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2 लाख से निगम को पुचकारा, 30 लाख की कमाई जेब में
बरेली।
Updated Thu, 13 Apr 2017 12:51 AM IST
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2 lakhs to be paid by the corporation, 3 million earnings in pocket
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
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नगर निगम अधिकारियों की मिलीभगत और विज्ञापन एजेंसियों को मनचाही छूट देने से शहर बदहाल है। इस बदहाली की पराकाष्ठा का आलम ये है कि निगम की जेब में इसकी कमाई तक नहीं जा रही है। आंकड़ों का गणित बता रहा है कि निगम को कैसे चूना लगाया जा रहा है। उदाहरण के लिए सेटेलाइट से शहामतगंज का क्षेत्र लीजिए। इस डेढ़ किलोमीटर सड़क पर 11 यूनिपोल लगे हैं और करीब 30 होर्डिंग लगाई गई है। एक होर्डिंग से निगम को मात्र 583 रुपए की कमाई एक माह में हो रही है, जबकि इसी एक होर्डिंग से एजेंसी 10 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रही है। ये कमाई एजेंसी अकेले नहीं रखती बल्कि निगम के कर्ता धर्ता के साथ बंदरबांट भी करती है।
इस घपलेबाजी में आंकड़ों की तस्वीर बिल्कुल साफ है। हर साल निगम बोर्ड और कार्यकारिणी बैठक के दौरान बजट में आय- व्यय का लेखा जोखा पेश करते समय यह सवाल उठते हैं कि होर्डिंग और यूनिपोल से विज्ञापन की कमाई बढ़ क्याें नहीं पा रही है। हर साल डेढ़ से दो करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा जाता है जबकि निगम 40 से 50 लाख ही कमा पाता है। इसका सबसे बड़ा कारण एजेंसियों को हद से ज्यादा ही छूट दिया जाना है। इनसे वसूली बेहद मामूली स्तर पर हो रही है जिससे लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पा रही है।
2011 में शुरू किया गया था यूनिपोल
विज्ञापन बोर्ड कमेटी के सदस्य पार्षद राजेश अग्रवाल ने बताया कि नगर निगम की आय बढ़ाने के लिए वर्ष 2011 में यूनिपोल को तत्कालीन नगर आयुक्त लेकर आए थे। 50 हजार रुपए सिक्योरिटी रकम जमा करने के साथ ही यूनिपोल और स्वागत गेट पर 5 से 10 फीसदी शुल्क प्रति वर्ष बढ़ाने की बात भी कही गई थी। लेकिन इस समय इस नियम को दरकि नार करके अंधाधुंध यूनिपोल बांटे जा रहे हैं। इसके लिए कोई टेंडर नहीं होते हैं। इस काम में कर्मचारी भी लगे हुए हैं जिनका होर्डिंग और यूनिपोल पर कब्जा है।
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इस तरह घाटे में जा रहा है निगम
एक होर्डिंग का साइज 20 गुणा 10 सेमी तय है। एजेंसियां इससे बड़े होर्डिंग लगाती हैं। 275 रुपए प्रति मीटर के हिसाब से दाम लिया जाता है। इससे मात्र 583 रुपए ही एक माह में एक होर्डिंग से निगम को मिल पाता है। एक साल में 6977 रुपए एक एजेंसी जमा करती है। जबकि एजेंसी विज्ञापन दाताओं से 10- 10 हजार रुपए प्रतिमाह कमाते हैं। अगर इनसे पांच फीसदी के हिसाब से रिकवरी लेते तो आज यह दर 1200 रुपए प्रति मीटर होती। शहामतगंज से सेटेलाइट तक लगे होर्डिंग और यूनिपोल से दो लाख 9310 रुपए निगम एक साल में कमाता है जबकि 30 लाख रुपए प्रतिमाह इसकी अनुमानित आय है जो निगम के खाते में नहीं जाती।
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इस घपलेबाजी में आंकड़ों की तस्वीर बिल्कुल साफ है। हर साल निगम बोर्ड और कार्यकारिणी बैठक के दौरान बजट में आय- व्यय का लेखा जोखा पेश करते समय यह सवाल उठते हैं कि होर्डिंग और यूनिपोल से विज्ञापन की कमाई बढ़ क्याें नहीं पा रही है। हर साल डेढ़ से दो करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा जाता है जबकि निगम 40 से 50 लाख ही कमा पाता है। इसका सबसे बड़ा कारण एजेंसियों को हद से ज्यादा ही छूट दिया जाना है। इनसे वसूली बेहद मामूली स्तर पर हो रही है जिससे लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पा रही है।
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2011 में शुरू किया गया था यूनिपोल
विज्ञापन बोर्ड कमेटी के सदस्य पार्षद राजेश अग्रवाल ने बताया कि नगर निगम की आय बढ़ाने के लिए वर्ष 2011 में यूनिपोल को तत्कालीन नगर आयुक्त लेकर आए थे। 50 हजार रुपए सिक्योरिटी रकम जमा करने के साथ ही यूनिपोल और स्वागत गेट पर 5 से 10 फीसदी शुल्क प्रति वर्ष बढ़ाने की बात भी कही गई थी। लेकिन इस समय इस नियम को दरकि नार करके अंधाधुंध यूनिपोल बांटे जा रहे हैं। इसके लिए कोई टेंडर नहीं होते हैं। इस काम में कर्मचारी भी लगे हुए हैं जिनका होर्डिंग और यूनिपोल पर कब्जा है।
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इस तरह घाटे में जा रहा है निगम
एक होर्डिंग का साइज 20 गुणा 10 सेमी तय है। एजेंसियां इससे बड़े होर्डिंग लगाती हैं। 275 रुपए प्रति मीटर के हिसाब से दाम लिया जाता है। इससे मात्र 583 रुपए ही एक माह में एक होर्डिंग से निगम को मिल पाता है। एक साल में 6977 रुपए एक एजेंसी जमा करती है। जबकि एजेंसी विज्ञापन दाताओं से 10- 10 हजार रुपए प्रतिमाह कमाते हैं। अगर इनसे पांच फीसदी के हिसाब से रिकवरी लेते तो आज यह दर 1200 रुपए प्रति मीटर होती। शहामतगंज से सेटेलाइट तक लगे होर्डिंग और यूनिपोल से दो लाख 9310 रुपए निगम एक साल में कमाता है जबकि 30 लाख रुपए प्रतिमाह इसकी अनुमानित आय है जो निगम के खाते में नहीं जाती।