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Barabanki News: भय और संघर्ष लेकर आता है बरसात का मौसम
Sat, 20 Jun 2026 10:44 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Sat, 20 Jun 2026 10:44 PM IST
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नाव बनाते कैथी गांव के मल्लाह।
रुदौली। माॅनसून की दस्तक के साथ ही रुदौली तहसील क्षेत्र के सरयू नदी किनारे बसे कैथी गांव के लोगों की चिंता बढ़ने लगी है। सरयू के बीचोंबीच बसे इस माझा क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए बारिश का मौसम राहत नहीं, बल्कि भय और संघर्ष लेकर आता है। करीब 700 की आबादी वाले कैथी गांव में बाढ़ का खतरा हर वर्ष मंडराता है।
ग्रामीण बताते हैं कि बाढ़ आने पर सरयू का पानी घरों के दरवाजे तक पहुंच जाता है। दिन तो किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात सबसे ज्यादा भयावह होती है। सन्नाटे में नदी की तेज लहरों की आवाज लोगों को पूरी रात जगाए रखती है। हर पल यह डर बना रहता है कि कब नदी का जलस्तर बढ़ जाए और कब कटान उनके घर और खेतों को अपने आगोश में ले ले। इन दिनों गांव के मोल्हे नाव बनाने में जुटे हैं। उनका कहना है कि बाढ़ आने पर पूरा गांव चारों ओर से पानी से घिर जाता है और बाहर निकलने का एकमात्र साधन नाव ही रह जाती है। मोल्हे कहते हैं कि प्रशासन की ओर से नावों की समुचित व्यवस्था नहीं होती। उनकी नाव तीन वर्ष पहले बाढ़ राहत कार्य के लिए किराये पर ली गई थी, लेकिन आज तक भुगतान नहीं किया गया।
टापू बना गांव, हर साल कट रही खेती
कैथी माझा के ननके और कल्लू बताते हैं कि उनका गांव नदी के बीच स्थित एक टापू की तरह है। यहां करीब 85 घरों में लगभग 400 लोग रहते हैं। हर साल बाढ़ और कटान से खेती योग्य जमीन नदी में समा जाती है या फिर बालू में बदल जाती है। गांव में पानी भर जाने के बाद लोगों को अपना घर छोड़कर बांध पर शरण लेनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के दौरान अधिकारी और जनप्रतिनिधि बांध पर आवासीय पट्टा दिलाने का आश्वासन देते हैं, लेकिन पानी उतरते ही सारे वादे हवा हो जाते हैं। कई बार तहसील के चक्कर लगाने के बावजूद आज तक उन्हें स्थायी पट्टा नहीं मिल सका।
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ग्रामीण बताते हैं कि बाढ़ आने पर सरयू का पानी घरों के दरवाजे तक पहुंच जाता है। दिन तो किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात सबसे ज्यादा भयावह होती है। सन्नाटे में नदी की तेज लहरों की आवाज लोगों को पूरी रात जगाए रखती है। हर पल यह डर बना रहता है कि कब नदी का जलस्तर बढ़ जाए और कब कटान उनके घर और खेतों को अपने आगोश में ले ले। इन दिनों गांव के मोल्हे नाव बनाने में जुटे हैं। उनका कहना है कि बाढ़ आने पर पूरा गांव चारों ओर से पानी से घिर जाता है और बाहर निकलने का एकमात्र साधन नाव ही रह जाती है। मोल्हे कहते हैं कि प्रशासन की ओर से नावों की समुचित व्यवस्था नहीं होती। उनकी नाव तीन वर्ष पहले बाढ़ राहत कार्य के लिए किराये पर ली गई थी, लेकिन आज तक भुगतान नहीं किया गया।
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टापू बना गांव, हर साल कट रही खेती
कैथी माझा के ननके और कल्लू बताते हैं कि उनका गांव नदी के बीच स्थित एक टापू की तरह है। यहां करीब 85 घरों में लगभग 400 लोग रहते हैं। हर साल बाढ़ और कटान से खेती योग्य जमीन नदी में समा जाती है या फिर बालू में बदल जाती है। गांव में पानी भर जाने के बाद लोगों को अपना घर छोड़कर बांध पर शरण लेनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के दौरान अधिकारी और जनप्रतिनिधि बांध पर आवासीय पट्टा दिलाने का आश्वासन देते हैं, लेकिन पानी उतरते ही सारे वादे हवा हो जाते हैं। कई बार तहसील के चक्कर लगाने के बावजूद आज तक उन्हें स्थायी पट्टा नहीं मिल सका।
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