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नवाब रामपुर का फरमान है- कांग्रेस के डिब्बे में डालने हैं वोट
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आंवला। दिग्गजों के दांव लगाने से चर्चाओं में आई आंवला सीट हमेशा से ऐसी ही रही है। इतिहास गवाह है कि इस सीट पर कोई भी बहुत लंबे समय तक काबिज नहीं रह पाया। 1962 से पहले जब यह इलाका रामपुर संसदीय सीट का हिस्सा हुआ करता था, तब जरूर यहां नवाब रामपुर की तूती बोलती थी। मतदान से पहले नवाब रामपुर यहां डेरा डाल देते थे और फिर उनका फरमान जारी होता था कि कांग्रेस के डिब्बे में वोट डालना है और पब्लिक का वोट कांग्रेस के ही डिब्बे में जाता था।
आजादी के बाद हुए दो चुनावों के दौरान आंवला तहसील का ज्यादातर हिस्सा रामपुर संसदीय क्षेत्र का अंग था। उस दौरान नवाब रामपुर के दामाद इस इलाके की नुमाइंदगी करते थे। आजकल जैसा शोरशराबा तब चुनाव में नहीं होता था। मुकाबला भी बस नाम के लिए था। हिंदू महासभा से सन् 1952 और 1957 के चुनाव में नवाब रामपुर के दामाद सैय्यद अहमद मेहंदी विजयी रहे। चुनाव के दौरान नवाब साहब अपने विशेष सैलून में रामपुर से आंवला आते थे। मालगोदाम के शेड में उनका कोच खड़ा रहता था। कस्बे में उनके ठहरने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिल पाती थी, लिहाजा नवाब का परिवार तीन दिन तक सैलून में ही रहता था।
बुजुर्ग बताते हैं कि उस दौरान आज की तरह वोट मांगने का काम नहीं होता था। इलाके के कुछ खास लोगों को बुलाकर बता दिया जाता था कि सैय्यद मेहंदी चुनाव में खड़े हो गए हैं और सब लोगों को कांग्रेस के ही डिब्बे में वोट डालने हैं। बाजार कटरा में गुफरान अहमद के मकान से मकबरे तक नवाब के जाने के लिए कालीन का इंतजाम न होने के कारण टूल (लाल कपड़ा) बिछाया जाता था। यह कपडे़ के दुकानदार करते थे। नवाब परिवार के लोग अपने पूर्वज नवाब अली मोहम्मद के यहां बने मकबरे तक जरूर जाते थे। परिसीमन के बाद सन् 1962 में आंवला रामपुर सीट से अलग हो गया। फरीदपुर, बिनावर, दातागंज, सन्हा और आंवला को मिलाकर नई संसदीय सीट बनी। इसमें सर्वाधिक वोटर आंवला क्षेत्र के होने के कारण इसे आंवला संसदीय सीट नाम दे दिया गया। विधान सभा क्षेत्र परिसीमन के बाद सन्हा को बिथरी चैनपुर नाम मिला।
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आजादी के बाद हुए दो चुनावों के दौरान आंवला तहसील का ज्यादातर हिस्सा रामपुर संसदीय क्षेत्र का अंग था। उस दौरान नवाब रामपुर के दामाद इस इलाके की नुमाइंदगी करते थे। आजकल जैसा शोरशराबा तब चुनाव में नहीं होता था। मुकाबला भी बस नाम के लिए था। हिंदू महासभा से सन् 1952 और 1957 के चुनाव में नवाब रामपुर के दामाद सैय्यद अहमद मेहंदी विजयी रहे। चुनाव के दौरान नवाब साहब अपने विशेष सैलून में रामपुर से आंवला आते थे। मालगोदाम के शेड में उनका कोच खड़ा रहता था। कस्बे में उनके ठहरने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिल पाती थी, लिहाजा नवाब का परिवार तीन दिन तक सैलून में ही रहता था।
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बुजुर्ग बताते हैं कि उस दौरान आज की तरह वोट मांगने का काम नहीं होता था। इलाके के कुछ खास लोगों को बुलाकर बता दिया जाता था कि सैय्यद मेहंदी चुनाव में खड़े हो गए हैं और सब लोगों को कांग्रेस के ही डिब्बे में वोट डालने हैं। बाजार कटरा में गुफरान अहमद के मकान से मकबरे तक नवाब के जाने के लिए कालीन का इंतजाम न होने के कारण टूल (लाल कपड़ा) बिछाया जाता था। यह कपडे़ के दुकानदार करते थे। नवाब परिवार के लोग अपने पूर्वज नवाब अली मोहम्मद के यहां बने मकबरे तक जरूर जाते थे। परिसीमन के बाद सन् 1962 में आंवला रामपुर सीट से अलग हो गया। फरीदपुर, बिनावर, दातागंज, सन्हा और आंवला को मिलाकर नई संसदीय सीट बनी। इसमें सर्वाधिक वोटर आंवला क्षेत्र के होने के कारण इसे आंवला संसदीय सीट नाम दे दिया गया। विधान सभा क्षेत्र परिसीमन के बाद सन्हा को बिथरी चैनपुर नाम मिला।
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