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जब खत्म हो रहे ठिकाने तो कैसे बढ़ गई सारस की तादाद
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बरेली। उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी सारस विलुप्त होने के कगार पर है, जिसे देखते हुए शासन ने वन विभाग को सारस की गणना करने और निगरानी के निर्देश दिए हैं, लेकिन बरेली में सारस की संख्या बढ़ने की ‘अपनी पीठ थपथपाती’ हुई वन विभाग की रिपोर्ट ने बर्ड वाचर (पक्षी दृष्टाओं) को हैरत में डाल दिया है। उनके मुताबिक क्रमिक रूप से सारस के ठिकाने कम हो रहे हैं। इसलिए संख्या में बढ़ोतरी होने की रिपोर्ट गले से नहीं उतर रही।
पिछले दिनों शासन के निर्देशानुसार चीफ कंजर्वेटर ने मंडल के सभी जिलों में सारस की गणना के आदेश दिए थे। इस पर डीएफओ ने रेंजर्स के नेतृत्व में टीमें गठित कर सारस की गणना कराई। टीमों ने बरेली सदर, परसाखेड़, बहेड़ी, मीरगंज, नवाबगंज, आंवला, फरीदपुर आदि के तराई क्षेत्रों में इनकी गणना की। दावा है कि सारस के ठिकानों और उनकी फोटोग्राफी और वीडियो रिकार्डिंग भी तैयार कराई गई। रिपोर्ट के मुताबिक बरेली में 190 सारस मिले हैं, जो वर्ष 2017 की गणना से 14 अधिक हैं। जबकि शाहजहांपुर, बदायूं और पीलीभीत में सारस की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कम पाई गई है। वन विभाग की इस रिपोर्ट पर बर्ड वाचर ने सवालिया निशान लगा रहे हैं। उनके मुताबिक सारस की संख्या बरेली में 100 से 125 के बीच होनी चाहिए। वहीं, अन्य जिलों की रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
आखिर 190 कैसे हो गई तादाद
साल दर साल जहां बर्ड वाचर सारस की संख्या में गिरावट आने की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं तो वहीं वन विभाग इनकी संख्या बढ़ा रहा है। जुलाई 2016 में 158 सारस और दिसंबर 2016 में हुई गणना में बरेली में 152 सारस मिले थे। वहीं, 2017 में इनकी तादाद 176 दर्ज की गई और अब यह 190 पहुंच गई है। दूसरी ओर रुहेलखंड नेचर क्लब के सचिव काजलदास गुप्ता के मुताबिक हाइवे के किनारे बिल्डिंग बन रही है। तराई क्षेत्र धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। तालाब और जमीन की नमी कम हो रही है। ऐसे में सारस की संख्या बढ़ने की संभावनाएं नहीं हैं।
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क्या कहती हैं नेचर क्लब संस्था
सोसायटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर संस्था और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट में क्रमिक मानसून न आने से सारस के प्रजनन में गिरावट का दावा किया है। वहीं, बर्ड वाचर सचिन गौड़ के मुताबिक पहले खेती, धान की फसल, दलदल, तालाब, झील व अन्य जल स्त्रोत होते थे, जिससे सारस के लिए भोजन यानी घास के कीड़े, कृषि खाद्यान्न, छोटी मछलियां, कीड़े मकोड़े, छोटे सांप, घोघें, सीपी आदि मिल जाते थे। मानसून बिगड़ने से खेती प्रभावित हुई और अंडों को छुपाने के लिए स्थान नहीं मिलने से सारस की संख्या घट रही है।
गणना में सारस की संख्या बढ़ी है। अगर इस पर बर्ड वाचर आपत्ति जता रहे हैं तो हमारे पास गणना की सारी रिपोर्ट मौजूद है। चाहे तो देख सकते हैं। - भरत लाल, डीएफओ
बर्ड वाचर की आपत्ति सही हो सकती है क्योंकि पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़कर जा सकते हैं। संभव है कि कुछ पक्षियों की गणना दो बार हो गई हो। - अरविंद गुप्ता, चीफ कंजर्वेटर
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पिछले दिनों शासन के निर्देशानुसार चीफ कंजर्वेटर ने मंडल के सभी जिलों में सारस की गणना के आदेश दिए थे। इस पर डीएफओ ने रेंजर्स के नेतृत्व में टीमें गठित कर सारस की गणना कराई। टीमों ने बरेली सदर, परसाखेड़, बहेड़ी, मीरगंज, नवाबगंज, आंवला, फरीदपुर आदि के तराई क्षेत्रों में इनकी गणना की। दावा है कि सारस के ठिकानों और उनकी फोटोग्राफी और वीडियो रिकार्डिंग भी तैयार कराई गई। रिपोर्ट के मुताबिक बरेली में 190 सारस मिले हैं, जो वर्ष 2017 की गणना से 14 अधिक हैं। जबकि शाहजहांपुर, बदायूं और पीलीभीत में सारस की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कम पाई गई है। वन विभाग की इस रिपोर्ट पर बर्ड वाचर ने सवालिया निशान लगा रहे हैं। उनके मुताबिक सारस की संख्या बरेली में 100 से 125 के बीच होनी चाहिए। वहीं, अन्य जिलों की रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
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आखिर 190 कैसे हो गई तादाद
साल दर साल जहां बर्ड वाचर सारस की संख्या में गिरावट आने की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं तो वहीं वन विभाग इनकी संख्या बढ़ा रहा है। जुलाई 2016 में 158 सारस और दिसंबर 2016 में हुई गणना में बरेली में 152 सारस मिले थे। वहीं, 2017 में इनकी तादाद 176 दर्ज की गई और अब यह 190 पहुंच गई है। दूसरी ओर रुहेलखंड नेचर क्लब के सचिव काजलदास गुप्ता के मुताबिक हाइवे के किनारे बिल्डिंग बन रही है। तराई क्षेत्र धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। तालाब और जमीन की नमी कम हो रही है। ऐसे में सारस की संख्या बढ़ने की संभावनाएं नहीं हैं।
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क्या कहती हैं नेचर क्लब संस्था
सोसायटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर संस्था और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट में क्रमिक मानसून न आने से सारस के प्रजनन में गिरावट का दावा किया है। वहीं, बर्ड वाचर सचिन गौड़ के मुताबिक पहले खेती, धान की फसल, दलदल, तालाब, झील व अन्य जल स्त्रोत होते थे, जिससे सारस के लिए भोजन यानी घास के कीड़े, कृषि खाद्यान्न, छोटी मछलियां, कीड़े मकोड़े, छोटे सांप, घोघें, सीपी आदि मिल जाते थे। मानसून बिगड़ने से खेती प्रभावित हुई और अंडों को छुपाने के लिए स्थान नहीं मिलने से सारस की संख्या घट रही है।
गणना में सारस की संख्या बढ़ी है। अगर इस पर बर्ड वाचर आपत्ति जता रहे हैं तो हमारे पास गणना की सारी रिपोर्ट मौजूद है। चाहे तो देख सकते हैं। - भरत लाल, डीएफओ
बर्ड वाचर की आपत्ति सही हो सकती है क्योंकि पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़कर जा सकते हैं। संभव है कि कुछ पक्षियों की गणना दो बार हो गई हो। - अरविंद गुप्ता, चीफ कंजर्वेटर