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सैदपुर के क्रांतिकारी पिता-पुत्र ने दी थी अंग्रेजों को चुनौती
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सैदपुर (बदायूं)। सैदपुर निवासी सोहन लाल सक्सेना और उनके बेटे महेश्वर दयाल सक्सेना जिले के अग्रणी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। सोहनलाल सक्सेना की बीस गांव में जमींदारी थी। अंग्रेज अफसरों ने उन्हें अपने साथ आने पर जमींदारी कायम रखने और बड़ी मनसबदारी देने का प्रलोभन दिया पर स्वाभिमानी क्रांतिकारी ने इसे ठुकरा दिया। पिता के बाद पुत्र महेश्वर दयाल सक्सेना ने भी क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया। वह फैजाबाद जेल में काफी समय बंद रहे।
सैदपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे सोहन लाल सक्सेना का परिवार इलाके में काफी प्रतिष्ठित है। सोहनलाल सक्सेना पुराने जमींदार थे जिन्होंने आजादी की खातिर अंग्रेजों के प्रलोभन को ठुकराकर उन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जिले के सांसद रहे स्वतंत्रता सेनानी रघुवीर सहाय की पुस्तक ‘बदायूं के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’ में जिक्र है कि लाहौर में सन 1929 में कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया। फिर नमक सत्याग्रह का जो आंदोलन शुरू हुआ उसमें सोहनलाल सक्सेना ने बदायूं के लोगों के साथ अपूर्व उत्साह के साथ भाग लिया।
रुहेलखंड डिवीजन को गुलड़िया से रोज जत्थे जाने लगे और धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होने लगीं। इसी सिलसिले में रघुवीर सहाय के साथ सोहनलाल सक्सेना को भी 1930 में गिरफ्तार कर लिया गया। जुर्माने के साथ छह महीने की सख्त कैद की सजा दी गई । जेल में उन्हें काफी यातनाएं दी गईं। इनके साथ गंगाराम, टीकाराम, विभूति प्रसाद आदि सैकड़ों आंदोलनकारी भी जेल में रहे।
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बेटे को विरासत में मिली क्रांति की मशाल
सोहनलाल सक्सेना के पुत्र महेश्वर दयाल सक्सेना को अपने पिता से क्रांतिकारी गतिविधियां विरासत में मिलीं। उन्होंने भी युवावस्था में ही पिता के पदचिन्हों पर चलकर महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी सिलसिले में महेश्वर दयाल सक्सेना को सन 1941 में अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके फैजाबाद जेल में डाल दिया और उन्हें जुर्माने के साथ सख्त सजा दी। महेश्वर दयाल ने जेल में आजादी के नारे लगाए तो ब्रिटिश सरकार ने उनके साथियों को तरह-तरह की यातनाएं दीं।
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महेश चौक बनाया पर आधा-अधूरा
शासन प्रशासन की नीति भले ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बेहद सम्मान देने की हों पर सैदपुर के क्रांतिकारी पिता-पुत्र को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह अब तक नहीं मिला। यह जरूर है सन 2000 में तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष इशरत अली खान ने नगर में महेश चौक के लोकार्पण का पत्थर लगवाया था।
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वंशज बोले - प्रतिमा लगे तो कस्बे को भी मिले पहचान
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के वंशज और जमींदार परिवार के लोग फिलहाल जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हैं और वर्तमान में साधारण जीवन बिता रहे हैं। महेश्वर दयाल सक्सेना के बेटे अखिलेश्वर दयाल सक्सेना अब बुजुर्ग हो चले हैं। उनके एक भाई राजेश्वर दयाल सक्सेना का 2011 में निधन हो चुका है जबकि बहनें डॉ. सुनीता सक्सेना, श्रीमती विनय सक्सेना और अनीता सक्सेना प्रतिष्ठित परिवारों में ब्याही हैं। सेनानी परिवार के इन वंशजों का सपना है कि आजादी में पिता-पुत्र के बलिदान का उचित सम्मान दिया जाए । उन दोनों की प्रतिमा नगर में स्थापित की जाए। इससे सैदपुर को भी एक नई पहचान मिलेगी। संवाद
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सैदपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे सोहन लाल सक्सेना का परिवार इलाके में काफी प्रतिष्ठित है। सोहनलाल सक्सेना पुराने जमींदार थे जिन्होंने आजादी की खातिर अंग्रेजों के प्रलोभन को ठुकराकर उन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जिले के सांसद रहे स्वतंत्रता सेनानी रघुवीर सहाय की पुस्तक ‘बदायूं के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’ में जिक्र है कि लाहौर में सन 1929 में कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया। फिर नमक सत्याग्रह का जो आंदोलन शुरू हुआ उसमें सोहनलाल सक्सेना ने बदायूं के लोगों के साथ अपूर्व उत्साह के साथ भाग लिया।
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रुहेलखंड डिवीजन को गुलड़िया से रोज जत्थे जाने लगे और धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होने लगीं। इसी सिलसिले में रघुवीर सहाय के साथ सोहनलाल सक्सेना को भी 1930 में गिरफ्तार कर लिया गया। जुर्माने के साथ छह महीने की सख्त कैद की सजा दी गई । जेल में उन्हें काफी यातनाएं दी गईं। इनके साथ गंगाराम, टीकाराम, विभूति प्रसाद आदि सैकड़ों आंदोलनकारी भी जेल में रहे।
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बेटे को विरासत में मिली क्रांति की मशाल
सोहनलाल सक्सेना के पुत्र महेश्वर दयाल सक्सेना को अपने पिता से क्रांतिकारी गतिविधियां विरासत में मिलीं। उन्होंने भी युवावस्था में ही पिता के पदचिन्हों पर चलकर महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी सिलसिले में महेश्वर दयाल सक्सेना को सन 1941 में अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके फैजाबाद जेल में डाल दिया और उन्हें जुर्माने के साथ सख्त सजा दी। महेश्वर दयाल ने जेल में आजादी के नारे लगाए तो ब्रिटिश सरकार ने उनके साथियों को तरह-तरह की यातनाएं दीं।
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शासन प्रशासन की नीति भले ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बेहद सम्मान देने की हों पर सैदपुर के क्रांतिकारी पिता-पुत्र को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह अब तक नहीं मिला। यह जरूर है सन 2000 में तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष इशरत अली खान ने नगर में महेश चौक के लोकार्पण का पत्थर लगवाया था।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के वंशज और जमींदार परिवार के लोग फिलहाल जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हैं और वर्तमान में साधारण जीवन बिता रहे हैं। महेश्वर दयाल सक्सेना के बेटे अखिलेश्वर दयाल सक्सेना अब बुजुर्ग हो चले हैं। उनके एक भाई राजेश्वर दयाल सक्सेना का 2011 में निधन हो चुका है जबकि बहनें डॉ. सुनीता सक्सेना, श्रीमती विनय सक्सेना और अनीता सक्सेना प्रतिष्ठित परिवारों में ब्याही हैं। सेनानी परिवार के इन वंशजों का सपना है कि आजादी में पिता-पुत्र के बलिदान का उचित सम्मान दिया जाए । उन दोनों की प्रतिमा नगर में स्थापित की जाए। इससे सैदपुर को भी एक नई पहचान मिलेगी। संवाद