{"_id":"1-40499","slug":"Bareilly-40499-120","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूजीसी-नेट का सेंटर पहले था, पर अब नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूजीसी-नेट का सेंटर पहले था, पर अब नहीं
Bareilly
Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
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फोटो.....
रूहेलखंड विश्वविद्यालय में 1994-95 तक होती थी परीक्षा
सिटी रिपोर्टर
बरेली। रूहेलखंड विश्वविद्यालय में पीएचडी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा के लिए तो सेंटर बनाया गया है, लेकिन यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए यहां पर कोई सेंटर नहीं बनाया जाता। यहां के अभ्यर्थियों को करीब ढाई से तीन सौ किलोमीटर की दूरी तय कर परीक्षा देने जाना पड़ता है। विश्वविद्यालय के शिक्षक और परीक्षा देने वाले विद्यार्थी सेंटर न बनने से काफी खफा हैं। कहते हैं, यूजीसी सेंटर बनाए या फिर हमारे विश्वविद्यालय की कमी बताए, जिसका हम सुधार करें। सेंटर न बनने से यूजीसी-नेट की परीक्षा के माहौल पर भी असर पड़ता है।
करीब 1994-95 तक यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए रूहेलखंड विश्वविद्यालय में केंद्र बनाया जाता था। तब इसमें शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या सैकड़ों में हुआ करती थी और आज हजारों में है लेकिन, फिर भी अभ्यर्थियों को परीक्षा देने के लिए यहां से कम से कम ढाई सौ किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। क्योंकि बरेली के आसपास के केंद्रों में लखनऊ, दिल्ली, आगरा और मेरठ हैं। बढ़े हुए अभ्यर्थियों की संख्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पीएचडी की परीक्षा में बरेली मंडल के नौ हजार अभ्यर्थी हैं। करीबन इतने ही अभ्यर्थी यूजीसी-नेट की परीक्षा में शामिल होंगे। क्योंकि यूजीसी की नई नियमावली के मुताबिक, अब तो विश्वविद्यालय और कॉलेजों में शिक्षक की नियुक्ति के लिए नेट या जेआरएफ होना अनिवार्य है। इससे भी समझा जा सकता है कि भारी संख्या में अभ्यर्थियों का परीक्षा पास करना कितना जरूरी है।
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एक्सपर्ट की राय......
प्रो. वीपी सिंह ही थे परीक्षा के कोआर्डीनेटर
चीफ प्रॉक्टर और प्लांट साइंस के विभागाध्यक्ष प्रो. वीपी सिंह ने बताया, करीब 1994-95 तक ही यहां पर परीक्षा हुई। मैं खुद ही परीक्षा का कोआर्डीनेटर बनता था। मुझे याद है कि 500-600 के करीब परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों की संख्या हुआ करती थी। अब तो विश्वविद्यालय पहले से समृद्ध हुआ है और परीक्षा देने वालों की संख्या में भी खासी बढ़ोत्तरी हुई है। अब सेंटर न बनाने की कोई वजह ही नहीं हो सकती।
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ऐसा क्या है जो पहले था अब नहीं
एजूकेशन विभाग के प्रो. गिरिजेश ने कहा कि खास बात यह है कि पहले सेंटर था अब नहीं। अब यूजीसी को यह बताना चाहिए कि विश्वविद्यालय में पहले ऐसी कौन-सी बात थी, जो अब नहीं है। और, फिर जब पीएचडी की परीक्षा के लिए केंद्र बना दिया तो फिर यूजीसी-नेट के लिए क्यों नहीं बन सकता। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्वविद्यालयों को इसका खास केंद्र बताकर हमारे विश्वविद्यालय को दबाने का प्रयास किया जाता है। जबकि रूहेलखंड विश्वविद्यालय में संस्कृत में नेट-जेआरएफ निकालने वाले अभ्यर्थियों की सबसे ज्यादा संख्या थी।
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हर सौ किलोमीटर पर बने केंद्र
फार्मेसी विभाग के प्रो. एके शर्मा यहां पर सेंटर न बनने से काफी खफा हैं। उनका कहना है, यूजीसी को तो यह करना चाहिए कि हर सौ किलोमीटर पर अगर विश्वविद्यालय हो तो उसे केंद्र बनाया जाना चाहिए। यहां पर तो तीन सौ किलोमीटर का मामला है। अभ्यर्थियों को अपना विश्वविद्यालय छोड़ दूसरे विश्वविद्यालय में परीक्षा देने जाना पड़ता है। अगर किसी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाएं नहीं होंगी तो फिर अभ्यर्थियों के रुझान को उच्च शिक्षा की ओर कैसे बढ़ा पाएंगे।
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अभ्यर्थियों की राय.......
तीन दिन का समय लगता
यहां पर यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए केंद्र न बनने से हम लोगों को बहुत दिक्कत होती है। यहां से लखनऊ जाने के लिए कम से कम तीन दिन का समय निकालना पड़ता है। सुबह जल्दी परीक्षा होने की वजह से एक दिन पहले ही पहुंच जाना होता है और परीक्षा देकर रात को निकलना पड़ता है। हम रिसर्च यहां से करते हैं और परीक्षा देने दूसरे विश्वविद्यालय में जाते हैं।
- निशा दिनकर, रिचर्स स्कॉलर
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दिल्ली जाएंगे परीक्षा देने
मैं तो दिल्ली परीक्षा देने के लिए जा रही हूं। ट्रेन से दिल्ली जाना और आना तो वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। फिर, अपना विश्वविद्यालय अच्छा खासा होेते हुए भी दूसरों के घर में डेरा डालकर परीक्षा दो। दूसरे शहर में जाने से काफी मानसिक दबाव भी पड़ता है। यहां पर परीक्षा का केंद्र बन जाएगा तो हम सब के लिए बहुत आसानी हो जाएगी।
अमिता, एनीमल साइंस के प्रोजेक्ट पर कर रहीं काम
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लखनऊ जाएंगे परीक्षा देने
यहां पर सेंटर न होने की वजह से लखनऊ परीक्षा देने के लिए जाना पड़ेगा। यहां पर यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए पहले से ही तनाव हो जाता है। सोचना होता है कि इस बार किससे घर जाएंगे, क्योंकि परीक्षा एक-दो घंटे की तो होती नहीं कि गए और देकर आ गए। हमारे विश्वविद्यालय में सेंटर न होने से हमें बहुत बुरा लगता है। पता नहीं यूजीसी को ऐसी कौन सी कमी लगती है, जिससे सेंटर नहीं बनाते।
सुशील कुमार, एनीमल साइंस के प्रोजेक्ट पर कर रहीं काम
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रूहेलखंड विश्वविद्यालय में 1994-95 तक होती थी परीक्षा
सिटी रिपोर्टर
बरेली। रूहेलखंड विश्वविद्यालय में पीएचडी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा के लिए तो सेंटर बनाया गया है, लेकिन यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए यहां पर कोई सेंटर नहीं बनाया जाता। यहां के अभ्यर्थियों को करीब ढाई से तीन सौ किलोमीटर की दूरी तय कर परीक्षा देने जाना पड़ता है। विश्वविद्यालय के शिक्षक और परीक्षा देने वाले विद्यार्थी सेंटर न बनने से काफी खफा हैं। कहते हैं, यूजीसी सेंटर बनाए या फिर हमारे विश्वविद्यालय की कमी बताए, जिसका हम सुधार करें। सेंटर न बनने से यूजीसी-नेट की परीक्षा के माहौल पर भी असर पड़ता है।
करीब 1994-95 तक यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए रूहेलखंड विश्वविद्यालय में केंद्र बनाया जाता था। तब इसमें शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या सैकड़ों में हुआ करती थी और आज हजारों में है लेकिन, फिर भी अभ्यर्थियों को परीक्षा देने के लिए यहां से कम से कम ढाई सौ किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। क्योंकि बरेली के आसपास के केंद्रों में लखनऊ, दिल्ली, आगरा और मेरठ हैं। बढ़े हुए अभ्यर्थियों की संख्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पीएचडी की परीक्षा में बरेली मंडल के नौ हजार अभ्यर्थी हैं। करीबन इतने ही अभ्यर्थी यूजीसी-नेट की परीक्षा में शामिल होंगे। क्योंकि यूजीसी की नई नियमावली के मुताबिक, अब तो विश्वविद्यालय और कॉलेजों में शिक्षक की नियुक्ति के लिए नेट या जेआरएफ होना अनिवार्य है। इससे भी समझा जा सकता है कि भारी संख्या में अभ्यर्थियों का परीक्षा पास करना कितना जरूरी है।
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एक्सपर्ट की राय......
प्रो. वीपी सिंह ही थे परीक्षा के कोआर्डीनेटर
चीफ प्रॉक्टर और प्लांट साइंस के विभागाध्यक्ष प्रो. वीपी सिंह ने बताया, करीब 1994-95 तक ही यहां पर परीक्षा हुई। मैं खुद ही परीक्षा का कोआर्डीनेटर बनता था। मुझे याद है कि 500-600 के करीब परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों की संख्या हुआ करती थी। अब तो विश्वविद्यालय पहले से समृद्ध हुआ है और परीक्षा देने वालों की संख्या में भी खासी बढ़ोत्तरी हुई है। अब सेंटर न बनाने की कोई वजह ही नहीं हो सकती।
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ऐसा क्या है जो पहले था अब नहीं
एजूकेशन विभाग के प्रो. गिरिजेश ने कहा कि खास बात यह है कि पहले सेंटर था अब नहीं। अब यूजीसी को यह बताना चाहिए कि विश्वविद्यालय में पहले ऐसी कौन-सी बात थी, जो अब नहीं है। और, फिर जब पीएचडी की परीक्षा के लिए केंद्र बना दिया तो फिर यूजीसी-नेट के लिए क्यों नहीं बन सकता। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्वविद्यालयों को इसका खास केंद्र बताकर हमारे विश्वविद्यालय को दबाने का प्रयास किया जाता है। जबकि रूहेलखंड विश्वविद्यालय में संस्कृत में नेट-जेआरएफ निकालने वाले अभ्यर्थियों की सबसे ज्यादा संख्या थी।
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हर सौ किलोमीटर पर बने केंद्र
फार्मेसी विभाग के प्रो. एके शर्मा यहां पर सेंटर न बनने से काफी खफा हैं। उनका कहना है, यूजीसी को तो यह करना चाहिए कि हर सौ किलोमीटर पर अगर विश्वविद्यालय हो तो उसे केंद्र बनाया जाना चाहिए। यहां पर तो तीन सौ किलोमीटर का मामला है। अभ्यर्थियों को अपना विश्वविद्यालय छोड़ दूसरे विश्वविद्यालय में परीक्षा देने जाना पड़ता है। अगर किसी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाएं नहीं होंगी तो फिर अभ्यर्थियों के रुझान को उच्च शिक्षा की ओर कैसे बढ़ा पाएंगे।
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अभ्यर्थियों की राय.......
तीन दिन का समय लगता
यहां पर यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए केंद्र न बनने से हम लोगों को बहुत दिक्कत होती है। यहां से लखनऊ जाने के लिए कम से कम तीन दिन का समय निकालना पड़ता है। सुबह जल्दी परीक्षा होने की वजह से एक दिन पहले ही पहुंच जाना होता है और परीक्षा देकर रात को निकलना पड़ता है। हम रिसर्च यहां से करते हैं और परीक्षा देने दूसरे विश्वविद्यालय में जाते हैं।
- निशा दिनकर, रिचर्स स्कॉलर
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दिल्ली जाएंगे परीक्षा देने
मैं तो दिल्ली परीक्षा देने के लिए जा रही हूं। ट्रेन से दिल्ली जाना और आना तो वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। फिर, अपना विश्वविद्यालय अच्छा खासा होेते हुए भी दूसरों के घर में डेरा डालकर परीक्षा दो। दूसरे शहर में जाने से काफी मानसिक दबाव भी पड़ता है। यहां पर परीक्षा का केंद्र बन जाएगा तो हम सब के लिए बहुत आसानी हो जाएगी।
अमिता, एनीमल साइंस के प्रोजेक्ट पर कर रहीं काम
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लखनऊ जाएंगे परीक्षा देने
यहां पर सेंटर न होने की वजह से लखनऊ परीक्षा देने के लिए जाना पड़ेगा। यहां पर यूजीसी-नेट की परीक्षा के लिए पहले से ही तनाव हो जाता है। सोचना होता है कि इस बार किससे घर जाएंगे, क्योंकि परीक्षा एक-दो घंटे की तो होती नहीं कि गए और देकर आ गए। हमारे विश्वविद्यालय में सेंटर न होने से हमें बहुत बुरा लगता है। पता नहीं यूजीसी को ऐसी कौन सी कमी लगती है, जिससे सेंटर नहीं बनाते।
सुशील कुमार, एनीमल साइंस के प्रोजेक्ट पर कर रहीं काम