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सन में छिपी खेसारी .. घर-घर दे रही बीमारी
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बरेली। सर्दी हो या गर्मी, बेसन की खपत हर मौसम में बड़ी मात्रा में होती है। बेसन की इस मांग के कारण ही कारोबारी अखाद्य खेसारी दाल से बना बेसन घर-घर पहुंचा रहे हैं। चने के मुकाबले खेसारी का बेसन आधी ही कीमत का होता है, इसी के चलते नमकीन, पकौड़ी, मिठाई बनाने वाले लोग भी इसका जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। चार महीने पहले दो स्थानों से भरे नमूनों की जांच कराई गई तो वह खेसारी दाल पाई गई। इससे खुलासा हुआ कि बाजार में खेसारी की मिलावट के उत्पादों का बड़े पैमाने पर कारोबार हो रहा है। इसके बाद बाजार के साथ विभाग में भी हड़कंप मचा हुआ है।
चार महीने पहले 14 और 15 सितंबर को खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की टीम के सदस्य योगेंद्र प्रसाद और मोनिका गुप्ता ने कालीबाड़ी के पुष्कर मल और चौपुला चौराहे पर महेंद्रपाल सिंह की दुकान से से दाल के नमूने भरे। इनकी जांच लैब से कराई गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यह दाल खेसारी की पाई गई और दोनों नमूनों को रिपोर्ट में अनसेफ बताया गया। बताया जाता है कि जिले भर में बड़े पैमाने पर इसका कारोबार होता है, लेकिन एफएसडीए टीम गिने चुने स्थानों पर छापामार कार्रवाई कर वाहवाही लूटती है।
बेसन में 30 प्रतिशत खेसारी
जानकार सूत्रों के मुताबिक जिले में मटर और चने के बेसन की खपत में तीस प्रतिशत हिस्सेदारी खेसारी होती है। इसकी दाल लोग नहीं खरीदते इसीलिए इसका बेसन बनाकर बेचा जाता है। दूरदराज, गांवों और शहरी इलाकों में इसकी मांग कम नहीं है। क्योंकि सामान्य बेसन से इसकी कीमत आधे से भी कम है। गली मोहल्लों में नमकीन बनाने कारखानों में भी ज्यादातर खेसारी दाल ही इस्तेमाल हो रही है। कारोबारी बताते हैं कि पकौड़ी और मिठाइयों में इसका भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए बेसन से बने उत्पाद हमेशा लैब में पास ही नहीं हो पाते हैं। हर माह करीब 25 करोड़ रुपये का बेसन कारोबार होता है।
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खेसारी दाल और उसके उत्पाद प्रतिबंधित श्रेणी में है। इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसका कारोबार भी अपराध माना जाता है। खेसारी दाल सैंपल असुरक्षित पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होगी। - संजय पांडे, सहायक आयुक्त, एफएसडीए
तीन महीने खेसारी दाल खाई तो शर्तिया लकवे का अटैक
बरेली। पीले रंग की खेसारी दाल सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक है। चिकित्सकों का कहना है कि यह दाल शरीर के तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर करती है और अगर लगातार तीन महीने तक इसका सेवन कर लिया जाए तो शरीर के आंतरिक अंगों की कार्यप्रणाली पर बुरा असर पड़ना तय है।
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक खेसारी दाल और उसके अन्य उत्पाद को खाने से खतरनाक बीमारियां होती हैं। इस दाल में डाई एसाइनो प्रोपिऑनिक एसिड होता है। यह न्यूरोटॉक्सिक एसिड तंत्रिका तंत्र पर काफी बुरा असर डालता है। शुरुआत में शरीर के नीचे का हिस्सा काम करना बंद करता है और फिर इसका असर समय के साथ बढ़ता चला जाता है। एमडी फिजीशियन डॉ. अजय मोहन ने बताया कि तीन महीने तक दाल के सेवन करने से लिथेरिजक नाम की बीमारी होती है जिसमें शरीर के नीचे के हिस्सा काम करना बंद कर देता है। अगर इसके बाद भी दाल का सेवन जारी रखा जाए तो आंतरिक अंग काम करना बंद कर सकते हैं।
ये होते हैं लक्षण
पैरों में कमजोरी महसूस होना
चाल में फर्क नजर आने लगता है
पैर सुन्न पड़ने लगते है
खड़े होने में दिक्कत, चलने पर अनुभव ही न होना
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चार महीने पहले 14 और 15 सितंबर को खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की टीम के सदस्य योगेंद्र प्रसाद और मोनिका गुप्ता ने कालीबाड़ी के पुष्कर मल और चौपुला चौराहे पर महेंद्रपाल सिंह की दुकान से से दाल के नमूने भरे। इनकी जांच लैब से कराई गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यह दाल खेसारी की पाई गई और दोनों नमूनों को रिपोर्ट में अनसेफ बताया गया। बताया जाता है कि जिले भर में बड़े पैमाने पर इसका कारोबार होता है, लेकिन एफएसडीए टीम गिने चुने स्थानों पर छापामार कार्रवाई कर वाहवाही लूटती है।
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बेसन में 30 प्रतिशत खेसारी
जानकार सूत्रों के मुताबिक जिले में मटर और चने के बेसन की खपत में तीस प्रतिशत हिस्सेदारी खेसारी होती है। इसकी दाल लोग नहीं खरीदते इसीलिए इसका बेसन बनाकर बेचा जाता है। दूरदराज, गांवों और शहरी इलाकों में इसकी मांग कम नहीं है। क्योंकि सामान्य बेसन से इसकी कीमत आधे से भी कम है। गली मोहल्लों में नमकीन बनाने कारखानों में भी ज्यादातर खेसारी दाल ही इस्तेमाल हो रही है। कारोबारी बताते हैं कि पकौड़ी और मिठाइयों में इसका भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए बेसन से बने उत्पाद हमेशा लैब में पास ही नहीं हो पाते हैं। हर माह करीब 25 करोड़ रुपये का बेसन कारोबार होता है।
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खेसारी दाल और उसके उत्पाद प्रतिबंधित श्रेणी में है। इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसका कारोबार भी अपराध माना जाता है। खेसारी दाल सैंपल असुरक्षित पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होगी। - संजय पांडे, सहायक आयुक्त, एफएसडीए
तीन महीने खेसारी दाल खाई तो शर्तिया लकवे का अटैक
बरेली। पीले रंग की खेसारी दाल सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक है। चिकित्सकों का कहना है कि यह दाल शरीर के तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर करती है और अगर लगातार तीन महीने तक इसका सेवन कर लिया जाए तो शरीर के आंतरिक अंगों की कार्यप्रणाली पर बुरा असर पड़ना तय है।
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक खेसारी दाल और उसके अन्य उत्पाद को खाने से खतरनाक बीमारियां होती हैं। इस दाल में डाई एसाइनो प्रोपिऑनिक एसिड होता है। यह न्यूरोटॉक्सिक एसिड तंत्रिका तंत्र पर काफी बुरा असर डालता है। शुरुआत में शरीर के नीचे का हिस्सा काम करना बंद करता है और फिर इसका असर समय के साथ बढ़ता चला जाता है। एमडी फिजीशियन डॉ. अजय मोहन ने बताया कि तीन महीने तक दाल के सेवन करने से लिथेरिजक नाम की बीमारी होती है जिसमें शरीर के नीचे के हिस्सा काम करना बंद कर देता है। अगर इसके बाद भी दाल का सेवन जारी रखा जाए तो आंतरिक अंग काम करना बंद कर सकते हैं।
ये होते हैं लक्षण
पैरों में कमजोरी महसूस होना
चाल में फर्क नजर आने लगता है
पैर सुन्न पड़ने लगते है
खड़े होने में दिक्कत, चलने पर अनुभव ही न होना