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मुर्गी-अंडा के लिए साउथ पर बढ़ जाएगी नार्थ की निर्भरता
Updated Mon, 26 Nov 2018 01:40 AM IST
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बरेली। केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) के कुक्कुट परियोजना निदेशालय (डीपीआर) में विलय के बाद चूजे और अंडा की नार्थ की निर्भरता दक्षिण भारत पर और ज्यादा बढ़ जाएगी। सीएआरआई के वैज्ञानिकों का कहना है कि भारतीय पक्षी अनुसंधान परिषद ने सीएआरआई को डीपीआर में विलय का फैसला क्यों लिया है? इस पर कहना मुश्किल है।
1979 में उत्तर भारत में पोल्ट्री फार्म और अंडा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ही सीएआरआई स्थापित किया गया था। आईवीआरआई में इसके रिसर्च सेंटर और वैज्ञानिकों की मदद से कुक्कुट पालन पर काफी शोध भी हुए। इसके बाद पोल्ट्री के रिसर्च के लिए देश में दूसरा इंस्टीट्यूट डीपीआर शुरू किया गया, जो हैदराबाद में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुक्कुट उत्पादन को लेकर देश का दक्षिणी क्षेत्र वैसे ही संतृप्त है।
वैज्ञानिकों की मानें तो अकेले यूपी में ही हर दिन करीब एक करोड़ अंडा की खपत है। सीएआरआई में कुक्कुट उत्पादन बढ़ाने और शोध के लिए 40 वैज्ञानिकों का स्टॉफ है। चार दशक के दौरान पोल्ट्री को लेकर तमाम खास ट्रेनिंग के साथ ही रिसर्च भी हुईं। इससे अंडा उत्पादन में हर वर्ष करीब 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी भी हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यूपी सहित उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में अब भी 50 से 60 फीसदी से ज्यादा अंडे की सप्लाई दक्षिणी राज्यों से ही होती है।
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सीएआरआई से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि सीएआरआई के शोध और ट्रेनिंग प्रोग्राम से यूपी सहित उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में पोल्ट्री कारोबार को ऊंचाई मिल रही है। हाल में केंद्र सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए संस्थान को विस्तार देने का भी फैसला लिया था, लेकिन हाल में केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रस्ताव के बाद सीएआरआई के डीपीआर में विलय करने के फैसले से जहां सीएआरआई के करीब दो सौ के स्टाफ को झटका लगा है। वहीं वैज्ञानिकों के पदों में कटौती होने से उत्तर भारत के पोल्ट्री उद्योग को भी झटका लगने की आशंका जताई जा रही है।
हैदराबाद जाएंगे सीएआरआई के साइंटिस्ट
सीएआरआई के विलय के बाद यहां नियुक्त 40 साइंटिस्ट में 18 की नियुक्तियां हैदराबाद के डीपीआर में हो जाएंगी। इससे यहां वैज्ञानिकों का स्टॉफ घटकर केवल 22 रह जाएगा, जबकि कुक्कुट परियोजना निदेशालय में अभी 15 वैज्ञानिकों का स्टॉफ है। ट्रंासफर के बाद वहां वैज्ञानिकों की संख्या बढ़कर 33 हो जाएगी। वैज्ञानिकों के स्थानांतरण का असर सीएआरआई के शोध पर पड़ेगा।
विलय की जानकारी मिली है, लेकिन इस संबंध में अभी विस्तृत दिशा-निर्देश आना बाकी है। ऐसा क्यों किया जा रहा है, इस पर कुछ कह पाना मुमकिन नहीं है।
- डॉ. एबी मंडल, निदेशक, सीएआरआई
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1979 में उत्तर भारत में पोल्ट्री फार्म और अंडा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ही सीएआरआई स्थापित किया गया था। आईवीआरआई में इसके रिसर्च सेंटर और वैज्ञानिकों की मदद से कुक्कुट पालन पर काफी शोध भी हुए। इसके बाद पोल्ट्री के रिसर्च के लिए देश में दूसरा इंस्टीट्यूट डीपीआर शुरू किया गया, जो हैदराबाद में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुक्कुट उत्पादन को लेकर देश का दक्षिणी क्षेत्र वैसे ही संतृप्त है।
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वैज्ञानिकों की मानें तो अकेले यूपी में ही हर दिन करीब एक करोड़ अंडा की खपत है। सीएआरआई में कुक्कुट उत्पादन बढ़ाने और शोध के लिए 40 वैज्ञानिकों का स्टॉफ है। चार दशक के दौरान पोल्ट्री को लेकर तमाम खास ट्रेनिंग के साथ ही रिसर्च भी हुईं। इससे अंडा उत्पादन में हर वर्ष करीब 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी भी हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यूपी सहित उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में अब भी 50 से 60 फीसदी से ज्यादा अंडे की सप्लाई दक्षिणी राज्यों से ही होती है।
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सीएआरआई से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि सीएआरआई के शोध और ट्रेनिंग प्रोग्राम से यूपी सहित उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में पोल्ट्री कारोबार को ऊंचाई मिल रही है। हाल में केंद्र सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए संस्थान को विस्तार देने का भी फैसला लिया था, लेकिन हाल में केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रस्ताव के बाद सीएआरआई के डीपीआर में विलय करने के फैसले से जहां सीएआरआई के करीब दो सौ के स्टाफ को झटका लगा है। वहीं वैज्ञानिकों के पदों में कटौती होने से उत्तर भारत के पोल्ट्री उद्योग को भी झटका लगने की आशंका जताई जा रही है।
हैदराबाद जाएंगे सीएआरआई के साइंटिस्ट
सीएआरआई के विलय के बाद यहां नियुक्त 40 साइंटिस्ट में 18 की नियुक्तियां हैदराबाद के डीपीआर में हो जाएंगी। इससे यहां वैज्ञानिकों का स्टॉफ घटकर केवल 22 रह जाएगा, जबकि कुक्कुट परियोजना निदेशालय में अभी 15 वैज्ञानिकों का स्टॉफ है। ट्रंासफर के बाद वहां वैज्ञानिकों की संख्या बढ़कर 33 हो जाएगी। वैज्ञानिकों के स्थानांतरण का असर सीएआरआई के शोध पर पड़ेगा।
विलय की जानकारी मिली है, लेकिन इस संबंध में अभी विस्तृत दिशा-निर्देश आना बाकी है। ऐसा क्यों किया जा रहा है, इस पर कुछ कह पाना मुमकिन नहीं है।
- डॉ. एबी मंडल, निदेशक, सीएआरआई