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आत्मिक संतुष्टि के लिए मेडिकल छोड़ा, कथक अपनाया
Bareilly
Updated Wed, 19 Nov 2014 05:30 AM IST
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बरेली। नेशनल मेडिकल कॉलेज कोलकाता से एमबीबीएस करने के बाद आत्मिक संतुष्टि के लिए कथक अपना लिया। डॉ. मालबिका मित्रा ने इस रास्ते पर चलकर न सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि मां और पिता का भी सपना पूरा किया। उनके पिता और भाई डॉक्टर हैं, लेकिन मालबिका कथक नृत्यांगना। उन्होंने अमर उजाला के साथ हुई बातचीत में तमाम अनुभव साझा किए।
कोलकाता की 59 वर्षीय मालबिका मित्रा ने बताया, 10वीं कक्षा में पहली बार स्टेज पर प्रस्तुति देने के बाद उन्होेंने आठ सालों तक रियाज किया। तीन साल की उम्र से कथक से प्रेम करने लगीं। उन्होंने एमबीबीएस किया, लेकिन आधा मन कथक में लगा रहता था। बोलीं, मैं जीवन पर आधा-आधा नहीं जीना चाहती थी। पूरा जीने के लिए मेडिकल छोड़ दिया और कथक अपना लिया। एमबीबीएस के बाद सरकारी नौकरी के लिए कॉल लेटर आया तो पिता ने उसे फाड़ दिया और कथक के साथ जीने का रास्ता दिखाया। संगीत नाटक एकेडमी से सम्मानित मालबिका शिवपुर ओंकार डांस एंड म्यूजिक सेंटर की फाउंडर डायरेक्टर हैं। उन्होंने विजय शंकर, पंडित बिरजू महाराजा और सितारा देवी से प्रशिक्षण लिया है। 2004 में पश्चिम बंगाल सरकार ने पुरस्कृत भी किया।
खुद को भूल जाना बुरी बात
डॉ. मालबिका कहती हैं कि अपने इंस्टीट्यूट में बच्चों को दाखिला देने से पहले अभिभावकों की काउंसिलिंग करती हैं। ऐसा इसलिए कि अभिभावक बच्चों पर दबाव न बनाएं कि वे बड़े मंच पर अच्छा प्रदर्शन करें। नई पीढ़ी शास्त्रीय संगीत से भाग रही है, इस पर उन्होंने कहा कि यह स्पीड की दुनिया है। अब पश्चिम को अपनाने की होड़ सी लगी है। इसमें हम अपनी संस्कृति, संगीत, दर्शन सब कुछ भूलते जा रहे हैं। किसी को अपनाना बुरी बात नहीं, लेकिन अपने को भूल जाना बुरी बात है। लोक कलाओं को कौन बढ़ावा देना चाहता है, सिर्फ एक दूरदर्शन के अलावा और कहां देखने को मिलता है। बच्चे सीखें भी तो कैसे, कहां देखें, कहां पढ़ें। इसके लिए भी कहीं न कहीं मीडिया भी जिम्मेदार है।
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कोलकाता की 59 वर्षीय मालबिका मित्रा ने बताया, 10वीं कक्षा में पहली बार स्टेज पर प्रस्तुति देने के बाद उन्होेंने आठ सालों तक रियाज किया। तीन साल की उम्र से कथक से प्रेम करने लगीं। उन्होंने एमबीबीएस किया, लेकिन आधा मन कथक में लगा रहता था। बोलीं, मैं जीवन पर आधा-आधा नहीं जीना चाहती थी। पूरा जीने के लिए मेडिकल छोड़ दिया और कथक अपना लिया। एमबीबीएस के बाद सरकारी नौकरी के लिए कॉल लेटर आया तो पिता ने उसे फाड़ दिया और कथक के साथ जीने का रास्ता दिखाया। संगीत नाटक एकेडमी से सम्मानित मालबिका शिवपुर ओंकार डांस एंड म्यूजिक सेंटर की फाउंडर डायरेक्टर हैं। उन्होंने विजय शंकर, पंडित बिरजू महाराजा और सितारा देवी से प्रशिक्षण लिया है। 2004 में पश्चिम बंगाल सरकार ने पुरस्कृत भी किया।
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खुद को भूल जाना बुरी बात
डॉ. मालबिका कहती हैं कि अपने इंस्टीट्यूट में बच्चों को दाखिला देने से पहले अभिभावकों की काउंसिलिंग करती हैं। ऐसा इसलिए कि अभिभावक बच्चों पर दबाव न बनाएं कि वे बड़े मंच पर अच्छा प्रदर्शन करें। नई पीढ़ी शास्त्रीय संगीत से भाग रही है, इस पर उन्होंने कहा कि यह स्पीड की दुनिया है। अब पश्चिम को अपनाने की होड़ सी लगी है। इसमें हम अपनी संस्कृति, संगीत, दर्शन सब कुछ भूलते जा रहे हैं। किसी को अपनाना बुरी बात नहीं, लेकिन अपने को भूल जाना बुरी बात है। लोक कलाओं को कौन बढ़ावा देना चाहता है, सिर्फ एक दूरदर्शन के अलावा और कहां देखने को मिलता है। बच्चे सीखें भी तो कैसे, कहां देखें, कहां पढ़ें। इसके लिए भी कहीं न कहीं मीडिया भी जिम्मेदार है।
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