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ये कैसा दुर्भाग्य जिसे पूरा देश जानता है, वो अपने ही शहर में अनजान
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बरेली। बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक.. एक ऐसा नाम जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। मगर अफसोस! उनके अपने शहर ने ही उन्हें भुला दिया। कहकरा सीख रहे बच्चों को लुभाने वाली उनकी कविताएं खुद-ब-खुद याद आने लगती हैं। अपनी कविताओं के जरिये बच्चों के मानस पटल पर छाप छोड़ने वाले निरंकार देव सेवक की शहर में कोई निशानी नहीं है। न तो उनके नाम से कोई सड़क है और न ही कोई ऐसा स्मारक जो लोगों को उनकी याद दिलाए।
बाल साहित्यकार को भुलाने से आहत उनकी पुत्रवधू पूनम सेवक का कहना है कि सेवक जी ने देश दुनिया में बरेली को गौरवांवित कराया लेकिन इस शहर ने उन्हें सम्मान नहीं दिया। शहर में न तो उनका कोई स्मारक है और न ही कोई ऐसा विशेष आयोजन होता है जो उनकी स्मृतियों को संजोकर रख सके। बकौल पूनम, सेवक जी ने उन्हें सिर्फ बहु नहीं बेटी का दर्जा भी दिया। शांत स्वभाव और आदर्श व्यक्तित्व के धनी सेवक जी जितनी भी बाल कविताएं लिखते थे, वे बच्चों को जरूर सुनाते थे। उस वक्त वह खुद भी बच्चे बन जाते थे। अंदाज भी वैसा ही होता था.. सुर, लय, ताल और कविताओं पर बच्चों की तरह ही नाचता, झूमना। बच्चों से तारीफ मिलती और बच्चे खुश होते तो उनके हंसते-खिलखिलाते फोटो संरक्षित करते और प्रकाशित करवाते।
पिता से मिली लिखने की सीख
सेवक जी के पिता रामभरोसे सेवक शायरी करते थे। उनके सहयोग से ही सेवक जी ने छोटी-छोटी क विताएं लिखनी शुरू कीं। तारीफ मिली तो बेटे का हुनर देख पिता ने उन्हें कविता लिखने की कला सिखाई। शुरुआत बाल कविताओं से हुई। बाद में उन्होंने चिंगारी, स्वास्तिक, जीवन बोलता है, पुस्तकें लिखीं। 80 के दशक में समाचार पत्र के लिए संपादकीय भी लिखे, लेकिन मन बाल कविता में ही रमा रहा।
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निरंकार देव सेवक का परिचय
‘दूर देश से आई तितली चंचल पंख हिलाती, फूल-फूल पर, कली-कली पर इतराती-इठलाती’ जैसी चर्चित कविता लिखने वाले सेवक का जन्म 19 जनवरी 1919 को हुआ था। उन्होंने एमए, एलएलबी की शिक्षा ग्रहण की थी। सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साहित्यकार पिता हरिवंश राय बच्चन और उनकी मां तेजी बच्चन पहली बार बरेली में निरंकार देव सेवक के घर ही मिले थे। उनकी कविताओं में कभी उपदेश नहीं होते थे। वे ऐसी कविताएं रचते थे जो बाल मन को भा जाती थीं। बच्चा खेल-खेल में ही उनको याद भी कर लेता था। 29 अक्तूबर 1994 को उनका देहांत हो गया।
निरंकार सेवक जी की रचनाएं
बचपन एक समंदर, हिंदी बालगीत साहित्य, इतिहास एवं समीक्षा, अगर-मगर, धूप-छाया, चाचा नेहरू के गीत, दूध जलेबी, माखन मिसरी, रिमझिम, फूलों के गीत, मटर के दाने, महापुरुषों के गीत, शेखर के बालगीत, पप्पू के बालगीत, बिल्लो के गीत, आजादी के गीत, टेसू के गीत, बीन बजाती बिल्लो रानी, चिड़िया रानी समेत करीब 55 कविता कोष उन्होंने लिखे। बच्चों से अथाह प्रेम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने बेटे प्रदीप सेवक के लिए दो पुस्तकें लिखीं। प्यार से प्रदीप को वह मुन्ना और शेखर कहकर बुलाते थे। उसके लिए उन्होंने मुन्ना के गीत और शेखर के गीत के नाम से दो बाल पुस्तकें भी लिखी।
सेवक जी की कविताओं का पाठ
बरेली। बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की जन्मशती के अवसर पर निरंकार देव सेवक बाल साहित्य संस्थान की ओर से बिहारीपुर खत्रियान पर विचार गोष्ठी हुई। सेवक जी का नमन कर छात्रा राधिका ने उनकी लिखी कविताओं का पाठ किया। संस्थान की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। यहां अध्यक्ष इंद्रदेव त्रिवेदी, महामंत्री डॉ. अवनीश यादव, रमेश गौतम, सुरेश बाबू मिश्रा आदि ने भी कविता पाठ कर उन्हें सदी के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार की पदवी से नवाजा।
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बाल साहित्यकार को भुलाने से आहत उनकी पुत्रवधू पूनम सेवक का कहना है कि सेवक जी ने देश दुनिया में बरेली को गौरवांवित कराया लेकिन इस शहर ने उन्हें सम्मान नहीं दिया। शहर में न तो उनका कोई स्मारक है और न ही कोई ऐसा विशेष आयोजन होता है जो उनकी स्मृतियों को संजोकर रख सके। बकौल पूनम, सेवक जी ने उन्हें सिर्फ बहु नहीं बेटी का दर्जा भी दिया। शांत स्वभाव और आदर्श व्यक्तित्व के धनी सेवक जी जितनी भी बाल कविताएं लिखते थे, वे बच्चों को जरूर सुनाते थे। उस वक्त वह खुद भी बच्चे बन जाते थे। अंदाज भी वैसा ही होता था.. सुर, लय, ताल और कविताओं पर बच्चों की तरह ही नाचता, झूमना। बच्चों से तारीफ मिलती और बच्चे खुश होते तो उनके हंसते-खिलखिलाते फोटो संरक्षित करते और प्रकाशित करवाते।
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पिता से मिली लिखने की सीख
सेवक जी के पिता रामभरोसे सेवक शायरी करते थे। उनके सहयोग से ही सेवक जी ने छोटी-छोटी क विताएं लिखनी शुरू कीं। तारीफ मिली तो बेटे का हुनर देख पिता ने उन्हें कविता लिखने की कला सिखाई। शुरुआत बाल कविताओं से हुई। बाद में उन्होंने चिंगारी, स्वास्तिक, जीवन बोलता है, पुस्तकें लिखीं। 80 के दशक में समाचार पत्र के लिए संपादकीय भी लिखे, लेकिन मन बाल कविता में ही रमा रहा।
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निरंकार देव सेवक का परिचय
‘दूर देश से आई तितली चंचल पंख हिलाती, फूल-फूल पर, कली-कली पर इतराती-इठलाती’ जैसी चर्चित कविता लिखने वाले सेवक का जन्म 19 जनवरी 1919 को हुआ था। उन्होंने एमए, एलएलबी की शिक्षा ग्रहण की थी। सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साहित्यकार पिता हरिवंश राय बच्चन और उनकी मां तेजी बच्चन पहली बार बरेली में निरंकार देव सेवक के घर ही मिले थे। उनकी कविताओं में कभी उपदेश नहीं होते थे। वे ऐसी कविताएं रचते थे जो बाल मन को भा जाती थीं। बच्चा खेल-खेल में ही उनको याद भी कर लेता था। 29 अक्तूबर 1994 को उनका देहांत हो गया।
निरंकार सेवक जी की रचनाएं
बचपन एक समंदर, हिंदी बालगीत साहित्य, इतिहास एवं समीक्षा, अगर-मगर, धूप-छाया, चाचा नेहरू के गीत, दूध जलेबी, माखन मिसरी, रिमझिम, फूलों के गीत, मटर के दाने, महापुरुषों के गीत, शेखर के बालगीत, पप्पू के बालगीत, बिल्लो के गीत, आजादी के गीत, टेसू के गीत, बीन बजाती बिल्लो रानी, चिड़िया रानी समेत करीब 55 कविता कोष उन्होंने लिखे। बच्चों से अथाह प्रेम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने बेटे प्रदीप सेवक के लिए दो पुस्तकें लिखीं। प्यार से प्रदीप को वह मुन्ना और शेखर कहकर बुलाते थे। उसके लिए उन्होंने मुन्ना के गीत और शेखर के गीत के नाम से दो बाल पुस्तकें भी लिखी।
सेवक जी की कविताओं का पाठ
बरेली। बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की जन्मशती के अवसर पर निरंकार देव सेवक बाल साहित्य संस्थान की ओर से बिहारीपुर खत्रियान पर विचार गोष्ठी हुई। सेवक जी का नमन कर छात्रा राधिका ने उनकी लिखी कविताओं का पाठ किया। संस्थान की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। यहां अध्यक्ष इंद्रदेव त्रिवेदी, महामंत्री डॉ. अवनीश यादव, रमेश गौतम, सुरेश बाबू मिश्रा आदि ने भी कविता पाठ कर उन्हें सदी के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार की पदवी से नवाजा।