
-मेहर जहां, अधिवक्ता
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हर रक्षाबंधन पर बेटों को शपथ दिलाई जाए कि वह किसी भी लड़की के साथ कभी दुर्व्यवहार नहीं करें और सम्मान देंगे तो महिला अपराध कम होंगे। उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वाली महिलाओं को प्रश्रय भी मिले।
-हरजिंदर कौर चड्ढा, अधिवक्ता
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पीड़ित महिलाओं के लिए कानून बहुत हैं पर वे पहले तो लड़ने से डरती है और लड़ती भी है तो उन्हें माहौल नहीं मिलता। उनकी ये दबी मानसिकता इस समाज की देन है। उन्हें संरक्षण की जरूरत है।
-दीप्ति सक्सेना, अधिवक्ता
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हर मां एक-एक बेटी को बेहतर माहौल देगी तो संवेदनाएं बची रहेंगी। बेटा हो या बेटी, हर बच्चे की पैरेंटिंग अच्छी होनी चाहिए। बेटा-बेटी को समान शिक्षा दें। लड़कियों को ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर भी बनाएं।
-डॉ. हेमा खन्ना, प्रभारी मनोविज्ञान विभाग बरेली कॉलेज
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असल में, महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंकने का जो मनोविज्ञान है, वह हमने ही तो बनाया है। सिर्फ सोच और विचार बदलने की जरूरत है, लड़के-लड़कियों में असमानता की बात खत्म हो जाएगी।
-डॉ. नीरजा अस्थाना, एसोसिएट प्रोफेसर- सैन्य अध्ययन, बरेली कॉलेज
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मां बेटी से कहेगी कि जल्दी घर आना, वरना पड़ोसी ऐसा कहेंगे, यही नजरिया बेटियों को कमतर करता है। बदलाव हमारे घरों से होना चाहिए। मां को ही बेटियों में आत्मबल बढ़ाना होगा, तभी वह मजबूत होंगी।
-सरिता सक्सेना, अधिवक्ता
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माता-पिता बेटियों को यह कहकर न डराएं कि रात में बाहर मत निकलना बल्कि यह बताएं कि रात्रि को कैसे सुरक्षित घर आना-जाना है, जब तक अपने ही घर के अंदर का भेदभाव दूर न होगा बदला भला कैसे होगा।
-राजेश्वरी गंगवार, अधिवक्ता
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इन्होंने कहा...
मैंने सोच समझ कर सिर्फ बेटी को ही पालने का निश्चय किया है। एक बेटी जितना निभा सकती है, लड़के इतना नहीं कर सकते। बेटियों को हम बेहतर शिक्षा और संस्कार देकर अच्छे समाज की नींव डाल सकते हैं।
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-चानी मेहरोत्रा, सीनियर मैनेजर एचडीएफसी बैंक
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बेटियों की उपेक्षा बचपन से होने लगती है। उसे ठीक से खाना तक नहीं मिलता। लड़कियों को यदि पर्याप्त पोषण नहीं मिलेगा तो वह स्वस्थ नहीं होंगी और ऐसा हुआ तो उसके बच्चे भी भला कैसे स्वस्थ हो सकते हैं।
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-डॉ. मुक्ता वोरा, डायटीशियन
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मां हो, बहन हो, पत्नी हो या बेटी, नारी के सभी रूप प्यार के हैं। बेटा-बेटी का फर्क हम महिलाएं भी करती हैं। फर्क करना है तो बेटी के हक में करें। अपनी सोच बदलें। दहेज जैसी बुराइयां भी दूर करने की जरूरत है।
-डॉ. कविता अग्रवाल, चिकित्सक
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बेटियों को शिक्षित करना जरूरी है। समाज में उसे सुरक्षित माहौल दिया जाएग और दहेज प्रथा जैसी बुराइयां दूर होंगी तो निश्चित ही भेदभाव खत्म होगा। नारी शक्ति और सेवा का रूप है, हमें महत्व समझना होगा।
डॉ. गरिमा सिंह, चिकित्सक
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महिलाएं जहां भी हैं, व्यक्तिगत प्रयासों से बेटियों के हक में आवाज बुलंद करें। हम फिल्मों में महिलाओं को जिस रूप में पेश कर रहे हैं वह समाज को पतन की ओर धकेल रहा है। समाज में विकृतियां बढ़ना चिंताजनक है।
-डॉ. भारती सरन, चिकित्सक
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बेटियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता है, इस सोच के बजाय हमें उनको समाज में सुरक्षा का माहौल दें तो बेटियों वाले माता-पिता के मन से डर निकलेगा और वह बेटियों को आगे बढ़ाएंगे।
-मेहर जहां, अधिवक्ता
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हर रक्षाबंधन पर बेटों को शपथ दिलाई जाए कि वह किसी भी लड़की के साथ कभी दुर्व्यवहार नहीं करें और सम्मान देंगे तो महिला अपराध कम होंगे। उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वाली महिलाओं को प्रश्रय भी मिले।
-हरजिंदर कौर चड्ढा, अधिवक्ता
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पीड़ित महिलाओं के लिए कानून बहुत हैं पर वे पहले तो लड़ने से डरती है और लड़ती भी है तो उन्हें माहौल नहीं मिलता। उनकी ये दबी मानसिकता इस समाज की देन है। उन्हें संरक्षण की जरूरत है।
-दीप्ति सक्सेना, अधिवक्ता
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हर मां एक-एक बेटी को बेहतर माहौल देगी तो संवेदनाएं बची रहेंगी। बेटा हो या बेटी, हर बच्चे की पैरेंटिंग अच्छी होनी चाहिए। बेटा-बेटी को समान शिक्षा दें। लड़कियों को ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर भी बनाएं।
-डॉ. हेमा खन्ना, प्रभारी मनोविज्ञान विभाग बरेली कॉलेज
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असल में, महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंकने का जो मनोविज्ञान है, वह हमने ही तो बनाया है। सिर्फ सोच और विचार बदलने की जरूरत है, लड़के-लड़कियों में असमानता की बात खत्म हो जाएगी।
-डॉ. नीरजा अस्थाना, एसोसिएट प्रोफेसर- सैन्य अध्ययन, बरेली कॉलेज
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मां बेटी से कहेगी कि जल्दी घर आना, वरना पड़ोसी ऐसा कहेंगे, यही नजरिया बेटियों को कमतर करता है। बदलाव हमारे घरों से होना चाहिए। मां को ही बेटियों में आत्मबल बढ़ाना होगा, तभी वह मजबूत होंगी।
-सरिता सक्सेना, अधिवक्ता
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माता-पिता बेटियों को यह कहकर न डराएं कि रात में बाहर मत निकलना बल्कि यह बताएं कि रात्रि को कैसे सुरक्षित घर आना-जाना है, जब तक अपने ही घर के अंदर का भेदभाव दूर न होगा बदला भला कैसे होगा।
-राजेश्वरी गंगवार, अधिवक्ता