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नाथ नगरी और श्रीराम की बताई महिमा
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बरेली। दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों के आने पर भगवान शिव ही भक्त को कष्ट से मुक्ति पाने का मार्ग दिखाते हैं। जिससे उन्हें जीवन में संतोष और आनंद की प्राप्ति होती है।’ इन्हीं आशीर्वचनों से सोमवार को त्रिवटीनाथ मंदिर में कथाव्यास डॉ. पं. प्रभाकर त्रिपाठी ने श्री रामकथा का शुभारंभ किया।
कथाव्यास ने कहा कि जिस तरह काशी में बाबा विश्वनाथ पंच स्वरूप में विराजमान है उसी तरह बरेली में बाबा त्रिवटीनाथ विराजमान है। जैसे पूरब, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर में शिवलिंग स्थापित हैं उसी तरह मध्य में बाबा विश्वनाथ और बाबा त्रिवटीनाथ और उनके चारों ओर छह नाथ मंदिर विराजमान हैं। कहा, भगवान शंकर तीन प्रकार के शूल के निर्मूलन के लिए ‘शूलपाणि’ कहे जाते हैं। ये शूल दैहिक, दैविक तथा भौतिक हैं। बताया कि भगवान शंकर को रामकथा प्रिय है। जो भक्त श्रीराम का नाम सदैव अपने हृदय में धारण करते हैं उन पर भगवान शंकर की विशेष कृपा रहती है।
कथा के शुरू होने से पहले मंदिर कमेटी के प्रताप चंद्र सेठ, संजीवऔतार अग्रवाल ने कथाव्यास का स्वागत किया।
श्री राम से सीखें ‘आर्ट ऑफ लिविंग’
श्री राम ने समाज को संस्कारों की जरूरत बतायी। माता/पिता और गुरु का सम्मान करना, सामाजिक आचरण, चारित्रिक दृढ़ता का पालन करना सिखाया। बताया कि एक बालक का जीवन कुम्हार के चाक पर रखी उस मिट्टी की तरह है जो सही हाथों में हो तो उससे मूर्ति, सुराही आदि का निर्माण होता है। आखिर में महाआरती के बाद प्रसाद वितरण कर कथा का विश्राम हुआ।
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कथाव्यास ने कहा कि जिस तरह काशी में बाबा विश्वनाथ पंच स्वरूप में विराजमान है उसी तरह बरेली में बाबा त्रिवटीनाथ विराजमान है। जैसे पूरब, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर में शिवलिंग स्थापित हैं उसी तरह मध्य में बाबा विश्वनाथ और बाबा त्रिवटीनाथ और उनके चारों ओर छह नाथ मंदिर विराजमान हैं। कहा, भगवान शंकर तीन प्रकार के शूल के निर्मूलन के लिए ‘शूलपाणि’ कहे जाते हैं। ये शूल दैहिक, दैविक तथा भौतिक हैं। बताया कि भगवान शंकर को रामकथा प्रिय है। जो भक्त श्रीराम का नाम सदैव अपने हृदय में धारण करते हैं उन पर भगवान शंकर की विशेष कृपा रहती है।
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कथा के शुरू होने से पहले मंदिर कमेटी के प्रताप चंद्र सेठ, संजीवऔतार अग्रवाल ने कथाव्यास का स्वागत किया।
श्री राम से सीखें ‘आर्ट ऑफ लिविंग’
श्री राम ने समाज को संस्कारों की जरूरत बतायी। माता/पिता और गुरु का सम्मान करना, सामाजिक आचरण, चारित्रिक दृढ़ता का पालन करना सिखाया। बताया कि एक बालक का जीवन कुम्हार के चाक पर रखी उस मिट्टी की तरह है जो सही हाथों में हो तो उससे मूर्ति, सुराही आदि का निर्माण होता है। आखिर में महाआरती के बाद प्रसाद वितरण कर कथा का विश्राम हुआ।
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